Monday, September 27, 2021
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BHU हाइड्रोकार्बन उत्पादों का पता लगा रहा

देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों में अकूत खनिज संपदा है। इसी क्रम में वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के भूविज्ञानियों की टीम असम के कुमचई में हाइड्रोकार्बन उत्पादों की संभावना का पता लगा रही है। इसके लिए BHU के विज्ञान संस्थान के जियो फिजिक्स विभाग में बने सेस्मिक इमेजिंग सेंटर में शोध कार्य शुरू हो चुका है। ऑयल इंडिया लिमिटेड द्वारा दिया गया यह प्रोजेक्ट मार्च, 2022 तक BHU के भूविज्ञानियों द्वारा सौंप दिया जाना है।

उसके बाद ड्रिलिंग कर हाइड्रोकार्बन उत्पादों को निकालने की कवायद शुरू हो जाएगी। सबसे खास बात यह है कि इस तरह के काम के लिए BHU एकमात्र शैक्षणिक संस्थान है जहां हाई कंप्यूटिंग मशीन इंस्टाल की गई है। यह मशीन एकेडमिक जरूरतों को पूरा करने के साथ ही BHU की आय का भी जरिया है।

BHU के विज्ञान संस्थान के जियो फिजिक्स विभाग में सेस्मिक इमेजिंग सेंटर में हाई कंप्यूटिंग मशीन के साथ वैज्ञानिक।
BHU के विज्ञान संस्थान के जियो फिजिक्स विभाग में सेस्मिक इमेजिंग सेंटर में हाई कंप्यूटिंग मशीन के साथ वैज्ञानिक।

300 किलामीटर के क्षेत्र में तलाशी जा रही संभावना

असम के कुमचई में 300 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में यह टीम हाइड्रोकार्बन का पता लगा रही है और एक तिहाई काम पूरा भी हो चुका है। उम्मीद है कि जल्द ही बेहतर परिणाम सामने आएंगे। यदि वहां पर तेल और गैस मिलती है तो यह देश की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। भारत के विदेशी व्यापार में सबसे बड़ा हिस्सा हाइड्रोकार्बन उत्पाद के आयात का है। इसे कम करने के बाद ही विदेशी मुद्रा के भंडार के बड़े हिस्से को सुरक्षित कर पाएंगे।

दान में मिली थी हाई कंप्यूटिंग मशीन

BHU में 8 जुलाई 2019 को जियोफिजिक्स डिपार्टमेंट में सेस्मिक इमेजिंग सेंटर शुरू हुआ था। इसका संचालन विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. अनिल कुमार त्रिपाठी के मार्गदर्शन में अशोक कुमार पांडेय और विभागाध्यक्ष प्रो. राजीव भाटला करते हैं। अशोक कुमार पांडेय ने ही BHU को 6 करोड़ रुपए की हाई कंप्यूटिंग मशीन दान में दी थी, उसके बाद यहां इस सेंटर की शुरूआत हुई। मशीन के संचालन की जिम्मेदारी भी BHU द्वारा उन्हें ही दे दी गई।

BHU के विज्ञान संस्थान के जियो फिजिक्स विभाग में सेस्मिक इमेजिंग सेंटर में हाई कंप्यूटिंग मशीन।
BHU के विज्ञान संस्थान के जियो फिजिक्स विभाग में सेस्मिक इमेजिंग सेंटर में हाई कंप्यूटिंग मशीन।

मशीन का 10वां भाग ही हो रहा है संचालित

अशोक पांडेय ने बताया कि ऑयल इंडिया लिमिटेड द्वारा भेजे गए आंकड़ों को सेंटर में प्रॉसेस किया जाता है। यहां लगी हाई कंप्यूटिंग मशीन से यह काम पूरा किया जाता है। इस मशीन के 10वें भाग से भी कम हिस्से को प्रयोग में लाया जा रहा है। अभी काफी आंकड़ों की गणना की जा रही है। आगे चलकर ओएनजीसी भी एक प्रोजेक्ट देगा, तब इसके दूसरे भाग को चालू किया जाएगा।

ध्वनि तरंगों को गुजारते हैं जमीन से

इस मशीन के द्वारा जमीन के अंदर मौजूद तमाम पदार्थों और खनिजों का पता लगाते हैं। इसमे कंप्यूटर की स्क्रीन पर ग्राफनुमा चित्र खुल जाते हैं, जिनमें से कई चरणों में न्वाइज हटाकर स्पष्ट डेटा प्राप्त करते हैं। अंत में यह पता चल जाता है कि जमीन की कितनी गहराई में हाइड्रोकार्बन उत्पाद या कोई दूसरा खनिज है। इसका पता लगाने के लिए सबसे पहले जमीन के ऊपर एक ब्लास्ट किया जाता है। वहां 2 हर्ट्ज से लेकर 20 हजार हर्ट्ज तक की ध्वनि तरंगें जमीन में दौड़ती हैं। इन ध्वनि तरंगों के मूवमेंट और गति के आधार पर ही यह पता लगता है कि हाइड्रोकार्बन उत्पाद है तो कितना अंदर है।

ऐसे होता है प्रॉसेस

दरअसल ध्वनि तरंगों की गति ठोस, द्रव और गैस तीनों में अलग-अलग हो जाती है। यदि जमीन के नीचे हाइड्रोकार्बन उत्पाद है तो ध्वनि सबसे पहले गैस से गुजरेगी, जहां उसकी स्पीड सबसे कम होगी। वहीं उसके बाद पेट्रो पदार्थ यानि कि द्रव्य होगा तो तरंगों की स्पीड बढ़ जाएगी। जबकि, ठोस अवस्था में आने पर वह बहुत तेज गति से चलती है। इसी पैटर्न पर यह पता लगता है कि अंदर किस तरह के खनिज मौजूद हैं।

30 फीसदी काम हो चुका है पूरा

प्रो. भाटला ने बताया कि ऑयल इंडिया लिमिटेड द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट इंटीग्रेटेड सेस्मिक इमेजिंग एंड ज्वाइंट इनवर्जन के तहत BHU में हाइड्रोकार्बन की मौजूदगी का पता लगाया जा रहा है। ज्वाइंट इनवर्जन से तात्पर्य यह है कि हम अब कंपनी द्वारा दिए डेटा से ही खनिज पदार्थों का पता लगा रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस प्रोजेक्ट का 30 फीसदी काम अब तक पूरा हो चुका है।

BHU के शोध छात्रों और प्रोफेसरों को उनके रिसर्च कार्य में यह मशीन काफी मददगार है और भविष्य में अच्छा रेवेन्यू भी बीएचयू को मिलेगा। इस मशीन पर काम करने के लिए जियो फिजिक्स के छात्रों को मुंबई का रुख करना पड़ता था। मगर, अब वह विभाग में ही काम कर लेते हैं। एक तरह से यह मशीन एकेडमिक जरूरतों को पूरा करने में भी लाभदायक साबित हुई है।

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