Sunday, September 19, 2021
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प्रणव मुखर्जी बोले- गुजराल की सरकार नहीं गिराती कांग्रेस तो BJP सत्ता में नहीं आती

  • गुजराल सरकार से समर्थन वापस लेना क्या कांग्रेस की भूल थी?
  • गुजराल सरकार के बाद हुए चुनाव में NDA की सरकार बनी

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की मानें तो गुजराल सरकार से कांग्रेस ने समर्थन वापस लेकर अपनी ही राह में कांटे बोने का काम किया है. प्रणव मुखर्जी ने पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल की 100वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में बुधवार को दिल्ली में बोलते हुए कहा कि कांग्रेस ने अगर 1997 में गुजराल सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया होता तो शायद 1998 में बीजेपी को सत्ता में आने से रोक सकते थे. इसका मतलब साफ है कि कांग्रेस ने गुजराल सरकार से समर्थन वापस लेकर बीजेपी को सत्ता में आने का मौका दे दिया.

प्रणव मुखर्जी ने कहा कि 1998 में बीजेपी को सत्ता में आने से शायद रोक सकते थे. गुजरात सरकार हमारे (कांग्रेस के) समर्थन से अपना कार्यकाल पूरा कर सकती थी. उन्होंने कहा कि गुजराल की जब सीताराम केसरी से बातचीत चल रही थी. तब मैं भी वहां पर था. उन्होंने कहा कि जब (राजीव गांधी) हत्याकांड से डीएमके का कोई स्पष्ट संबंध स्थापित नहीं हुआ तो उन्हें गठबंधन सरकार से बाहर क्यों किया जाए?

गुजराल 1997 में बने थे पीएम

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि इसके बावजूद उन्होंने अपनी सरकार का भी खतरा उठा लिया. कांग्रेस ने गुजराल सरकार से समर्थन वापस ले लिया. इसके बाद अगले मार्च में क्या हुआ ये सब जानते हैं. बीजेपी ने 180 से ज्यादा सीटें जीती और सत्ता में आने का मौका मिल गया. 1998 में एनडीए की सरकार बनी. इस दौरान प्रणव मुखर्जी ने इंद्र कुमार गुजराल की विदेश नीति की भी तारीफ की. बात दें कि पूर्व पीएम इंद्र कुमार गुजराल 21 अप्रैल 1997 से लेकर 19 मार्च 1998 तक देश के प्रधानमंत्री रहे थे. 30 नवंबर, 2012 में 92 वर्ष की उम्र में गुजराल का निधन हो गया था.

मुखर्जी ने अपनी किताब में किया है जिक्र

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अपनी किताब ‘कोलिशन ईयर्स: 1996–2012’ में भी गुजराल सरकार से समर्थन वापस लेने के प्रकरण का उल्लेख किया है. उन्होंने किताब में लिखा है कि 1997 में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी ने प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा के लिए गुजराल की सरकार को गिराया था.

मुखर्जी ने लिखा है कि कांग्रेस ने राजीव गांधी की हत्या की जांच करने वाले जैन आयोग की अंतरिम रिपोर्ट के बाद गुजराल सरकार से समर्थन वापस लेने की मांग की. जैन आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था कि डीएमके और इसका नेतृत्व लिट्टे प्रमुख वी प्रभाकरन और उसके समर्थकों को बढ़ावा देने में शामिल था. जबकि साजिश में किसी नेता या किसी राजनीतिक दल के शामिल होने की बात नहीं कही गई थी. कांग्रेस गुजराल सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी.

डीएमके के बहाने गुजराल सरकार से लिया समर्थन

मुखर्जी ने लिखा है कि 1997 में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान इस संकट को दूर करने के प्रयास में कई बैठकें हुई थीं. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने सीताराम केसरी, प्रणव मुखर्जी, जितेंद्र प्रसाद, अर्जुन सिंह और शरद पवार समेत कांग्रेस नेताओं को अपने निवास पर रात्रिभोज पर बुलाया था. इस दौरान गुजराल ने कहा कि डीएमके के किसी नेता के इसमें शामिल होने का सीधा प्रमाण नहीं. ऐसी स्थिति में डीएमके के खिलाफ कार्रवाई से गलत संदेश जाएगा और साथ ही सरकार को एक पार्टी के दबाव में काम करने वाली माना जाएगा.

मुखर्जी ने लिखा कि हमने गुजराल से कहा कि उनकी बात को कांग्रेस कार्यसमिति में रखेंगे और कमेटी इस पर अंतिम फैसला लेगी. कांग्रेस के अधिकतर सदस्य सरकार से समर्थन लेने के पक्ष में नहीं थे. इसके बावजूद कमेटी ने सरकार से समर्थन वापस लेने का प्रस्ताव पारित कर दिया. इसके बाद अगले साल लोकसभा चुनाव हुए बीजेपी 180 से ज्यादा सीटें जीतकर आई और एनडीए की सरकार बनी.

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