Sunday, September 19, 2021
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103 साल के हो चुके नवादा जिले के एक मात्र जीवित स्वतंत्रता सेनानी

स्वतंत्रता संग्राम में नवादा जिले के सैकड़ों लोगों ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। उनमें एक नाम शामिल था काशीचक प्रखंड के धानपुर गांव के रहने वाले बाबू बटोरन सिंह का। अब इनकी उम्र करीब 103 साल की हो चुकी है। 1942 के आंदोलन में बाबू बटोरन सिंह ने फरारी कार्यकर्ता के रूप में क्रांतिकारी भूमिका निभाई थी। वो बचपन से ही अंग्रेजी शासन की खिलाफत किया करते थे।आजादी के लिए बांटा करते थे पर्चा

स्कूली शिक्षा के वक्त मध्य विद्यालय साम्बे में पढ़ाई करते हुए छात्रों की टोली के साथ रेल की पटरी उखाड़ने के मामले आरोपी बनाए गए थे। तब पकरीबरवां थाना के दरोगा रहे मो. फकरुज्जमां ने गिरफ्तार कर गया जेल भेज दिया था। उस वक्त पाली गांव के वासुदेव सिंह ने उनकी जमानत करवाई थी। जेल से आने के बाद भी ये आजादी मिलने तक क्षेत्रवासियों में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध क्रांति फैलाने के लिए पर्चे बांटा करते थे। प्रधानमंत्री रहते इंदिरा गांधी ने जब स्वतंत्रता सेनानियों के लिए पेंशन की शुरुआत की तो इन्हें भी उसका लाभ मिला। साल 1971 से 1978 तक ग्राम पंचायत सुभानपुर के निर्वाचित सरपंच रहे। बाबू बटोरन सिंह की समाजसेवी के रूप में पहचान रही है।

जिले में एक मात्र जीवित स्वतंत्रता सेनानी

बाबू बटोरन सिंह फिलवक्त जिले के एक मात्र जीवित स्वतंत्रता सेनानी हैं। विद्यालय के प्रमाणपत्र में इनकी जन्मतिथि 2 जनवरी 1917 दर्ज है। स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के जिला उपाध्यक्ष नरेंद्र कुमार शर्मा उर्फ कार्यानंद शर्मा के पास जिले के सभी स्वतंत्रता सेनानियों का ब्योरा है। शर्मा बताते हैं कि नवादा जिले में कुल 306 स्वतंत्रता सेनानी थे। सभी ताम्रपत्र धारी थे। इनमें से 267 को सरकार प्रदत्त पेंशन व अन्य सुविधाओं का लाभ मिल रहा था। 39 भूमिगत स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र मिला था। लेकिन तकनीकी कारणों से कुछ को पेंशन नहीं मिला तो कुछ ने पेंशन लिया ही नहीं। शर्मा बताते हैं कि हमारे पिताजी स्व बच्चू सिंह स्वतंत्रता सेनानी संघ के जिलाध्यक्ष और प्रदेश महासचिव रहे थे। ऐसे में काफी कुछ दस्तावेज को संभाल रखे हैं। अब मात्र एक स्वतंत्रता सेनानी बटोरन बाबू जीवित हैं।

बेटे का क्या है कहना

सेनानी बटोरन बाबू के पुत्र प्रो. उपेंद्र प्रसाद सिंह बताते हैं कि पिताजी का शरीर काफी रुग्ण हो चला है, यादें विस्मृत हो चुकी हैं। जिले के धरोहर के रूप में पहचान रखने वाले योद्धा की टूटती सांसें इनके दूर जाने का अहसास करा रही है। सेवा में लगे पुत्र प्रो. उपेंद्र ने बताया कि अधिक उम्र के कारण पिताजी अब किसी को सहज रूप से पहचान भी नहीं पाते हैं, मगर खुद व खुद पुरानी बातें बोल उठते हैं। इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जिला प्रशासन राजकीय समारोह में उन्हें बुलाने की बजाय घर तक जाकर सम्मानित करने का निर्णय लिया है। कोविड 19 प्रोटोकॉल के तहत स्वतंत्रता दिवस समारोह आयोजित होने के कारण ऐसा निर्णय लिया गया है। हम सभी आजादी का जश्न मनाते हैं 15 अगस्त को भारत में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन ब्रिटिश साम्राज्य की हुकूमत खत्म हो गई थी। और भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बन गया था।

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