जोधपुर :जोधपुर एनएलयू: यहां फूलों से नहीं, शब्दों से अतिथियों का स्वागत, विदाई में मोमेंटो की जगह देते हैं भारतीय संविधान

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जोधपुर . नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी जोधपुर में दस साल पहले बनाए नियम आज भी लागू हैं और यहां इन नियमों से ऊपर कोई नहीं है। इन नियमों की पालना न केवल यहां के स्टूडेंट्स, शिक्षक व कर्मचारियों को करनी पड़ती है बल्कि विश्वविद्यालय में आने वाले हर अतिथि के लिए भी ये नियम अक्षरशः लागू होते हैं। एनएलयू के पूर्व कुलपति जस्टिस एनएन माथुर ने अपने कार्यकाल के दौरान वर्ष 2009 ये नियम बनाए थे, जो आज भी लागू हैं। यहां अतिथियों का स्वागत फूलमालाओं अथवा पुष्पगुच्छ से नहीं, बल्कि शब्दों से होता है। वहीं अतिथियों को विदाई में भारतीय संविधान दिए जाते हैं।

किसी का इंतजार नहीं: एनएलयू में स्टूडेंट्स की डिग्री पूरी होने के बाद होने वाला दीक्षांत समारोह तय है कि जनवरी के तीसरे रविवार को ही होगा। इस आयोजन में बतौर मुख्य अतिथि किसी न्यायविद् अथवा शिक्षाविद् को बनाया जाता है। यदि कोई आने की सहमति नहीं देता है तो भी दीक्षांत समारोह की तिथि नहीं बदली जाती। समारोह निश्चित तिथि पर ही होता है।
स्वागत: संस्थान में आने वाले किसी अतिथि के स्वागत के लिए खास व्यवस्था नहीं की जाती। यहां तक कि स्वागत पुष्पगुच्छ व फूलमालाओं से करने की भी परंपरा नहीं है। यदि अतिथि लेक्चर लेने आते हैं तो सीधे लेक्चर लेने चले जाते हैं और यदि किसी आयोजन में शामिल होते हैं तो स्वागत भाषण में उनका शब्दों से स्वागत किया जाता है।
स्मृति: यहां स्मृति में महंगे मोमेंटो आदि नहीं दिए जाते, बल्कि एनएलयू में भारतीय संविधान की छोटी सी किताब देने की परंपरा है।
व्यवस्था: किसी भी अतिथि चाहे वे राज्यपाल हों या चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया, उनके ठहरने के लिए एनएलयू कोई व्यवस्था नहीं करती। जोधपुर के सर्किट हाउस में व्यवस्था करवा दी जाती है। यूनिवर्सिटी के कन्वेंशन हॉल में।

वीआईपी कल्चर के खिलाफ था, इसीलिए बनाए नियम: जस्टिस माथुर :
जस्टिस माथुर का कहना है कि वर्ष 2009 में मैंने एनएलयू जोधपुर के कुलपति का कार्यभार संभाला था। मैं वीआईपी कल्चर के खिलाफ था, इसीलिए छात्र हितों को ध्यान में रखते हुए ये नियम बनाए, जिसे आज भी फॉलो किया जा रहा है। एनएलयू में सबसे बड़ा आयोजन होता है दीक्षांत समारोह। वर्ष 2009 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस बालाकृष्णन को आमंत्रित किया गया था, उन्होंने तिथि को बदलने के लिए कहा, लेकिन हमने नहीं मानी और बालाकृष्णन के नहीं आने पर भी दीक्षांत समारोह आयोजित किया।

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