Friday, September 17, 2021
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इलाहाबाद : हाईकोर्ट जज की मोदी को चिट्ठी- न्यायाधीशों की नियुक्ति वंशवाद और जातिवाद से ग्रसित

लखनऊ. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस रंगनाथ पांडेय ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्तियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोमवार को इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा। जस्टिस पांडेय ने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्तियों के लिए कोई निश्चित मापदंड नहीं है। प्रचलित कसौटी केवल परिवारवाद और जातिवाद से ग्रसित है। न्यायपालिका की गरिमा को बरकरार रखने के लिए सख्त फैसले लेना जरूरी है।

उन्होंने पत्र में लिखा, ”न्यायपालिका दुर्भाग्यवश वंशवाद और जातिवाद से ग्रसित है। यहां जजों के परिवार से होना ही अगला न्यायाधीश होना सुनिश्चित करता है। अधीनस्थ न्यायालय के न्यायाधीशों को भी अपनी योग्यता सिद्ध करने पर ही चयनित होने का अवसर मिलता है। लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति का हमारे पास कोई निश्चित मापदंड नहीं। प्रचलित कसौटी है तो केवल परिवारवाद और जातिवाद है।”

प्रधानमंत्री से सख्त कदम उठाने की मांग
जस्टिस पांडेय ने कहा कि 34 साल के सेवाकाल में उन्हें कई बार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को देखने का अवसर मिला। उनका विधिक ज्ञान संतोषजनक नहीं है। जब सरकार द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक चयन आयोग की स्थापना का प्रयास किया गया तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया था। जस्टिस पांडेय ने पिछले 20 साल में हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के विवाद और अन्य मामलों का हवाला देते हुए नरेंद्र मोदी से अपील की है कि न्यायपालिका की गरिमा को पुर्नस्थापित करने के लिए न्याय संगत कठोर निर्णय लिए जाएं।

‘कई न्यायाधीशों के पास विधिक ज्ञान तक नहीं’
जस्टिस पांडेय ने पत्र में लिखा, ”कई न्यायाधीशों के पास सामान्य विधिक ज्ञान तक नहीं है। कई अधिवक्ताओं (वकीलों) के पास न्याय प्रक्रिया की संतोषजनक जानकारी तक नहीं। कॉलेजियम के सदस्यों के पसंदीदा होने की योग्यता के आधार पर न्यायाधीश नियुक्त कर दिए जाते हैं। यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजो का चयन बंद कमरों में चाय की दावत पर वरिष्ठ न्यायाधीशों की पैरवी और पसंदीदा होने के आधार पर हो रहा है। इस प्रक्रिया में गोपनीयता का ध्यान रखा जाता है। प्रक्रिया को गुप्त रखने की परंपरा पारदर्शिता के सिद्धांत को झूठा करने जैसी है।”

 

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