Sunday, September 19, 2021
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दक्षिण चीन सागर में UN के नियमों के पालन पर भारत का जोर

दक्षिण चीन सागर को लेकर भारत ने रुख स्पष्ट किया है। कहा है कि वहां पर संयुक्त राष्ट्र के समझौतों और नियमों का पालन होना चाहिए। इस समुद्री क्षेत्र को लेकर जो बातचीत हो वह सारे दुराग्रहों को छोड़ते हुए संबद्ध पक्षों के बीच हो। यह बात विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पूर्व एशिया सम्मेलन (ईएएस) में अपने वर्चुअल उद्बोधन में कही। इस दौरान उन्होंने हिंद-प्रशांत महासागर क्षेत्र में संपर्क का मार्ग बनाए रखने पर जोर दिया। इससे अलग जयशंकर ने आसियान-भारत के विदेश मंत्रियों की बैठक में संपर्क और अन्य मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने अच्छे समझौतों के तहत आपसी व्यापार पर जोर दिया, जिसमें संबद्ध पक्षों को लाभ हो सके। ईएएस में विदेश मंत्री ने कहा, दक्षिण चीन सागर में संयुक्त राष्ट्र के नियमों का पालन करते हुए सभी पक्षों के हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए। विदित हो कि इस समुद्री क्षेत्र को चीन अपना हिस्सा बताते हुए उस पर कब्जा करने में लगा है। वहां पर चीन ने कई कृत्रिम द्वीप बना लिए हैं और नौसेना व वायुसेना तैनात कर दी है।

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर बुधवार को 11वें पूर्वी एशिया सम्मेलन शामिल हुए। विदेश मंत्रियों की बैठक को संबोधित करते हुए भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दक्षिण चीन सागर में काम चल रहे काम पर बोले। भारत ने रुख स्पष्ट किया है।

चीन प्राकृतिक गैस और तेल भंडार की प्रचुरता वाले इस समुद्री क्षेत्र पर वियतनाम, फिलीपींस, ब्रूनेई और मलेशिया के अधिकार को पूरी तरह से नकारता है। चीन वहां से मालवाही जहाजों के आवागमन पर भी आपत्ति जताता है। इसी मार्ग से हिंद महासागर और प्रशांत महासागर जुड़ते हैं और हजारों करोड़ रुपये का माल आता-जाता है। भारत इस समुद्री क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र के समुद्र संबंधी नियमों के तहत आवागमन चाहता है। ईएएस में जयशंकर ने आसियान के म्यांमार के संबंध में पांच बिंदुओं वाली समाधान योजना का स्वागत किया और उसके समर्थन का एलान किया। दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के समूह द्वारा म्यांमार के लिए विशेष दूत की नियुक्ति का भी समर्थन किया। भारतीय विदेश मंत्री ने कोविड-19 महामारी से मुकाबले में भारत के पूरे सहयोग का भी आश्वासन दिया। उन्होंने ट्राईलेट्रल हाईवे और कालादान प्रोजेक्ट की गति बढ़ाने पर भी जोर दिया। ईएएस में दस आसियान देशों के अलावा भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अमेरिका और रूस के प्रतिनिधि भी शामिल हुए।

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