Friday, September 24, 2021
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मोनिका मलिक के मन की बात : महिला हॉकी को लेकर बदली लोगों की सोच

टोक्यो ओलिंपिक में शानदार प्रदर्शन करने वाली भारतीय महिला हॉकी टीम की प्लेयर मोनिका मलिक बुधवार सुबह चंडीगढ़ अपने घर लौटी। सेक्टर-44 की रहने वाली मोनिका मलिक ने अपने हॉकी करियर और टोक्यो ओलिंपिक से जुड़ी कई बातें साझा की। मोनिका ने कहा कि उन्हें खुशी है कि देश में हॉकी के लिए अब सोच बदलने लगी है। लोग हॉकी को प्यार करने लगे हैं। जिस तरह हमारा दिल्ली में स्वागत हुआ है, उससे हमें लगता है कि देश में हॉकी का लेवल अब उठने लगा है।

पिता पहलवान बनाना चाहते थे

मोनिका ने कहा कि उन्हें बचपन से ही हॉकी खेलने का शौक था। हालांकि पिता तकदीर सिंह मलिक उन्हें रेसलर बनाना चाहते थे। लेकिन मुझे डर लगता था कि कहीं कान-नाक न टूट जाएं। इसलिए मैंने हॉकी खेलना शुरू किया। शुरू के दिनों में तो मैं अपनी एक सहेली के साथ ही ग्राउंड में हॉकी खेलने जाती थी। हमें वहां पीने के लिए फ्रूटी मिलती थी और हम उसी में बहुत खुश हो जाते थे। धीरे-धीरे गेम को सीरियसली लेना शुरू किया और फिर चंडीगढ़ हॉकी एकेडमी में एडमिशन लिया।

एकेडमी ज्वॉइन करने के बाद करियर बनाने का सोचा

मोनिका ने बताया कि एकेडमी ज्वॉइन करने के बाद ही उसने इस गेम में करियर बनाने के बारे में सोचना शुरू किया। अच्छे प्रदर्शन की बदौलत मैं 2011 में नेशनल हॉकी टीम में सिलेक्ट हो गई थी। इसके बाद कई चैंपियनशिप खेलीं। ये उनका दूसरा ओलिंपिक था। मोनिका ने कहा कि रियो ओलिंपिक 2016 में हमारा प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था, लेकिन इस बार सोचा था कि कुछ अच्छा करके ही वापस लौटेंगे।

शायद हमारा दिन नहीं था, इसलिए हार गए

मोनिका ने बताया कि शायद हमारा दिन नहीं था, इसलिए हम मेडल जीतने से चूक गए। नीरज चोपड़ा ने भी गोल्ड जीतने के बाद यही कहा था कि वह मेरा अच्छा दिन था। हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ। ब्रॉन्ज मेडल वाले मैच में ग्रेट ब्रिटेन से 3-2 की लीड लेने के बाद भी हम हार गए। लेकिन ये हार भी हमारे लिए जीत के बराबर ही है। हमारा लीग राउंड में दुनिया की बेस्ट टीम के साथ मैच था और फिर हमने क्वार्टर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया को हराया। वह जीत हमारे लिए बेहद खास रही थी।

धूप में प्रैक्टिस करते थे

मोनिका ने बताया कि हमारे कोच शुअर्ड मरिने ने हमारे खेल पर काफी ध्यान दिया और उनकी कोचिंग की बदौलत ही हम इस लेवल तक पहुंच सके। उन्होंने हमें धूप में प्रैक्टिस करवाई, ताकि हम जापान के मौसम में ढल सके। कई बार तो टी-शर्ट के ऊपर जैकेट डालकर भी प्रैक्टिस करते थे। कोच मरिने के साथ प्रैक्टिस करना बेहद मुश्किल था, लेकिन अब महसूस होता है कि उनकी सख्ती ही हमारी कामयाबी बनी है।

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