Saturday, September 18, 2021
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सुरक्षा परिषद की संरचना में सुधारों के मुद्दे को आगे बढ़ाना भारत के व्यापक हित में

वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से वैश्विक भू-राजनीति जैसे मुद्दों में भारी बदलाव आया है, लेकिन यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल की वर्तमान संरचना भी वर्ष 1945-46 की भू-राजनीतिक परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करती हुई नजर आती है। जब यूएन यानी संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई थी तब उसके चार्टर पर दस्तखत करने वाले सिर्फ 50 देश थे। आज उनकी संख्या 193 हो गई है, लेकिन उसकी संरचना में खास बदलाव नहीं आया है। कहा जा सकता कि आज जो सुरक्षा परिषद है वह उस भू-राजनीतिक परिस्थिति का प्रतिनिधित्व करती है जो द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में थी।

संयुक्त राष्ट्र के इस शीर्ष मंच पर अध्यक्षीय संबोधन की ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने वाले नरेंद्र मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। इस अवसर को भुनाने के लिए सुरक्षा परिषद की संरचना में सुधारों के मुद्दे को आगे बढ़ाना भारत के व्यापक हित में रहेगा

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से कई देश इसमें शामिल हुए हैं, इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद नए देशों और क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने में असफल रहा है। आज भी दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका जैसे महाद्वीप का एक भी देश संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य नहीं है। एशिया जैसे बड़े महाद्वीप का भी प्रतिनिधित्व उसके महत्व के अनुरूप नहीं है। बीते दशकों में विश्व की आर्थिकी व राजनीति का स्वरूप बहुत बदल गया है और विकासशील देशों की संख्या तेजी से बढ़ी है, किंतु स्थायी सुरक्षा परिषद में केवल एक देश ही विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व करता है।

भारत तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। ऐसा ही ब्राजील के साथ है। जापान विकसित देश है और जर्मनी यूरोप का सबसे समृद्ध राष्ट्र है। परंतु इनमें से कोई भी सुरक्षा परिषद में नहीं है। ऐसे में यह कह सकते हैं कि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद आज की दुनिया की वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है और चुनौतियों का समाधान करने में असमर्थ है। वैश्विक बिरादरी के समक्ष नए मुद्दे मसलन पर्यावरण, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और शरणार्थी समस्या इत्यादि ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं। अत: यूएन तथा इसकी सुरक्षा परिषद की संरचना और कार्यशैली में भी बदलाव होना बेहद जरूरी है। कोविड महामारी को 21वीं सदी में मानवता का सबसे बड़ा संकट माना जा रहा है। लेकिन संकट के इस वैश्विक परिदृश्य में जिस प्रकार संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन का असफल नेतृत्व दिखा, वह वाकई चिंताजनक है। इसमें कोई शक नहीं कि संयुक्त राष्ट्र कोरोना वायरस के वैश्विक संकट पर प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देने में असमर्थ रहा है।

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