Sunday, September 19, 2021
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वरिष्ठ रंगकर्मी गुरचरण सिंह चन्नी की जिंदगी हुई रिटायर ;शहरवासी हुए उदास,बोले क्रूर कोरोना ने छीन लिया हमारा चन्न(चांद),हमारा चन्नी

शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी गुरचरण सिंह चन्नी नहीं रहे। गुरुवार को मोहाली के फोर्टीज अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली। कोरोना ने उन्हें भी अपनी चपेट में ले लिया था और पिछले एक महीने से वह अस्पताल में भर्ती थे। इस बीच सभी लोग उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना कर रहे थे। लेकिन नियती को कुछ और ही मंजूर था। क्रूर कोरोना ने उन्हें भी हम सबसे छीन लिया।

चन्नी के मुताबिक अगर कला को गंभीरता से दिखाया जाएगा तो कोई भी उस सत्य को नहीं कुबूलेगा। इसलिए वह हमेशा चेहरे पर कलाकारी करके अपनी कला के माध्यम से सभी को हंसाने में विश्वास रखते थे।

गुरचरण सिंह चन्नी एक विचित्र निर्माता, TV फिल्म निर्माता, अभिनेता, प्रख्यात रंगमंच व्यक्तित्व, नाटककार के रूप में जाने जाते हैं। उनके नाटक दफा 144, जिंदगी रिटायर नहीं होती, रॉकेट हो या बॉम्ब, पहनो कंडोम को बेहद सराहना मिली है। टुटु सहित उन्होंने कई टेलीफिल्म्स और दो दर्जन से भी अधिक डॉक्युमेंट्रीज बनाई हैं।

उनकी मृत्यु का समाचार शहर में आग की तरह फैला और साथ ही सोशल मीडिया पर उनके जाने का अफसोस जताते कई संदेश घूमने लगे। सभी स्तब्ध हैं और यकीन नहीं कर पा रहे हैं कि अस्पताल में क्लाउन बनकर मरीजों को हंसा कर स्वस्थ करने वाला वो क्यूट इंसान आज अपने जीवन की जंग हार गया। सभी इतना बोले- क्रूर कोरोना ने हमसे हमारा चन्न(चांद), हमारी चन्नी छीन लिया है। बहरहाल चन्नी की मृत्यु से न सिर्फ रंगकर्मी बल्कि पूरा शहर शोक में है। सभी का कहना है कि चन्नी के जाने से थिएटर जगत को न पूरा होने वाला घाटा हुआ है।

गुरचरण सिंह चन्नी सेक्टर 35 में अपने परिवार सहित रहते थे। वे चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं। ड्रामा रिपर्टरी कंपनी सेवा के निदेशक चन्नी का 40 साल का रंगमंच का अनुभव था। वे PU चंडीगढ़ के डिपार्टमेंट ऑफ थिएटर,NSD दिल्ली और टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया पुणे के स्टूडेंट रह चुके हैं।

कला हमेशा से ही चन्नी के लिए एक शौक रहा है। इसलिए वह इसे खुद भी एंजॉय करते थे और सीखने वालों को भी इसमें डूब कर एंजॉय करने को कहते थे। वे इस हुनर को किसी क्लासरूम या बंद दीवारों के बीच नहीं, बल्कि चलते फिरते सिखाने में विश्वास रखते थे और इसके लिए सेक्टर 10 की लेजर वैली उनकी फेवरिट जगह थी। उनका मानना था कि शौक से किए हुए हर काम में सफलता मिलती ही है।

अगर बोझ समझकर या लालच में किसी काम के किया जाए तो वह कभी फायदा नहीं देता। उनके मुताबिक रंगमंच बिजनेस नहीं, बल्कि सोसायटी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसके जरिए इंसान का चेहरा दिखाया जाता है। अगर उसे गंभीरता से दिखाया जाएगा तो कोई भी उस सत्य को नहीं कुबूलेगा। इसलिए वह हमेशा चेहरे पर कलाकारी करके अपनी कला के माध्यम से सभी को हंसाने में विश्वास रखते थे।

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