Friday, September 24, 2021
Homeराजस्थानकर सकते हैं स्कूल पर क्षतिपूर्ति का दावा

कर सकते हैं स्कूल पर क्षतिपूर्ति का दावा

सड़क पर चलते हुए गढ्‌डे में गिरने से घायल होने या फिर वाहन क्षतिग्रस्त होने, कुत्ते के काटने, पानी में बहने या फिर सार्वजनिक -गैर सार्वजनिक सेवा में कमी से हुए आह नुकसान पर लॉ ऑफ टॉर्ट्स (अपकृत्य विधि) के जरिए मुआवजा ले सकते हैं। हालांकि लॉ ऑफ टॉर्ट्स अंग्रेजी कानून है और विदेशों में ज्यादा प्रचलन में है। भारत में भी अब यह नए कॉमन लॉ के जरिए फैल रहा है।साथ ही उपभोक्ता कानून, मोटर दुर्घटना कानून व लेबर कानून और लोक अदालत के जरिए मुआवजा ले सकते हैं। इसके तहत कानूनी प्रावधान यह भी है कि अगर किसी मालिक का नौकर कोई ऐसा एक्ट करता है जो गलत है तो उसके लिए उसका मालिक भी व्यापक जिम्मेदारी में बंधा हुआ है।

कानूनविद व राजस्थान यूनिवर्सिटी के हैड एंड डीन फैकल्टी ऑफ ला डॉ. जीएस राजपुरोहित का कहना है यदि कानूनी अधिकारों का उल्लंघन हुआ है और कोई क्षति नहीं भी पहुंची है तो भी पक्षकार मुआावजे का अधिकारी है। हर नागरिक के विधिक व संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना सरकार का दायित्व है। वहीं अधिवक्ता प्रतीक कासलीवाल बताते हैं कि भारत में लॉ ऑफ टॉर्ट्स एक्ट को प्रभावी तरीके से लागू किया जाना चाहिए ताकि आमजन को उसके अधिकारों के उल्लंघन व उनमें अतिक्रमण होने पर सरल प्रक्रिया के तहत क्षतिपूर्ति हो सके।

केस 1 : कुत्तों ने ली थी मासूम की जान, निगम पर 10 लाख हर्जाना

उपभोक्ता मामलों के अधिवक्ता देवेन्द्र मोहन माथुर का कहना है राज्य उपभोक्ता आयोग ने कुत्तों के काटने से 2011 में सूर्य नगर तारों की कूंट निवासी 6 साल के बच्चे की मौत पर निगम पर उपभोक्ता मंच (द्वितीय) के 10 लाख रुपए हर्जाने का आदेश बहाल रखा था। आदेश में कहा गया था कि निगम कई टैक्स लेता है। कुत्तों को पकड़ना निगम की जिम्मेदारी है।

केस 2 : चाइनीज मांझे से मौत पर सरकार को देना पड़ा आवजा

अधिवक्ता स्वराज शर्मा ने बताया एडीजे कोर्ट ने 3 जनवरी 2016 को चाइनीज मांझे से गला कटने से 6 साल के विजेन्द्र की मौत पर सरकार को परिजनों को 5.30 लाख रुपए मुआवजा देने का निर्देश दिया था। वहीं तत्कालीन कलेेक्टर, बस्सी एसडीओ, पुलिस कमिश्नर और बस्सी एचएसओ को दोषी मानते हुए कहा था कि पुलिस प्रशासन प्रतिबंधित मांझे की बिक्री नहीं रोक पाया।

केस3 : एलपीजी में आग से दो की मौत पर 51 लाख का हर्जाना

राज्य उपभोक्ता आयोग ने जुलाई 2019 में दिए फैसले में हरमाड़ा की पंच विहार कॉलोनी में एलपीजी में आग से महिला समेत 2 की मौत पर एचपीसी कंपनी व श्रावणी गैस एजेंसी, सीकर रोड पर 51 लाख का हर्जाना लगाया था। इस मामले में गैस एजेंसी ने अप्रशिक्षित मैकेनिक को गैस सिलेंडर सही करने भेजा था और उस दौरान ही सिलेंडर ने आग पकड़ी थी जिसके चलते दो जनों की मौत हुई। उपभोक्ता आयोग ने इस मामले में गैस एजेंसी सहित एचपीसी कंपनी को जिम्मेदार माना था।

केस 4 : दस्तावेज गुम, एसबीआई पर 50.65 लाख रुपए का हर्जाना

उपभोक्ता आयोग ने उपभोक्ता का लोन चुकता होने के बाद भी उपभोक्ता को उसकी संपत्ति के दस्तावेज व एफडीआर नहीं लौटाने व उन्हें गुमाने को एसबीआई (तत्कालीन एसबीबीजे बैंक) की सेवाओं में भारी कमी मानते हुए एसबीआई पर 50.65 लाख रुपए का हर्जाना लगाया था।

केस 5 : शार्ट सर्किट से हुई बच्ची की मौत पर बिजली निगम दोषी

शार्ट सर्किट से बच्ची की मौत पर डिस्कॉम पर 2.50 लाख हर्जाना लगाया गया था। अन्य मामले में अदालत ने दौसा में कृषि कनेक्शन की लाइन में 2016 में शार्ट सर्किट से आग से नौ माह की बच्ची की जलने से हुई मौत मामले में जयपुर डिस्कॉम पर ढाई लाख रुपए का हर्जाना लगाया था।

केस 6 : नुकसान की भरपाई के विदेशी उदाहरण भी कम नहीं हैं

रायलैंड बनाम फलैक्चर केस में विदेश की स्थानीय अदालत ने कुंआ खोदने से पड़ोसी पड़ोसी के कुंए का पानी सूखने पर भी क्षतिपूर्ति राशि दिलवाई। वहीं ब्रिटिश कोर्ट ने एएसबी बनाम व्हाइट केस में वोटर को वोट नहीं दिए जाने के चलते क्षतिपूर्ति राशि दिलवाई। कोर्ट ने कहा कि भले ही प्रार्थी का प्रत्याशी चुनाव में जीत गया हो लेकिन उसे वोट नहीं देने के कारण वह अपने मताधिकार से वंचित हुआ है। ऐसे में वह जिम्मेदारों से क्षतिपूर्ति राशि प्राप्त करने का अधिकारी है।

जिम्मेदारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने और मुआवजा लेने का हक

आपराधिक केसों के अधिवक्ता दीपक चौहान का कहना है सड़क पर चलने के दौरान हुए हादसे में गंभीर या सामान्य चोट पर संबंधित एजेंसी व उनके अफसरों पर धारा 336, 337 व 338 के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाया जा सकता है। संबधित एजेंसी या जिम्मेदारों को यह ऐसा ही मामला जादोलाल चौधरी व अन्य बनाम निगम केस जयपुर मेट्रो कोर्ट में लंबित है जिसमें जुलाई 2016 में सीवरेज का ढक्कन खुला होने के चलते एक स्कूली बच्चे की उसमें गिरने से मौत हो गई थी। इसमें भी कार्रवाई की गई थी।

लॉ ऑफ टॉर्ट्स और कानूनी प्रावधान कानूनविद् डॉ. सीपी गुप्ता बताते हैं कानून के क्षेत्र में ऐसे दोषपूर्ण कार्य को अपकृत्य या अपकृति (Tort) कहते हैं। अपकृति का प्रयोग कानून में किसी ऐसे अपकार अथवा क्षति के अर्थ में होता है जिसकी तय विशेषताएं हैं। सड़क पर चलना हमारा हक है। राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि हम सड़क पर सुरक्षित चलें। सड़क पर चलने के दौरान यदि कोई हादसा होता है तो उसकी जिम्मेदारी सड़क निर्माता व देखभाल करने वाली एजेंसी की है। ऐसे में कोई जिम्मेदार बच नहीं सकता है।

घर पहुंचने तक स्कूल प्रशासन ही बच्चे का अभिभावक

अधिवक्ता डॉ. योगेश गुप्ता का कहना है बच्चे के स्कूल से घर तक सही पंहुंचाने की जिम्मेदारी स्कूल प्रशासन की है। बच्चों से किसी भी तरह के हादसे पर स्कूल प्रशासन पर सिविल लायबिलिटी के तहत मुआवजे के लिए दावा किया जा सकता है। इसके अलावा स्कूल परिसर या स्कूल प्रशासन के क्षेत्राधिकार में स्टूडेंट्स के साथ कोई वारदात होती है तो स्कूल प्रशासन पर सिविल लायबिलिटी बनती है और वह लॉ ऑफ टॉर्ट्स के दायरे में आता है।
आपके पास ऐसा कोई केस हो तो 9772201498 पर हमें बताएं।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments