Sunday, September 26, 2021
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मध्यप्रदेश : दिव्यांग बेटे को ओवरसीज स्कॉलरशिप दिलाने 11 महीने सिस्टम से लड़ी मां

भोपाल. कोलार की सांईनाथ कॉलोनी में रहने वाले हर्ष वजीरानी भारत सरकार की ओवरसीज स्कॉलरशिप के लिए चयनित हुए हैं। वे मध्यप्रदेश में दिव्यांग श्रेणी के इकलौते व्यक्ति हैं। हर्ष कहते हैं कि सिलेक्शन जरूर हो गया, लेकिन डेढ़ करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप के लिए इतने ही रुपयों की साल्वेंसी मांगी गई। सारे नाते-रिश्तेदारों ने हमसे किनारा कर लिया था। हमारे लिए डेढ़ करोड़ रुपए की साल्वेंसी जुटाना पहाड़ जैसा काम था। मां ने हार नहीं मानीं। केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत और विभाग के अफसरों से मिलीं। नियम बदला और तय हुआ कि 50 हजार रुपए की एफडी से काम चल जाएगा।

हर्ष कहते हैं कि हफ्ते भर में स्कॉलरशिप की पहली किस्त रिलीज हो जाएगी। मैं एयरो स्पेस इंजीनियरिंग के लिए ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी जा रहा हूं। यूनिवर्सिटी ने मुझे दस लाख रुपए की अतिरिक्त स्कॉलरशिप दी है और टीचिंग के लिए भी मौका दिया है। मैं सेटेलाइट बस डिजाइन पर काम करना चाहता हूं।

हर्ष का सपना पूरा हो, इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए

  1. मां दीपिका की जिद थी, हर हाल में हर्ष का सपना पूरा हो। वह बताती हैं, बड़े बेटे को ब्रेन ट्यूमर हो गया था। अपने गहने बेचकर उसका इलाज हिंदुजा में कराया, लेकिन वह बच नहीं सका। पति और बहू तो पहले ही चल बसे थे। बस छोटा बेटा हर्ष ही है अब मेरे जीने की वजह। हर्ष बचपन से ही आर्थो और न्यूरो की बीमारी से परेशान है। उसके 5 बड़े ऑपरेशन कराए।
  2. ओवरसीज स्कॉलरशिप के लिए सिलेक्ट तो हो गया, लेकिन डेढ़ करोड़ की साल्वेंसी जुटाना संभव नहीं था। डॉ. प्रकाश वर्मा और एचवी जोशी ने इसमें मदद भी की। फिर, मैंने दिल्ली पहुंचकर मंत्री थावरचंद गेहलोत के दफ्तर में बात की। धीरे-धीरे रास्ता निकलता गया। भोपाल आई तो दिग्विजय सिंह, नरेश ज्ञानचंदानी ने गेहलोत जी से समन्वय किया।
  3. साल्वेंसी को एसडीएम और तहसीलदार से अटेस्टेट कराने में मुश्किलें भी हुईं। मैं बीते 11 महीने से हर दिन इस सिलसिले में किसी न किसी से मिलती रही हूं। बेटा हर्ष हमेशा दूसरों के लिए सोचता है। दिल्ली में रहकर उसने नौकरी से जो पैसे बचाए थे, उसे नारायण सेवा संस्थान और सैनिक कल्याण कोष में दान कर दिया था।
  4. चिंता यही, मां अकेली कैसे रहेंगी

    हर्ष कहते हैं कि मैं 2010 में ट्रिपल आईटी ग्वालियर से पासआउट हूं। 2013 में कॉमनवेल्थ स्कॉलरशिप के लिए चयनित हुआ था, लेकिन उस वक्त दुर्भाग्य ही हावी रहा। पिताजी नरेंद्र वजीरानी मेरे कैरियर की चिंता में बीमार हुए और चल बसे। फिर भाई-भाभी भी नहीं रहे। मैं सिलेक्ट हो गया हूं, लेकिन मेरी चिंता मां के लिए है। मैं आस्ट्रेलिया चला जाऊंगा तो मां अकेले कैसे रहेगी?

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