Saturday, September 25, 2021
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जिन गांवों में सड़क और मोबाइल नेटवर्क तक नहीं वहां 100% वैक्सीनेशन हुआ

आंध्र-तेलंगाना से सटे छत्तीसगढ़ के घोर नक्सल प्रभावित 13 गांव। ऐसा इलाका जहां बिजली की सुविधा और मोबाइल नेटवर्क तो दूर की बात, यहां आने-जाने के लिए सड़क तक नहीं है। एक सड़क जरूर कोंटा से होते हुए इन सबमें सबसे बड़े गांव गोलापल्ली तक जाती है, जिसे जगह-जगह नक्सलियों ने काट दिया है। बडे़-बड़े पत्थरों के बीच से गुजरे इस रास्ते पर करीब 25 बरसाती नाले हैं, जिन पर पुल नहीं है। इस पूरे इलाके में नक्सली स्मारक बने हैं, जिनकी तस्वीर लेने की मनाही है।

नक्सल प्रभावित गांवों में आरटीपीसीआर टेस्टिंग के लिए सैंपल लिए जा रहे हैं।
  • 13 गांवों में 45+ के सभी 775 लोग लगवा चुके हैं टीके
  • सुकमा में बाहर से आने वालों के लिए बनाए गए हैं अलग से आइसोलेशन सेंटर

इतने विपरीत हालात के बावजूद इन 13 गांवों में कोरोना को लेकर गजब की जागरूकता दिखी। इन गांवों में 45 से अधिक उम्र के 775 ने वैक्सीनेशन करवा लिया है। इन गांवों में सड़क नहीं लेकिन कोरोना की टेस्टिंग की सुविधा भी है। भास्कर टीम जब इन गांवों में पहुंची तो नक्सलियों के कई फरमान सुनने को मिले। गांववालों ने पहले ही बता दिया कि कोरोना से संबंधित जो भी खबर चाहिए, फोटो लेनी है वो खींच लो लेकिन दादा (नक्सली) लोगों से जुड़ी कोई जानकारी फोटो या वीडियो में नहीं दिखनी चाहिए।

चेताया भी गया कि ऐसा हुआ तो कैमरा और मोबाइल जब्त कर लिए जायेंगे। टीम ने भी नक्सली फरमान माना और रिपोर्टिंग की शुरुआत की। कोंटा से होते हुए गोलापल्ली पहुंचने में छह घंटे का समय लगा, इस दौरान कुछ सफर बाइक तो कुछ पैदल तय करना पड़ा। यहां लोगों की जागरूकता इससे ही समझी जा सकती है कि लगभग हर गांव के बाहर बाहरी लोगों के गांव में प्रवेश पर प्रतिबंध के बैनर लगे हुए हैं। करीब-करीब सभी गांवों में बाहर से आये लोगों के लिए आइसोलेशन सेंटर बनाये गये हैं।

यह सेंटर पंचायत भवन, आंगनबाड़ी केंद्रों में बने हैं। इनकी देखरेख का जिम्मा पंचायत सचिव, रोजगार सहायकों और गांव-गांव में तैनात आरएमए व एएनएम पर है। मेहता गांव के सचिव मोहम्मद जावेद बताते हैं कि कोरोना के पहले दौर में गांवों में ऐसी सजगता नहीं थी, लेकिन दूसरी लहर आने के बाद हालात बदले हैं। गांव के ज्यादातर लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं लेकिन वे आंध्र में फैले कोरोना के नये वेरियंट के बारे में जानकार सहमे हुए हैं। यही कारण है कि अब लोग गांवों में कोरोना टेस्ट करवाने के लिये तैयार हो रहे हैं।

सब डर रहे थे तब रिटायर पोस्टमास्टर ने वैक्सीन लगवाई

गोलापल्ली और इससे सटे गांवों के लोग वैक्सीनेशन को लेकर घबरा रहे थे। तब गोलापल्ली में रहने वाले रिटायर पोस्टमास्टर सुमन कुमार वर्मा और उनकी पत्नी ने मरईगुड़ा जाकर वैक्सीन लगवाई। सुमन कुमार बताते हैं कि एक वायल में दस डोज होते हैं। जिस दिन मरईगुड़ा में वैक्सीनेशन हो रहा था उसी दिन खबर आई कि दो डोज बची है, यदि इसे किसी को नहीं लगाया गया तो डोज खराब होगी। इसके बाद मैंने और मेरी पत्नी ने वैक्सीनेशन करवा लिया। हमें दूसरी डोज भी लग चुकी है। गोलापल्ली में सबसे पहले इसी दंपती ने डोज लगावाई थी। गांव के 25 दंपती ने अगले सात दिनों के अंदर वैक्सीनेशन करवा लिया।

ये हैं वो 13 गांव : राजगुड़ा, तारलागुड़ा, जिनालंका, भाकतीगुड़ा, रामपुरा, गोलापल्ली, मनादीगुड़ा, वंजागुड़ा, सिंगारम, मासौल, रसतंग, गोंदीगुड़ा, जबेली जहां बैनर-पोस्टर लगाया गया है और लिखा है बाहरी लोगाें का प्रवेश वर्जित है।

गांवों में आरटीपीसीआर और एंटीजन की सुविधा

जिन गांवों में टीम पहुंची उन गांवों के सब-सेंटरों में कोरोना की जांच के लिए आरटीपीसीआर, एंटीजन टेस्ट की व्यवस्था थी। गोलापल्ली सब-सेंटर में तैनात आरएचओ गोविंद दिरधो बताते हैं कि हमारे सेंटर में कोरोना की जांच के लिए एंटीजन किट है। हम आरटीपीसीआर सैंपल भी लेते हैं। आरटीपीसीआर के सैंपल गांव में ही कलेक्ट होते हैं उसे कोंटा भेजा जाता है।

पहले कहते थे खराब है अब महत्व समझा

गोलापल्ली के स्वास्थ्य केंद्र में तैनात एएनएम बीवी रमन्ना और प्रतिभा नेताम बताती हैं कि जब वैक्सीनेशन की शुरुआत हुई थी तब लोग कहते थे कि खराब हो चुके इंजेक्शन हमें लगा रहे हो। दरअसल वैक्सीन लगवाने के बाद कुछ लोगों को सिरदर्द, बुखार जैसी शिकायतें आती हैं। गांव के लोग समझते थे कि खराब हो चुकी वैक्सीन लगाने से ऐसा हो रहा है। गांव वाले अब समझ गए हैं

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