Tuesday, September 28, 2021
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तालिबान के रुख से तय होगी भारत की भावी अफगानिस्‍तान नीति

तालिबान ने सभी पड़ोसी देशों के साथ सामान्य कूटनीतिक रिश्ता रखने की बात कही है और साथ ही यह भी वादा किया है कि अफगानिस्तानी जमीन का इस्तेमाल किसी दूसरे देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। भारत इन बातों पर फिलहाल भरोसा नहीं करेगा और जमीनी तौर पर तालिबान का क्या रुख होता है इसका इंतजार करेगा।

तालिबान के काबुल पर कब्जा के बाद भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका ब्रिटेन जर्मनी समेत दूसरे देश अपने दूतावासों को खाली कर वहां के हालात पर नजर रखे हुए हैं। अफगानिस्तान के हालात को लेकर भारत दूसरे मित्र राष्ट्रों के साथ भी संपर्क में है।

भारत की भावी रणनीति पूरी तरह से तालिबान के रवैये पर निर्भर

भारत की भावी रणनीति पूरी तरह से तालिबान के रवैये पर निर्भर करेगी और आगे के हालात की बहुआयामी दृष्टिकोण से समीक्षा के बाद ही कूटनीतिक संबंधों को लेकर फैसला होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं पूरे हालात पर नजर रखे हुए हैं।

मोदी की अध्यक्षता में सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की बैठक में हुआ विमर्श

मंगलवार को भी पीएम मोदी की अध्यक्षता में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक हुई जिसमें अफगानिस्तान के ताजा हालात की समीक्षा की गई है।

अफगानिस्तान के हालात की पूरी तस्वीर पीएम के सामने पेश

सूत्रों ने बताया है कि बैठक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे विमर्श और तालिबान के कब्जे के बाद अफगानिस्तान में पैदा हुए हालात की पूरी तस्वीर पीएम के सामने पेश की गई है। विदेश सचिव हर्ष श्रृंगला ने भारतीय कूटनीति के समक्ष चुनौतियों और संभावनाओं का ब्योरा पेश किया। माना जा रहा है कि तालिबान के सत्ता में आने के बाद देश की पश्चिमी सीमा (खास तौर पर जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में) को लेकर उत्पन्न चुनौतियों की भी इस बैठक में समीक्षा की गई है। बैठक में गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल शामिल थे।

मित्र राष्ट्रों के संपर्क में भारत

अफगानिस्तान के हालात को लेकर भारत दूसरे मित्र राष्ट्रों के साथ भी संपर्क में है। विदेश मंत्री एस जयशंकर अभी अमेरिका की यात्रा पर हैं जहां उनकी इस बारे में अमेरिकी नेताओं के साथ ही महत्वपूर्ण बातचीत की शुरुआत हो चुकी है। सोमवार रात ही अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन से उनकी बात हुई है। दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच भी विमर्श हुआ है। अभी दोनों देश अफगानिस्तान से अपने-अपने नागरिकों व अधिकारियों को बाहर निकालने को लेकर आपसी सामंजस्य स्थापित कर रहे हैं।

तालिबान की कथनी और करनी में फर्क 

तालिबान के प्रवक्ता के प्रेस कांफ्रेंस में कही गई बातों के बारे में अधिकारियों का कहना है कि अभी उन पर भरोसा करने का कोई मतलब नहीं है। पिछले दो वर्षों के दौरान हम देख चुके हैं कि तालिबान की कथनी और करनी में काफी अंतर होता हैं। अधिकारियों का कहना है कि भारत जिन मुद्दों पर अफगानिस्तान को लेकर फैसला करेगा उसमें दो तीन चीजें महत्वपूर्ण होंगी। पहला, वहां की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ ना हो। दूसरा अल्पसंख्यकों व महिलाओं के साथ व्यवहार कैसा रहता है और भारत के साथ वर्ष 2011 में किए गए रणनीतिक समझौते को लेकर उसका रवैया क्या होता है।

भारत के लिए अफगानिस्तान बहुत अहम

बताते चलें कि पिछले 20 वर्षों में भारतीय कूटनीति में अफगानिस्तान की अहमियत बहुत बढ़ गई है। इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इस छोटे से देश में भारत ने एक दूतावास के अलावा हेरात, जलालाबाद, मजार-ए-शरीफ और कंधार में अपने कांसुलेट खोल रखे थे। पाकिस्तान के विरोध के बावजूद अफगानिस्तान को दक्षिण एशियाई देशों के सहयोग संगठन सार्क का सदस्य बनाया गया था। आतंकवाद के मुद्दे पर अफगानिस्तान ने हमेशा भारत का समर्थन किया है।

दुनिया की अफगानिस्तान पर नजर

तालिबान के काबुल पर कब्जा के बाद भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी समेत दूसरे देश अपने दूतावासों को खाली कर वहां के हालात पर नजर रखे हुए हैं। हालांकि चीन, रूस, पाकिस्तान, तुर्की जैसे कुछ देशों की तरफ से कहा गया है कि उनके दूतावास को खाली नहीं करवाया गया है। पाकिस्तान ने मंगलवार को कहा है कि तालिबान सरकार को वह मान्यता देने को लेकर जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करेगा बल्कि इस बारे में मित्र देशों व अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के साथ विमर्श करने के बाद कोई फैसला करेगा। कई अंतरराष्ट्रीय जानकारों का मानना है कि तालिबान की अगुवाई में बनी सरकार को उक्त चारों देशों की तरफ से ही सबसे पहले मान्यता दी जा सकती है।

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