Tuesday, September 21, 2021
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महज 15 दिन के अंदर नक्सलियों ने अलग-अलग सुरक्षा बलों के दो जवानों का अपहरण किया

महज 15 दिन के अंदर नक्सलियों ने अलग-अलग सुरक्षा बलों के दो जवानों का अपहरण किया। इसमें से एक को उन्होंने 5 दिन तक अपने पास रखने के बाद जन अदालत लगाकर पूरी नाटकीयता के साथ छोड़ दिया तो दूसरे की 3 दिन बाद हत्या कर दी। सवाल यह है कि आखिर नक्सलियों ने एक को छोड़ क्यों दिया और दूसरे की हत्या क्यों कर दी। इसे इन 3 पाइंट में समझने की जरूरत है।

1. प्रचार नीति

बस्तर के माओवादियों का आंध्र, तेलंगाना, महाराष्ट्र के नक्सल कैडर से मिलकर बना एक मजबूत सूचना तंत्र है। उनके पास किसी कॉर्पोरेट ऑफिस जैसा ही मीडिया सेल है। जिम्मेदार प्रवक्ता हैं। ये टीम प्रचार का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहती। नक्सल मामलों के जानकार कहते हैं कि राकेश्वर को रिहा करना नक्सलियों की प्रचार नीति का हिस्सा था। 3 अप्रैल को तर्रेम मुठभेड़ के बाद जिस राकेश्वर सिंह को नक्सली अपने साथ ले गए थे वह CRPF की कोबरा बटालियन का कमांडो था। कमांडो राकेश्वर सिंह जम्मू का रहने वाला था।

नक्सली जानते थे कि राकेश्वर सिंह के अपहरण के बाद उन्हें मीडिया में नेशनल कवरेज मिलेगा। बात दिल्ली, जम्मू तक जाएगी। ऐसा हुआ भी। केंद्रीय मंत्री अमित शाह तक इस हमले के बाद बस्तर दौरे पर पहुंचे। नक्सलियों ने भी प्रचार का कोई मौका नहीं छोड़ा। राकेश्वर की तस्वीर जारी कर सुरक्षित होने की घोषणा की, अपनी मांगें रखीं, खुद ही मध्यस्थ घोषित कर उन्हें जंगल में बुला लिया। इसके बाद जन अदालत लगाई, राकेश्वर की रिहाई के वीडियो, फोटो प्रसारित किए और राकेश्वर को बिना शर्त छोड़ने की वाहवाही लूट ली। इस दौरान नक्सलियों ने हर बार साबित किया कि बस्तर के जंगलों में उनका राज है। राकेश्वर के अपहरण में नक्सलियों की सोची-समझी प्रचार नीति पूरी तरह सफल रही। मुरली के स्थानीय होने के कारण उन्हें इस मामले में इतनी पब्लिसिटी हासिल नहीं होने वाली थी।

2. ग्रामीणों के बीच छवि सुधारना

राकेश्वर को जब मध्यस्थों को सौंपा गया तब नक्सलियों ने जो जन अदालत लगाई थी, उसमें फोर्स से एक ग्रामीण की रिहाई भी कराई। टेकुलगुड़ा के सुख्खा कुंजाम को मध्यस्थ अपने साथ लाए थे। नक्सलियों ने इसे गांव वालों के सामने रिहा कराया और बताया कि सुरक्षा बल भी उनके दबाव के आगे झुकते हैं। यहीं नक्सलियों ने ग्रामीणों के सामने एक सिद्धांत की बात भी की। ग्रामीणों ने जब राकेश्वर को मार देने की बात कही तो नक्सलियों ने गांव वालों को समझाया कि किसी बेहोश सैनिक को पकड़ने के बाद उसकी हत्या युद्ध नियमों का उल्लंघन है। इस तरह इस पूरी जन अदालत में जिसमें 4-6 गांवों के करीब 5 हजार से ज्यादा लोग शामिल थे। नक्सलियों ने अपनी ग्रामीणों की भलाई वाली छवि बनाने की पूरी कोशिश की। इसकी जरूरत अभी बस्तर में सक्रिय माओवादी संगठनों को बहुत है, क्योंकि ग्रामीणों की हत्याओं से नक्सली पैठ गांवों में कम हो रही है। सुरक्षाबलों ने भी कुछ कल्याणकारी योजनाओं के तहत गांववालों का विश्वास जीतने में सफलता पाई है, लिहाजा नक्सली अपनी पकड़ गांवों में फिर बेहतर करना चाहते हैं।

3. DRG से दूर रहो

मुरली की हत्या के पीछे नक्सलियों का साफ मकसद यह संदेश देना है कि बस्तर के युवा DRG ( डिस्ट्रिक्ट रिजर्व ग्रुप) से दूर रहें। नक्सलियों ने तीन दिन पहले अगवा किए गए डिस्ट्रिक्ट रिजर्व ग्रुप के जवान मुरली ताती की कल देर रात हत्या कर दी। नक्सली जानते थे कि राकेश्वर के मुकाबले मुरली ताती के मामले में उन्हें कोई खास पब्लिसिटी नहीं मिलने वाली। फिर मुरली DRG का सदस्य था, जो इस समय नक्सलियों के निशाने पर है। DRG में बस्तर के जिलों के युवाओं को ही शामिल किया जाता है और उन्हें नक्सलियों के खिलाफ लड़ने भेजा जाता है। स्थानीय होने के कारण युवकों को इलाके का भौगोलिक ज्ञान होता है, साथ ही उनके ग्रामीणों से संबंध भी होते हैं। ऐसे में बाहरी सुरक्षाबलों को जो मदद ग्रामीणों से नहीं मिलती वह इन स्थानीय DRG जवानों को मिलती है। पिछली कई मुठभेड़ में ये DRG जवान नक्सलियों पर भारी पड़े हैं और उनका बड़ा नुकसान किया है। माओवादी बस्तर के युवाओं और उनके परिजनों में दहशत पैदा करना चाहते हैं कि हमारे खिलाफ जाओगे तो मारे जाओगे। इसी नीति के तहत मुरली ताती को मार दिया गया।

क्या है DRG

DRG (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व ग्रुप ) की स्थापना नक्सलियों से लड़ने के लिए सबसे पहले 2008 में कांकेर और नारायणपुर में की गई थी लेकिन इनका नक्सल मोर्चे पर पूरा उपयोग नहीं हो पाया था। इस बीच 2013-14 में सुकमा, दंतेवाड़ा में DRG का गठन किया गया। इस टीम में जिला बल के चुनिंदा जवानों को रखा गया और इसमें आत्मसमर्पित नक्सलियों को भी जगह दी गई। इसके बाद इसका विस्तार संभाग के सभी जिलों में इसी तर्ज पर किया गया। जवानों को मिजोरम सहित अन्य स्थानों पर विशेष ट्रेनिंग दी गई। इस टीम में कुछ ऐसे जवान भी शामिल है जो नक्सल हिंसा झेल चुके हैं।

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