Friday, September 17, 2021
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इस बार बाजार में इको फ्रेंडली राखी, कीमत भी दूसरी राखियों से कम

केवल घर के कार्यों पर निर्भर रहने वाली गृहणियों को इस बार राखी का त्यौहार उम्मीद की किरण लेकर आया। पिपरौदा गांव की महिलाओं ने समूह बनाकर इस बार राखियां बनाई हैं। 10 दिन काम करते हुए उन्होंने 5 हजार राखियां बनाकर बाजार में बेचीं। इससे उन्हें आय का नया साधन मिला। सुई और धागे से बनी राखियां पूरी तरह इको फ्रेंडली हैं।

पिपरौदा गांव के नीतू स्व सहायता समूह की महिलाओं ने तय किया कि इस बार राखियां बनाई जाएं। हाथ से बनाई गई राखियों की बाजार में भी अच्छी मांग होती है। इसी सोच को ध्यान में रखते हुए बाजार से सामान खरीदकर राखियां बनाना शुरू की। 10 दिन में 5 हजार राखियां बनाने का लक्ष्य रखा गया। 10 महिलाओं ने रोज काम करके 5 हजार राखियां तैयार कर लीं। कई दुकानदारों से पहले ही बात की हुई थी। उन्हें डिलीवरी की गई। कुछ राखियां समूह के माध्यम से सीधे बाजार में बेची गईं।

अन्य राखियों के मुकाबले कीमत कम

आमतौर पर राखियां मशीनों से बनाई जाती हैं। जिले में उनका निर्माण नहीं होता। दिल्ली, इंदौर से ही राखियां मंगाकर जिले में बेची जाती हैं। इन राखियों की कीमत भी ज्यादा होती है। शहर के पास ही राखियां बनाए जाने से इनकी कीमत में भी अंतर आया है। 20 से अधिक वैरायटी की राखियां समूह ने बनाई हैं। इनकी कीमत 5 रुपए से लेकर 60 रुपए तक है।

समूह की सदस्य भगवती कुशवाह ने बताया कि बाजार से सामान खरीदकर आकर्षक राखियां बनाई हैं। हाथ से बनी होने के कारण मार्केटिंग भी अच्छी हुई। कई दुकानों से ऑर्डर मिल गए थे। स्थानीय दुकानदारों को राखी की आपूर्ति करने के साथ-साथ समूह के सदस्यों ने शहर में भी ठेले पर दुकान लगाकर बिक्री की है। महिलाओं में इसको लेकर काफी रुचि रही।

जिला पंचायत CEO नीलेश पारिख ने बताया, समूह की महिलाएं अब पारंपरिक गतिविधियों से जुड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही हैं। रक्षाबंधन पर इन महिलाओं ने रंग-बिरंगी राखियां बनाकर रोजगार के नए अवसर तलाशे हैं।

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