पाकिस्तान ने तीन दिसंबर, 1971 को भारत के खिलाफ आपरेशन चंगेज खां किया था। शाम के समय भारत के 11 एयर बेस अमृतसर, अंबाला, आगरा, अवंतीपुर, बीकानेर, हलवाड़ा, जोधपुर, जैसलेमर, पठानकोठ, भुज, श्रीनगर पर उसने शाम 5:30 बजे के बाद हमला किया था। नेहरू नगर अपार्टमेंट निवासी ध्रुव बंसल (78) बताते हैं कि एक दिन रात को ब्लैक आउट हुआ। तब लड़ाई की बात किसी ने नहीं सोची थी। अचानक बम फटने की आवाज हुई। हमने सोचा कि इस समय कौन-सा आतिशबाजी का समय आ गया है जो लोग बम फोड़ रहे हैं। उस समय मैं आगरा इंजीनियर एसोसिएशन का सचिव था, जिससे 17 सरकारी व अर्द्ध सरकारी विभागों और व्यक्तिगत कार्य करने वाले इंजीनियर जुड़े हुए थे। अगले दिन मैं सुबह कमांडर वर्क्स इंजीनियर (सीडब्ल्यूई) कर्नल नांबियार के पास गया। कर्नल नांबियार मुझे एयरफोर्स स्टेशन लेकर गए। वहां देखा कि रनवे के नजदीक बम गिरे थे और उनसे जगह-जगह गड्ढे हो गए थे। रनवे को नुकसान नहीं हुआ था। एक बिना फटा हुआ बम भी कुछ दूरी पर पड़ा हुआ था। अखबारों से यह जानकारी मिली कि रात को हमला हुआ है। अरावली की पहाड़ियों से होते हुए पाकिस्तानी बमवर्षक विमान आगरा तक पहुंचे थे। पहाड़ियों में होने की वजह से वो रडार पर पकड़ में नहीं आ सके। पाकिस्तान का यह हमला निष्फल हो गया था। हमले के बावजूद लोगों में कोई दहशत नहीं थी। सभी पाकिस्तान से आर-पार की लड़ाई चाहते थे। इससे पूर्व 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को भारत बुरी तरह हरा चुका था।

बम गिरने से हो गया था गहरा गड्ढा

इतिहासविद राजकिशोर राजे बताते हैं कि खेरिया एयरपोर्ट पर बम गिरने के बाद वो उस जगह को देखने गए थे। वहां गहरा गड्ढा हो गया था और फसल जल गई थी। रात को ब्लैक आउट रहता था। घरों से बाहर रोशनी नहीं आने दी जाती थी।