Monday, September 20, 2021
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झरिया विस सीट : परिवार का महाभारत, जेठानी-देवरानी आमने-सामने; 45 साल से इस कुनबे का झरिया-धनबाद में दबदबा

रांची. झारखंड विधानसभा चुनाव में पिछली बार की तरह इस बार भी सबसे ज्यादा चर्चा झरिया सीट की ही है। यहां से कोयलांचल के प्रभावशाली परिवार की दो बहुएं आमने-सामने हैं। पिछले चुनाव में दोनों के पति एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़े थे। 2012 में आई फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर में तिग्मांशु धूलिया द्वारा निभाया गया रामाधीर सिंह का किरदार इसी परिवार के मुखिया सूर्यदेव सिंह से प्रेरित बताया जाता है।

सूर्यदेव सिंह की दो बहुएं चुनाव मैदान में
कोयलांचल की सबसे हॉट सीटों में झरिया विधानसभा सीट पर सूर्यदेव सिंह की दो बहुएं चुनावी मैदान में हैं। रागिनी सिंह सूर्यदेव सिंह के मंझले बेटे संजीव की पत्नी हैं। रागिनी सूर्यदेव सिंह के बड़े बेटे राजीव रंजन की पत्नी थीं, लेकिन उनकी हत्या के बाद संजीव सिंह ने 2013 में रागिनी से शादी कर ली। दूसरी बहू पूर्णिमा सिंह सूर्यदेव सिंह के भाई राजन सिंह के बेटे नीरज सिंह की पत्नी हैं। 2014 में इस सीट से भाजपा के टिकट पर संजीव सिंह और कांग्रेस के टिकट पर नीरज सिंह ने चुनाव लड़ा था, जिसमें नीरज सिंह को हार का सामना करना पड़ा था। 21 मार्च 2017 को नीरज सिंह की हत्या हो गई। संजीव सिंह फिलहाल नीरज सिंह की हत्या के आरोप में जेल में हैं। इस बार के चुनाव में दोनों की पत्नियां मैदान में हैं।

जानिए परिवार का इतिहास
सिंह मेंशन संजीव सिंह के पिता सूर्यदेव सिंह ने बनवाया था, जबकि रघुकुल को सूर्यदेव सिंह के छोटे भाई राजन सिंह के बेटों ने बनवाया था। सूर्यदेव सिंह शुरूआत में परिवार के मुखिया थे। उनके 4 भाई राजनारायण सिंह, बच्चा सिंह, विक्रम सिंह और रामाधीर सिंह हैं। इनमें सूर्यदेव सिंह, राजन सिंह की मौत हो चुकी हैं, जबकि बच्चा सिंह झारखंड सरकार में मंत्री रह चुके हैं। रामाधीर सिंह उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। विक्रम सिंह बलिया ही रहते हैं।

शुरुआत में सिंह मेंशन में सूर्यदेव सिंह सभी भाइयों के साथ रहते थे। सूर्यदेव सिंह की मौत के बाद परिवार संपत्ति और अन्य कारणों से बिखरता चला गया। सूर्यदेव सिंह और रामाधीर सिंह के परिवार सिंह मेंशन में बने रहे, जबकि बच्चा सिंह ने सूर्योदय बना लिया तो राजन सिंह के परिवार ने रघुकुल। बच्चा सिंह रहते तो सूर्योदय में हैं, लेकिन उनकी हमदर्दी राजन सिंह के बेटों नीरज सिंह, एकलव्य सिंह और गुड्डू के प्रति ज्यादा है। सूर्यदेव सिंह के परिरवार से राजन सिंह के पुत्रों और चाचा बच्चा सिंह ने दूरी बना ली है।

ऐसे शुरू हुई थी सूर्यदेव सिंह की कहानी
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के गोन्हिया छपरा से करीब 1960 में रोजी-रोटी की तलाश में सूर्यदेव सिंह धनबाद पहुंचे थे। यहां छोटे-मोटे काम के दौरान एक दिन उन्होंने अखाड़े में पंजाब के किसी पहलवान को कुछ मिनटों में चित कर दिया। इसके बाद कोयलांचल में उनका नाम चमकने लगा। धीरे-धीरे वे मजदूरों के नेता भी बन गए। 1964 से 1974 तक विभिन्न मजदूर संगठनों में रहे। साल 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर झरिया सीट से विधानभा चुनाव लड़ा और उस वक्त के बड़े श्रमिक नेता एसके राय को हराकर विधायक बने। सूर्यदेव 1980, 1985 और 1990 में विधायक बने। 1991 में हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गई।

सूर्यदेव सिंह का परिवार
सूर्यदेव सिंह की शादी कुंती सिंह से हुई। दोनों के तीन बेटे राजीव रंजन सिंह, संजीव सिंह और सिद्धार्थ गौतम और एक बेटी किरण सिंह है। इनमें राजीव रंजन की हत्या हो चुकी है। सूर्यदेव सिंह जब बलिया से धनबाद आए और जब उनका सिक्का चल निकला तो धीरे-धीरे वे अपने भाइयों को यहां लेकर आए। बलिया से कनेक्शन होने की वजह से सूर्यदेव सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का खास रिश्ता था। जब पहली बार सूर्यदेव सिंह विधायक का चुनाव लड़े तो चंद्रशेखर की वजह से ही उन्हें टिकट मिला था।

मजदूर नेता बीपी सिन्हा हत्याकांड में आया था सूर्यदेव सिंह का नाम
सूर्यदेव सिंह जब पहली बार विधायक बने थे, उसके करीब एक साल बाद मार्च 1978 को धनबाद-झरिया के मशहूर मजदूर नेता बीपी सिन्हा की हत्या में उनका नाम आया था। बाद में कोर्ट ने उन्हें इस हत्याकांड से बरी कर दिया था। बीपी सिन्हा की हत्या के बाद कोयलांचल में सूर्यदेव सिंह ने सिंह मैंशन के रूप में मजबूत राजनीतिक घराने की नींव रखी। झरिया विधानसभा क्षेत्र उनका कर्मभूमि बन गया।

सूर्यदेव के भाई, पत्नी और बेटे भी झरिया से विधायक बने
सूर्यदेव सिंह झरिया से 1977, 1980, 1985 और 1990 में विधानसभा चुनाव जीते। बाद में उनकी विरासत को उनके छोटे भाई बच्चा सिंह ने संभाला। फरवरी 2000 में संयुक्त बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में बच्चा सिंह ने झरिया विधानसभा सीट से चुनाव जीता और बाबूलाल मरांडी की सरकार में नगर विकास मंत्री बने। जब परिवार में दरार पड़ी तो सूर्यदेव सिंह की पत्नी कुंती सिंह ने सूर्यदेव सिंह के विरासत को संभाला। कुंती देवी 2005 और वर्ष 2009 में विधायक बनीं। इसके बाद वर्ष 2014 में सूर्यदेव सिंह के बेटे संजीव सिंह झरिया के विधायक बने।

10 साल तक गुमशुदा रहे राजीव रंजन
सूर्यदेव सिंह के बड़े बेटे राजीव रंजन का नाम विनोद सिंह हत्याकांड, सकलदेव सिंह हत्याकांड, मनींद्र मंडल हत्याकांड, रवि भगत हत्याकांड में आया था। 3 अक्तूबर 2003 में प्रमोद सिंह हत्याकांड में अभियुक्त बनाए जाने के बाद राजीव रंजन सिंह फरार हो गए थे। 10 वर्षों  तक राजीव रंजन की गुमशुदगी रहस्यमय बनी रही थी। चर्चा होती रही थी कि सुरेश सिंह ने उत्तर प्रदेश के माफिया ब्रजेश सिंह के सहयोग से राजीव रंजन की हत्या करा दी। बाद में पुलिस जांच में भी यह खुलासा हुआ।

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