Friday, September 24, 2021
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ब्लैक फंगस के इंजेक्शन की महा मारामारी, रोज 9000 चाहिए, मिल रहे 500, 80 की मौत, 350 की निकाली आंखें

कोरोना के बाद सूरत मिकोर माइकोसिस(ब्लैक फंगस) महामारी की चपेट में है। कोरोना की तरह सरकारी रजिस्टर में ब्लैक फंगस के केस और मौत कम ही दर्ज है, जबकि हकीकत में केसों और मौतों की संख्या डराने वाली है। सूरत जिले में इस महामारी में करीब 1500 केस सामने आ चुके हैं और 80 मरीज अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि 350 मरीजों की जान बचाने के लिए उनकी आंख निकालनी पड़ी है। शहर में सिविल और स्मीमेर अस्पताल के अलावा करीब तीन दर्जन प्राइवेट अस्पतालों में ब्लैक फंगस के मरीज भर्ती हैं।

सिविल अस्पताल में भर्ती मांडवी निवासी मनीषा को इंजेक्शन नहीं मिला, अब वे वेंटिलेटर पर हैं।
  • 1500 मरीज शहर में, लेकिन सरकार के पास न डाटा न दवा आपूर्ति का इंतजाम, 80% को नहीं मिल रहा इंजेक्शन
  • हालात वही निजी अस्पताल में इंजेक्शन नहीं मिला, सरकारी में आए तो वहां भी नहीं है

दुखद पहलू यह है कि इस बीमारी का एकमात्र इलाज एम्फोटेरेसिन बी इंजेक्शन है,जो उपलब्ध नहीं है। परिजन इंजेक्शन के लिए भटक रहे हैं और सरकारी स्तर पर आपूर्ति नहीं है। डॉक्टरों के मुताबिक इस बीमारी में डेथ रेट कोरोना से कहीं ज्यादा है। एक बार ब्लैक फंगस का शिकार होने के बाद करीब 55 प्रतिशत मरीजों की मौत होने की आशंका रहती है।

ब्लैक फंगस को काबू करने वाला एम्फोटेरेसिन बी इंजेक्शन आउट ऑफ स्टॉक है। मार्केट और निजी अस्पतालों में इंजेक्शन उपलब्ध नहीं है। सरकारी अस्पतालों में इंजेक्शन बहुत कम संख्या में आ रहे हैं। इंजेक्शन नहीं मिलने से मरीज की आंख निकालने और उसकी मौत होने की आशंका ज्यादा बढ़ जाती है।

खाना-पानी खुद मांग कर लेती थी अब वेंटिलेटर पर

1 मांडवी निवासी 54 वर्षीय मनीषा 20 दिन से इस बीमारी से जूझ रही है।10 मई से सिविल अस्पताल में भर्ती है। एक निजी अस्पताल में ऑपरेशन करवाया, लेकिन वहां इंजेक्शन नहीं मिला। परिजन मजबूरी में उसे सिविल अस्पताल लाये। सिविल में भी 2-3 दिन में इंजेक्शन लगता है। तीन दिन पहले खुद बोल कर खाना-पानी मांगती थी। अब वेंटिलेटर पर हैं।

ऑपरेशन के बाद 3 दिन तक इंजेक्शन नहीं मिला

2 अडाजण निवासी 68 वर्षीय लता बेन गांधी का 9 मई को एक निजी अस्पताल में ऑपरेशन हुआ। वहां इंजेक्शन नहीं मिलने पर 12 मई को सिविल में भर्ती हो गईं। शुरू के तीन दिन तक उन्हें इंजेक्शन ही नहीं मिला। डॉक्टरों ने कहा कि जब आएगा तब दे देंगे। उसके बाद अब दो या तीन दिन में इंजेक्शन का नंबर आता है। हालत यह है कि ऑपरेशन के 12 दिन बाद भी कोई आराम नहीं है।

आंख जाने के बाद भी राहत नहीं, हालत नाजुक
3 उधना निवासी 57 वर्षीय सारदा बेन को एक माह पहले इंफेक्शन हुआ। निजी अस्पताल में पहले नाक, फिर आंख और गले का ऑपरेशन किया और आंख निकाल दी। बाद में निजी अस्पताल ने कहा कि इंजेक्शन मिल नहीं रहा है। परिजनों ने 11 मई को सिविल अस्पताल में भर्ती करा दिया। यहां पर भी अब कभी दो दिन बाद कभी तीन दिन बाद एक बार इंजेक्शन लगता है।

21 दिन तक 6 इंजेक्शन प्रतिदिन

ब्लैक फंगस इंफेक्शन में मरीज को 6 एम्फोटेरेसिन बी इंजेक्शन प्रतिदिन 21 दिन तक लगते हैं। ऐसे में 1500 मरीजों के लिए प्रतिदिन 9000 इंजेक्शन चाहिए। लेकिन इतनी सप्लाई नहीं है। हालात यह है कि सिविल में इंजेक्शन की खेप मिलने पर प्राथमिकता के आधार पर कुछ ही मरीजों को इंजेक्शन लग पाता है। एक बार इंजेक्शन देने के बाद मरीजों को दो से चार दिन बाद दूसरी डोज के इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इंफेक्शन खत्म करने के लिए यह इंजेक्शन जरूरी है।

सरकार ने मिकोर माइकोसिस को महामारी घोषित कर दिया है। इसलिए हम रोजाना का डाटा तैयार करेंगे। अभी तक सिविल में 80 और स्मीमेर में 36 मरीज भर्ती हैं। निजी अस्पतालों का डाटा शनिवार से मिलना शुरू होगा। कुल 6 मरीजों की मौत हुई है, इसमें सूरत शहर का एक ही मरीज है। बाकि बाहर के मरीज हैं। सूरत शहर में 32 केस हैं।
-डॉ आशीष नायक, डिप्टी कमिश्नर (हेल्थ)

सिविल अस्पताल में एम्फोटेरेसिन बी इंजेक्शन का स्टॉक नहीं है। इंजेक्शन कभी आते हैं और कभी नहीं आते। हम प्रतिदिन सरकार को पत्र लिख कर डिमांड करते हैं। उनकी क्या कैलकुलेशन है? हमें नहीं पता। हम डिमांड मरीजों की संख्या के अनुरूप ही करते हैं।

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