Sunday, September 19, 2021
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सैकड़ों की तादाद में अंडों से आहर आ रहे घड़ियाल, मगरमच्छ और कछुए

राजस्थान में घड़ियालों के नाम से पहचान बना चुके करौली जिला मुख्यालय से 60 किमी दूर चंबल के किनारे टापू पर बसे देवगिरी किले के नीचे दिव्य घाट पर सैकड़ाें घड़ियाल, मगरमच्छ व कछुओं का प्रजनन हुआ है। यूं तो पाली, केसोरायपाटन से उत्तर प्रदेश के इटावा और धौलपुर तक घड़ियालों का पसंदीदा इलाका है, लेकिन इस बार करौली जिले के दिव्य घाट पर घड़ियालों के अंडों से हजारों की तादात में बच्चे जन्मे हैं। वहीं, मगरमच्छ-कछुओं के बच्चों का भी प्रजनन हुआ है।

कछुओं की नेस्टिंग के लिए बनाई 4 हैंचरियों से 600 कछुए अंडों से निकल कर बाहर आ गए हैं। नवजात शिशु घड़ियालों को चंबल नदी के किनारे बालू रेत पर रेंगते हुए व मादा घड़ियाल की पीठ पर बैठे अठखेलियां करते देखा जा सकता है। पहली बार करौली मे कछुओं के लिए मंडरायल रेंज के घमूस घाट पर हैचरी बनाई गई। इनकी सुरक्षा के लिए करणपुर क्षेत्र चंबल घाटों पर वन रक्षक सुरेंद्र चौधरी, गणपत चौधरी व घड़ियाल वॉलेंटियर महेश मीना व सुरेश मीना नेस्टिंग पाइंटों पर निगरानी में लगे है।

घड़ियालों का प्रजनन… 40 सेमी गहरे गड्डे में 50 से 70 अंडों का मादा करती है सेक

चंबल मे घड़ियालों के कई प्रजनन स्थल हैं। यहां रेत में मादा घड़ियाल मई व जून माह में 30 से 40 सेमी गहरा गड्डा खोदकर 50 से 70 तक अंडे देती है और मादा कवच से ऊपर बैठकर सेक करती है। घड़ियालों का मुख्य भोजन मछलियां होती हैं। साथ ही जलीय पक्षी व छोटे छोटे स्तनधारी भी खा सकते है। छोटे घड़ियाल तो निश्चित आकर की मछलियां ही खा सकते हैं।

घड़ियालों का मुख्य भोजन मछलियां होती हैं।
घड़ियालों का मुख्य भोजन मछलियां होती हैं।

घड़ियाल के नाम से पहचाना जाता है जिला

वर्ष 2015 में जिला स्तरीय वन्यजीव एवं पशु पक्षी के रुप में घड़ियाल सहित हॉर्नबिल व रेडवेटेड बुलबुल के नाम से प्रस्ताव भेजे थे। इसमें सरकार ने अक्टूबर 2015 में वन्यजीव एवं पशु पक्षी के रूप में घड़ियाल के नाम से पहचान की स्वीकृति दे दी थी, तभी से जिले को राज्य में घड़ियाल मुख्य केंद्र के रूप में जाना जाता है। महाराजपुरा से लेकर घूसई चंबल तक 12 प्रजनन केन्द्र है। यहां दिव्य घाट, गौटा घाट, अस्थल, कैमोखरी, घमूस घाट, घूसई घाट सहित कई स्थानों पर मादा घड़ियाल-कछुओं के प्रजनन स्थल बने हुए हैं।

600 कछुए निकल कर सुरक्षित बाहर आ गए हैं।
600 कछुए निकल कर सुरक्षित बाहर आ गए हैं।

पांच रेंजों में हुए प्रजनन में करौली सबसे बड़ा

इटावा, धौलपुर, केसोरायपाटन, पालीघाट, मंडरायल सहित पांच रेंज बनी हुई है। इससे सबसे ज्यादा घड़ियाल धौलपुर व करौली में हैं। कई घाटों पर घड़ियालों की हैचलिंग हो चुकी है। अभी अंडे गड्ढों मे रखे है। हैचलिंग पूरी होने के बाद गणना रिपोर्ट कराई जाएगी।

वन विभाग को ऐसी सफलता पहली बार मिली

घड़ियाल सेंचुरी के डीएफओ अनुल कुमार यादव ने कहा कि चंबल नदी किनारे घड़ियाल व कछुओं का भारी प्रजनन हुआ है। गत वर्ष गणना रिपोर्ट के अनुसार पाली घाट से लेकर धौलपुर तक घड़ियालाें के 23 प्रजनन केन्द्रों पर नेस्टिंग हुई थी। अभी हैचलिंग शुरू हुई है। विभाग को पहली बार यह सफलता मिली है कि 600 कछुए निकल कर सुरक्षित बाहर आ गए हैं।

पहली बार कछुओं की नेस्टिंग के लिए मंडरायल रेंज के घूघस घाट, राजघाट के शंकरपुर व अंडवापुरैनी घाट व धौलपुर में हैचरियां बनाई है।
पहली बार कछुओं की नेस्टिंग के लिए मंडरायल रेंज के घूघस घाट, राजघाट के शंकरपुर व अंडवापुरैनी घाट व धौलपुर में हैचरियां बनाई है।

विभाग ने इसलिए बनाई हेचरियां… ताकि जानवरों से सुरक्षित रहे अंडे

पहली बार कछुओं की नेस्टिंग के लिए मंडरायल रेंज के घूघस घाट, राजघाट के शंकरपुर व अंडवापुरैनी घाट व धौलपुर में हैचरियां बनाई है। विभाग को पहली बार यह सफलता मिली है कि 3 हजार अंडों मे से 600 से अधिक कछुए निकल कर सुरक्षित बाहर आ गए है। हेचरियां इस लिए बनाई गई ताकि इनके गड्ढों तक कोई जंगली जानवर अंडों तक न पहुंचे और वह सुरक्षित रहे।

वर्ष 1975 में घड़ियाल व मगरमच्छ बचाने के लिए चलाया था अभियान- वन्य जीवों-पक्षियों का बना स्वर्ग

चंबल नदी विलुप्त हो रहे वन्यजीवों की आश्रय स्थली है। इनमें घड़ियाल, डोलफिन, औटर, 11 प्रजातियों के कछुए व कई प्रकार की मछलियां प्रमुख है। इस नदी के किनारों पर रेगिस्तानी व जलीय फोना व फलोरा का अदभुत संगम है प्रवासी पक्षी बार हेडेड, गीज, रुडी, शेलडक, पिलटेल, नाव या स्टीमर से भी देखे जा सकते है।

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