Thursday, August 5, 2021
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मेडिक्लेम सिर्फ 11.65 करोड़ मिला , 363 करोड़ की राशि अब भी अटकी

कोरोना की दूसरी लहर में संक्रमित हुए हजारों लोग और उनके परिजन करीब 375 करोड़ रु. की हेल्थ क्लेम की राशि के लिए बीमा कंपनियों के चक्कर लगा रहे हैं। कंपनियां लगभग 11.65 करोड़ रु. की क्लेम राशि निपटा चुकी हैं, लेकिन 363 करोड़ की राशि अब भी अटकी हुई है।

वजह है-

 बीमा कंपनियों द्वारा माइल्ड कंडीशन को आधार बनाकर क्लेम को सीधे तौर पर ठुकरा देना। ऐसे असंतुष्ट ग्राहक अब बीमा कंपनियों के शिकायत निवारण सेल, बीमा लोकपाल और उपभोक्ता फोरम में शरण ले रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनके क्लेम बीमा कंपनियों ने सीटी स्कोर के आधार पर ठुकराए। तर्क दिया कि इस सीटी स्कोर पर तो अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत ही नहीं थी, पॉलिसीधारक घर में ही ठीक हो सकता था। ज्यादातर मामले एक से दो महीने पुराने हैं।

नियमानुसार पॉलिसीधारकों को सबसे पहले बीमा कंपनियों के शिकायत निवारण सेल में शिकायत करके उसके निपटारे के लिए 15 दिन का समय देना होता है। इसके बाद ही शिकायत बीमा लोकपाल और उपभोक्ता फोरम में दर्ज की जाती है। अभी करीब हेल्थ कवर से जुड़ीं 5000 शिकायतें पूरे प्रदेश से बीमा कंपनियों के पास पहुंची हैं, भोपाल में इन शिकायतों की संख्या करीब 1100 है। बीमा लोकपाल सूत्रों ने बताया कि उनके पास 35 शिकायतें आई हैं, जिनमें सीटी स्कोर 5 से कम होने पर क्लेम ठुकरा दिए गए हैं।

पॉलिसीधारकों ने बताया कि जिनका सीटी स्कोर मॉडरेट या सीवियर था, उनके भी क्लेम में 50 से 70% की कटौती की गई। बीमा विशेषज्ञ अमृता तिवारी ने बताया कि राजधानी समेत प्रदेश के कई निजी अस्पतालों ने कोरोना पैकेज बना दिए थे। इनमें इलाज कराने वालों को खर्च का ब्रेकअप नहीं दिया। इस आधार पर बीमा कपंनियों ने क्लेम ठुकरा दिए। जब ग्राहक वापस इन अस्पतालों में गए तो उन्होंने ब्रेकअप देने से ही मना कर दिया।

दो केस… महंगे इंजेक्शन का खर्च देने से भी दो टूक मना कर दिया

अर्जुन मार्टिन 8 अप्रैल को कोरोना पॉजिटिव हुए। एम्स में भर्ती हुए। हालात बिगड़ी तो 4 दिन बाद उन्हें सिद्धांता में भर्ती कराया। बिल 2.22 लाख बना। उनके पास एक निजी बीमा कंपनी का हेल्थ कवर था। उसे यह बिल रीइंबर्समेंट को भेजा, पर कंपनी ने महज 80 हजार रुपए का बिल ही स्वीकृत किया। बीमा कंपनियों का कहना है कि कई इंजेक्शन, दवाएं जो दी गईं, उनकी जरूरत नहीं थी।

बरखा श्रीवास्तव मई में कोरोना पॉजिटिव हुईं। वे एक निजी अस्पताल में 10 दिन भर्ती रहीं। डिस्चार्ज होने पर उनका बिल 3.50 लाख रुपए आया। उनके पास हेल्थ कवर था। उन्हें केवल 2.50 लाख रुपए का ही रीइंबर्समेंट मिला। बीमा कंपनी का कहना था कि उन्हें कई दवाएं ऐसी दी गईं, जिनकी उन्हें कोई जरूरत ही नहीं थी। उनका सिटी स्कोर बहुत कम है।

माइल्ड कंडीशन वाले पेशेंट को अस्पतालों ने जबरन भर्ती किया, हजारों के बिल बनाए। बीमा कंपनियां मेरिट पर ही कवर देती हैं। कोरोना पैकेज में इलाज कराने वाले पॉलिसीधारकों को अस्पतालों ने इलाज का ब्रेकअप ही नहीं दिया। ऐसे में उन्हें कवर कैसे दिया जा सकता है। -एम एन शर्मा, सेक्रेटरी, जनरल इंश्योरेंस काउंसिल

क्लेम का गणित

1. भोपाल में दूसरी लहर में लगभग 75 हजार लोग संक्रमित हुए। इनमें से करीब 50 हजार ने सरकारी और 25 हजार ने प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराया।

2. प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का औसतन खर्च 1.50 लाख रुपए था। इस हिसाब से प्राइवेट अस्पतालों को कुल 375 करोड़ रुपए मिले।

3. बीमा कंपनियों ने भोपाल में औसतन 54 हजार, मप्र में 60 हजार और भोपाल में 90 हजार रुपए का काेविड क्लेम दिया।

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