Monday, September 27, 2021
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धूल में मौजूद कार्बन व आयन से 100 गुना फैलता है काेराेना संक्रमण

धूल से कोरोना का संक्रमण 10 गुना ज्यादा फैलता है। सामान्य क्षेत्र जहां धूल कम हाे, वहां काेराेना का एक पाॅजिटिव मरीज 10 लोगों में संक्रमण फैलाता है तो धूल वाले इलाके में उसी वायरल लोड वाला मरीज 100 लोगों को संक्रमित करेगा। इसकी वजह धूल में कार्बन व आयन का शामिल होना है। पं. रविवि के रसायन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शम्स परवेज ने रिसर्च में ये खुलासा किया है। उनका टाॅपिक धूल से काेराेना का तेजी से संक्रमण था।

उनकी रिसर्च यूएसए के जनरल साइंस आफ द टोटल इन्वायरमेंट में प्रकाशित हो चुकी है। राजधानी में पिछले साल 18 मार्च को कोरोना का पहला मरीज मिला था। उसके बाद से अब तक 1,57,835 मरीज मिल चुके हैं। विवि के केमेस्ट्री विभाग की फैकल्टी ने संक्रमण का धूल पर असर, टॉपिक पर रिसर्च करने का निर्णय लिया। धूल में कार्बन व आयन होता है। इससे एलर्जी बढ़ती है। यही नहीं श्वसन नली में जब यह धूल पहुंचती है, तब छींक व गले में खराश होती है। गला दर्द भी करता है। इस स्थिति में गला या श्वसन नली कोरोना के वायरस को तेजी से खींचता है और फेफड़े तक पहुंचा देता है।

वायरस सांस की नली के माध्यम से शरीर में तेजी से प्रवेश करने के लिए अनुकूल हो जाता है। वायरस की एंट्री होने से लोग कोरोना से संक्रमित हो जाते हैं। समय पर इलाज मिला तो वह जल्दी ठीक हो जाता है और देरी करने पर सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। यह प्रारंभिक अवस्था में तो ठीक है, लेकिन अगर ऑक्सीजन सेचुरेशन 94 से कम हो तो ऑक्सीजन चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ऑक्सीजन सेचुरेशन 70 या 65 से कम हो तो मरीज को वेंटीलेटर पर रखना पड़ता है। डॉ. परवेज ने बताया कि वेंटीलेटर पर रहने के बावजूद कई मरीज स्वस्थ हो जाते हैं, वहीं जिनकी इम्युनिटी कम हो, ऐसे लोगों की मौत भी हो जाती है।

औसत 40 माइक्रोग्राम से ज्यादा नहीं होनी चाहिए धूल

हवा में धूल का वार्षिक औसत 40 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर नहीं होना चाहिए। दैनिक में यह 60 पीएम से ज्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन टाटीबंध, बिरगांव, उरला, भनपुरी, जयस्तंभ चौक, शास्त्री चौक में कई बार 70 पीएम से ज्यादा धूल होती है। यह न केवल कोरोना के संक्रमण को बढ़ाने के लिए अनुकूल होती है, बल्कि अस्थमा के मरीजों की परेशानी भी बढ़ाता है। 8 अप्रैल से 31 मई तक राजधानी में लॉकडाउन रहा। इस दौरान हवा में धूल की मात्रा 40 पीएम से कम हो गई थी। पिछले साल भी देशव्यापी लॉकडाउन के समय हवा में धूल की मात्रा औसत से कम पाई गई।

एक्सपर्ट व्यू; जहां धूल उड़ती है, वहां की सड़कों पर पानी का छिड़काव करना चाहिए

धूल से खासकर अस्थमा के मरीजों को बहुत दिक्कत होती है। एलर्जी भी बढ़ती है। राजधानी में हर सीजन में सड़कों से धूल उड़ती है, जिससे कई लोगों को एलर्जी भी होती है। धूल काेरोना के मरीजों को भी प्रभावित करता है।
-डॉ. आरके पंडा, एचओडी श्वसन रोग मेडिकल कॉलेज

राजधानी के विभिन्न इलाकों में हवा में धूल की मात्रा अलग-अलग होती है। जहां धूल उड़ती है, वहां की सड़कों पर पानी का छिड़काव किया जाना चाहिए। रिसर्च में साबित हुआ है कि कोरोना के मामले में धूल संक्रमण के खतरे को 10 गुना बढ़ा देता है।
-डॉ. शम्स परवेज, प्रोफेसर केमेस्ट्री रविवि

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