Friday, September 17, 2021
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नए IT एक्ट पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त

बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार से पूछा कि 2009 में लागू हुए मौजूदा आईटी नियमों को बदले बिना 2021 में नए कानून को लागू करने की क्या जरूरत थी? चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जीएस कुलकर्णी की बेंच नए IT एक्ट पर अंतरिम रोक लगाने के दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

यह याचिका न्यूज वेबसाइट ‘लीफलेट’ और पत्रकार निखिल वागले की ओर दायर की गई थी। दोनों याचिकाओं में नए नियमों के कई प्रावधानों पर आपत्तियां जताई गई है। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि नए नियम संविधान द्वारा प्रदान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से परे हैं। ये नियम संविधान के अनुच्छेद 19 (2) का उल्लंघन करते हैं।

नए नियम पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई

द लीफलेट के अधिवक्ता डेरियस खंबाटा ने कोर्ट से नए नियमों के कार्यान्वयन पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है। पिछली सुनवाई में खंबाटा ने दलील दी थी कि ऐसा पहली बार हो रहा है कि सामग्री पर खुलकर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा था कि ये नियम आईटी कानून के मापदंडों से परे जाते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जवाबदेही और शिकायत निवारण का भी प्रावधान किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया था कि सामग्री को विनियमित करने और जवाबदेही की मांग का आधार उन मापदंडों पर आधारित है जो अस्पष्ट हैं और मौजूदा आईटी अधिनियम के प्रावधानों और अनुच्छेद 19 के तहत बोलने की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार से कहीं परे हैं।

प्रेस काउंसिल ने भी बनाया है नियम

बेंच ने शुक्रवार को वर्बल आदेश से कहा कि वह नए नियमों के क्रम संख्या नौ पर दोनों याचिकाकर्ताओं को सीमित राहत देने के लिए इच्छुक है, जो आचार संहिता के पालन से संबंधित है। इससे पहले सुनवाई के दौरान, केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने कहा कि यहां तक कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) ने भी पत्रकारों द्वारा पालन की जाने वाली आचार संहिता निर्धारित की है।

अदालत ने पूछा-आप किसी के विचार की स्वतंत्रता को कैसे प्रतिबंधित कर सकते हैं

हालांकि, पीठ ने कहा कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के दिशानिर्देश में भी उल्लंघन के लिए कोई कठोर सजा नहीं है। बेंच ने कहा, ‘आप पीसीआई दिशानिर्देशों पर इतना सख्त रुख कैसे दिखा सकते हैं? जब तक आपके पास विचार की स्वतंत्रता नहीं है, आप कुछ भी कैसे व्यक्त कर सकते हैं? आप किसी की विचार की स्वतंत्रता को कैसे प्रतिबंधित कर सकते हैं?’

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