साठ के दशक में धर्मेंद्र और शर्मिला ने कई यादगार फ़िल्में की हैं। दोनों ने पहली बार 1966 की फ़िल्म ‘अनुपमा’ में साथ काम किया था। ये फ़िल्म भी हिंदी सिनेमा की क्लासिक्स में शामिल हैं। फ़िल्म एक पिता और उसकी बेटी के कमज़ोर होते भावनात्मक रिश्ते की कहानी थी। बेटी के रोल में शर्मिला टैगोर थीं, जबकि धर्मेंद्र ने लेखक और शिक्षक का किरदार निभाया था। ऋषिकेष मुखर्जी डायरेक्टेड फ़िल्म में धर्मेंद्र का किरदार काफी संजीदा था, जबकि शर्मिला को फ़िल्म में तक़रीबन चुप ही दिखाया गया था।

1966 में ही आयी ‘देवर’ में धर्मेंद्र और शर्मिला ने साथ काम किया। देवर बंगाली उपन्यासकार तारा शंकर बंधोपाध्याय के नॉवल ‘ना’ पर आधारित फ़िल्म थी। इसी नॉवल पर 1962 में एक तमिल फ़िल्म भी बन चुकी थी, जिसे मोहन सहगल ने हिंदी में डायरेक्ट किया था। इस सोशल ड्रामा में धर्मेंद्र और शर्मिला की अदाकारी ने कहानी को एक अलग ही रंग दिया।

इन क्रिटिकली एक्लेम्ड फ़िल्मों के अलावा धर्मेंद्र और शर्मिला की जोड़ी ने मसाला फ़िल्मों में भी काम किया, जो उस दौर की लोकप्रिय फ़िल्में बनीं। मसलन, रोमांटिक ड्रामा ‘मेरे हमदम मेरे दोस्त’ (1968) और जासूसी फ़िल्म ‘यक़ीन’ (1969) पूरी तरह मसाला फ़िल्में थीं। क्रिटिक्स ने इन फ़िल्मों को भले ही सपोर्ट ना किया हो, मगर दर्शकों ने ख़ूब प्यार दिया।

धर्मेंद्र और शर्मिला की सबसे यादगार फ़िल्म 1969 में आई ‘सत्यकाम’ है, जिसमें शर्मिला धर्मेंद्र की पत्नी के रोल में थीं। धर्मेंद्र को सामान्य तौर पर ही-मैन के रूप में देखा जाता है, जो अपनी बाजुओं के दम पर बड़े-बड़े कारनामे कर गुज़रता है, मगर ‘सत्यकाम’ में धर्मेंद्र की इमोशनल साइड देखने को मिलती है। ऋषिकेश मुखर्जी डायरेक्टेड फ़िल्म में धर्मेंद्र ने ईमानदार और हमेशा सच बोलने वाले इंसान सत्यप्रिय का किरदार निभाया था। ‘सत्यकाम’ में शर्मिला का किरदार ऐसी पत्नी का था, जो तमाम मुश्किलें बर्दाश्त करने के बावजूद अपने पति की सच्चाई और ईमानदारी को सपोर्ट करती है। धर्मेंद्र ख़ुद भी ‘सत्यकाम’ को अपने करियर की सबसे यादगार परफॉर्मेंसेज में से एक मानते हैं।

ऋषिकेश मुखर्जी की ‘चुपके-चुपके’ (1975) में धर्मेंद्र और शर्मिला की एक अलग ही साइड देखने को मिली। संजीदा और विशुद्ध मसाला अदाकारी के बाद इस फ़िल्म में धर्मेंद्र और शर्मिला ने कॉमेडी का रंग दिखाया।’चुपके-चुपके’ हिंदी सिनेमा की ऑल टाइम क्लासिक फ़िल्मों में शामिल है। इसमें अमिताभ बच्चन और जया बच्चन की जोड़ी भी सपोर्टिंग किरदारों में नज़र आयी।

1975 में ही धर्मेंद्र और शर्मिला टैगोर की ‘एक महल हो सपनों का’ ना तो क्रिटिकली और ना ही कमर्शियली कामयाब रही। इस लव ट्रायंगल में लीना चंद्रावरकर भी मुख्य स्टार कास्ट का हिस्सा थीं।

धर्मेंद्र और शर्मिला आख़िरी बार 1984 में आई ‘सनी’ में साथ नज़र आए। इस फ़िल्म में धर्मेंद्र के बेटे सनी देओल और अमृता सिंह लीड रोल्स में थे। ‘सनी’ में धर्मेंद्र के किरदार की शुरुआत में ही मौत हो जाती है और पूरी फ़िल्म उनकी पत्नी बनी वहीदा रहमान और प्रेमिका रहीं शर्मिला टैगोर के टकराव पर आधारित थी। अमृता ने सनी के साथ ‘बेताब’ फ़िल्म से बॉलीवुड में डेब्यू किया था। अमृता बाद में शर्मिला के बेटे सैफ़ अली ख़ान से शादी करके रियल लाइफ़ में उनकी बहू बनीं।