Friday, September 17, 2021
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जानें छोटे बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण और इलाज का तरीका

ऑटिज्म या ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक दिमागी बीमारी है। इसमें मरीज न तो अपनी बात ठीक से कह पाता है ना ही दूसरों की बात समझ पाता है और न उनसे संवाद स्थापित कर सकता है। यह एक डेवलपमेंटल डिसेबिलिटी है। इसके लक्षण बचपन से ही नजर आ जाते हैं। यदि इन लक्षणों को समय रहते भांप लिया जाए, तो काबू पाया जा सकता है। एम्स के डॉ. उमर अफरोज के अनुसार, सामान्य इंसान में दिमाग के अलग-अलग हिस्से एक साथ काम करते हैं, लेकिन ऑटिज्म में ऐसा नहीं होता। यही कारण है कि उनका बर्ताव असामान्य होता है। यदि ठीक से सहायता मिले तो मरीज की काफी मदद हो सकती है।

छोटे बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण
बच्चे हमारी भाषा तो नहीं समझते, लेकिन हाव भाव और इशारों को समझना शुरू कर देते हैं। जिन बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण होते हैं, उनका बर्ताव अलग होता है। वे इन हाव भाव को समझ नहीं पाते या इन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हैं। ऐसे बच्चे निष्क्रिय रहते हैं। बच्चा जब बोलने लायक होता है तो साफ नहीं बोल पाता है। उसे दर्द महसूस नहीं होगा। आंखों में रोशन पड़ेगी, कोई छुएगा या आवाज देगा तो वे प्रतिक्रिया नहीं देंगे। थोड़ा बड़ा होने पर ऑटिज्म के मरीज बच्चे अजीब हरकतें करते हैं जैसे पंजों पर चलना।

अधिकांश बच्चों में अनुवांशिक कारणों से यह बीमारी होती है। कहीं-कहीं पर्यावरण का असर इस बीमारी का कारण बनता है। डॉक्टरों के मुताबिक, इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। बच्चे को जीवनभर इस खामी के साथ जीना पड़ता है। हां, लक्षणों को जरूर कम किया जा सकता है। गर्भावस्था की जटिलताओं के कारण भी बच्चे इसका शिकार बनते हैं।

बच्चों में ऑटिज्म का इलाज
ऑटिज्म का इलाज आसान नहीं है। बच्चे की स्थिति और लक्षण देखते हुए डॉक्टर इलाज तय करता है। बिहेवियर थेरेपी, स्पीच थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी से शुरुआती इलाज होता है। जरूरत पड़ने पर दवा दी जा सकती है। बिहेवियर थेरेपी, स्पीच थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी का यही उद्देश्य है कि बच्चे से उसकी भाषा में बात की जाए और उसके दिमाग को पूरी तरह जाग्रत किया जाए। ठीक तरह से इन थेरेपी पर काम किया जाए तो कुछ हद तक बच्चा ठीक हो जाता है। वह अजीब हरकत करना कम कर देता है। दूसरे बच्चों के साथ खेल में शामिल होने लगता है। एक ही शब्द या बात को बार-बार कहने की आदत छूट जाती है। इसलिए माता-पिता को सलाह दी जाती है कि वे बच्चे के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं। उसके हाव भाव को समझें। उनसे बात करने की कोशिश करें। ध्यान देने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि ऑटिज्म पीड़ित बच्चा भी सामान्य जीवन जी सकता है।

डॉ. उमर अफरोज के अनुसार, 26 सप्ताह से पहले पैदा हुए बच्चों पर खास नजर रखी जाना चाहिए। माता-पिता की आयु भी अहम भूमिका निभाती है। गर्भावस्था के दौरान महिलाएं अपनी मर्जी से दवाएं न लें। कुछ दवाओं के साइडइफेक्ट के कारण बच्चे इस बीमारी का शिकार होते हैं।

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