Sunday, September 19, 2021
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अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नगालैंड के कुछ इलाकों में लागू नहीं होगा CAB

  • पूर्वोत्तर के इलाकों में नहीं लागू होगा बिल
  • आदिवासी और परमिट वाले क्षेत्र बिल से बाहर

सरकार संसद में नागरिकता संशोधन बिल को लेकर आ रही है जिसकी कई विपक्षी दल पुरजोर विरोध कर रहे हैं. कैबिनेट ने बुधवार को इस बिल को मंजूरी दी है और अब इसके संसद में पारित होने का इंतजार है. जानकारी के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश के इनर लाइन परमिट इलाकों के साथ-साथ नगालैंड और मिजोरम को इस बिल के दायरे से बाहर रखा गया है.

नागरिकता संशोधन बिल से पूर्वोत्तर के वह इलाके भी बाहर रखे गए हैं जो छठी अनुसूची का हिस्सा हैं. यह प्रावधान शुरू में बिल का हिस्सा नहीं थे, इन्हें बाद में शामिल किया गया है. विपक्षी दलों के विरोध के बाद पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़े यह प्रवाधान बाद में बिल में शामिल किए गए हैं. पूर्वोत्तर के राज्यों में इस बिल को लेकर काफी गुस्सा है और वहां लगातार इसके खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं.

इन इलाकों में लागू नहीं

देश के अन्य राज्यों में रहने वाले लोगों को इन तीन राज्यों में जाने के लिए परमिट की जरूरत होती है. इस इनर लाइन परमिट सिस्टम के जरिए यहां की देशज आबादी को संरक्षण प्रदान किया जाता है. साथ ही छठी अनुसूची में असम, मेघालय और त्रिपुरा के आदिवासी इलाके शामिल हैं जहां नागरिकता संशोधन बिल लागू नहीं होगा.

इस विधेयक के संसद में पारित होकर कानून बन जाने के बाद पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में उत्पीड़न के शिकार हिंदुओं, ईसाइयों, सिखों, पारसियों, जैनों और बौद्ध अनुयाइयों को भारत की नागरिकता दी जा सकेगी. यह विधेयक चुनिंदा श्रेणियों के अवैध प्रवासियों को नागरिकता का पात्र बनाने के लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 को संशोधित करने के लिए है.

पूर्वोत्तर में भारी विरोध

विधेयक में मुस्लिमों को शामिल नहीं करने पर विपक्ष, अल्पसंख्यक संगठनों और अन्य ने हमला बोला है. उन्होंने इस तर्क पर भी इस विधेयक का विरोध किया कि यह संविधान के खिलाफ है, क्योंकि संविधान धर्म के आधार पर किसी नागरिक से भेदभाव नहीं करता है.

इस बिल को अवैध प्रवासियों की परिभाषा बदलने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. गैर मुस्लिम 6 धर्म के लोगों को नागरिकता प्रदान करने के प्रावधान को आधार बना कांग्रेस और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट धार्मिक आधार पर नागरिकता प्रदान किए जाने का विरोध कर रहे हैं. नागरिकता अधिनियम में इस संशोधन को 1985 के असम करार का उल्लंघन भी बताया जा रहा है, जिसमें सन 1971 के बाद बांग्लादेश से आए सभी धर्मों के नागरिकों को निर्वासित करने की बात थी.

 

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