Tuesday, September 21, 2021
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20 साल की किलेबंदी 100 दिन में ढही, अब सभी बड़े शहरों पर इसका कब्जा

एक महीने पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने के अपने फैसले को सही ठहराते हुए कहा था कि तालिबान अब अफगानिस्तान पर कब्जा नहीं कर पाएगा। उन्होंने कहा था, ‘क्या मुझे तालिबान पर भरोसा है? नहीं! लेकिन मैं अफगान सेना की क्षमता पर भरोसा करता हूं। जिसे बेहतर ट्रेनिंग मिली है, जो बेहतर हथियारों से लैस है और जो युद्ध करने में सक्षम है।’लेकिन पिछले सात दिन में यह सेना ढह गई। बीता एक हफ्ता दो दशकों से चले आ रहे युद्ध में सबसे ज्यादा हैरान करने वाला रहा है। अफगानिस्तान के बड़े शहर एक-एक करके तालिबान के कब्जे में आते गए। जिन अमेरिकियों ने कई साल तक अफगान फोर्सेज को ट्रेनिंग दी और तालिबान के खिलाफ युद्ध में अफगान सेना के साथ खड़े रहे, वो भी अब काबुल एम्बेसी छोड़कर जा रहे हैं।

तालिबान ने शनिवार को ये तस्वीर जारी की थी और बताया था कि मजार-ए-शरीफ शहर को तालिबानी लड़ाकों ने घेर लिया है।
तालिबान ने शनिवार को ये तस्वीर जारी की थी और बताया था कि मजार-ए-शरीफ शहर को तालिबानी लड़ाकों ने घेर लिया है।

मई से तालिबान ने तेज किया अपना अभियान

अफगानिस्तान को अपने कब्जे में लेने का तालिबान का यह खूनी खेल इस साल की शुरुआत में शुरू हुआ, जब शहरों के बाहर बनी चौकियों पर मौजूद अफसर सरेंडर करने लगे। 1 मई को जब अमेरिकी सेना की वापसी शुरू हुई तो तालिबान तेजी से इलाकों को कब्जाने लगा। उसके बाद से इसमें और तेजी आई है।

अमेरिकी सपोर्ट के बिना बेअसर हुई अफगान सेना

जैसे-जैसे तालिबान ने पूरे देश में शहरों को निशाना बनाना शुरू किया, उससे साफ हो गया कि सरकारी सेनाएं थकी हुई है, असंगठित हैं और अमेरिकी मदद के बिना तालिबान के आगे बेअसर हैं। कई शहरों में तो तालिबान को गोली भी नहीं चलानी पड़ी और सेना ने सरेंडर कर दिया या वहां से भाग खड़ी हुई।

पूर्वी अफगानिस्तान के बड़े शहरों में अब अफगान सेना के पास सिर्फ काबुल बचा है। हालांकि तालिबान ने इसे भी चारों तरफ से घेर लिया है। रविवार को जलालाबाद पर भी तालिबान का कब्जा हो गया। शनिवार रात को देश के उत्तरी प्रांत बल्ख की राजधानी मजार-ए-शरीफ भी तालिबानियों के कब्जे में आ गई।

तालिबान ने फरवरी 2020 में अमेरिका से की थी डील

फरवरी 2020 में तालिबान ने अमेरिका से एक डील में यह तय किया था कि वह अफगान सरकार से सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर बात करेंगे और हमेशा के लिए युद्धविराम लगाएंगे। उन्होंने हिंसा न फैलाने, शहरों में कत्लेआम न करने और अमेरिका लौटने की तैयारी करने वाले अमेरिकी सैनिकों पर हमला न करने का भी वादा किया था। हालांकि तालिबान अमेरिकी सेना पर हमला न करने की अपनी बात पर कायम रहा है, लेकिन उसने अपने बाकी वादों को पूरा नहीं किया है।

तालिबान ने देश के प्रमुख हाईवे पर कब्जा करने के लिए मोटरगाड़ियों पर टैक्स लगाया। तालिबान ने पकई बॉर्डर क्रॉसिंग पर कब्जा किया और कस्टम ड्यूटी लगाई। इसके साथ ही तालिबान ने बड़ी संख्या में सरकारी अधिकारियों, मानवाधिकार और सिविल राइट एक्टिविस्ट्स, पुलिस अफसरों, पत्रकारों और धार्मिक गुरुओं की जान ली है।

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