Sunday, September 26, 2021
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यूपी: एक लाख हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि पर नेता, अफसर और दबंग काबिज

  • सोनभद्र में एक लाख हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि पर अवैध रूप से नेता, अफसर और दबंग काबिज हैं। जिन अफसरों की यहां तैनाती हुई, उनमें से अधिकतर ने अपनी आने वाली कई पीढ़ियों के भरण-पोषण का इंतजाम कर दिया।

    इसमें वन और राजस्व विभाग के कार्मिकों की मिलीभगत जगजाहिर है। पीढ़ियों से जमीन जोत रहे लोगों का शोषण भी किसी से छिपा नहीं है।

    खास बात यह है कि पांच साल पहले वन विभाग के ही एक मुख्य वन संरक्षक एके जैन ने यह रिपोर्ट दी थी। साथ ही मामले की सीबीआई जांच की सिफारिश भी की थी, लेकिन इस रिपोर्ट के आधार पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

    सोनभद्र में जमीन पर कब्जे को लेकर नरसंहार की बुनियाद कोई एक दिन में नहीं रखी गई। इस क्षेत्र को जानने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए तो इस तरह की वारदातों को रोक पाना और भी मुश्किल होगा। हालांकि, इन हालात से वर्ष 2014 में ही तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक (भू-अभिलेख एवं बंदोबस्त) एके जैन ने शासन व सरकार को अवगत करा दिया था।

    जैन की रिपोर्ट के मुताबिक, सोनभद्र में जंगल की जमीन की लूट मची हुई है। अब तक एक लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन अवैध रूप से बाहर से आए ‘रसूखदारों’ या उनकी संस्थाओं के नाम की जा चुकी है। यह प्रदेश की कुल वन भूमि का छह प्रतिशत हिस्सा है। जैन ने पूरे मामले से सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराने की सिफारिश भी की थी।

    रिपोर्ट के अनुसार, सोनभद्र में 1987 से लेकर अब तक एक लाख हेक्टेयर भूमि को अवैध रूप से गैर वन भूमि घोषित कर दिया गया है, जबकि भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 के तहत यह जमीन ‘वन भूमि’ घोषित की गई थी।

    सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना इसे किसी व्यक्ति या प्रोजेक्ट के लिए नहीं दिया जा सकता। इतना ही नहीं, आहिस्ता-आहिस्ता अवैध कब्जेदारों को असंक्रमणीय से संक्रमणीय भूमिधर अधिकार यानी जमीन एक-दूसरे को बेचने के अधिकार भी लगातार दिए जा रहे हैं।

    इसे वन संरक्षण अधिनियम-1980 का सरासर उल्लंघन बताते हुए बताया गया कि 2009 में राज्य सरकार की ओर से उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी। इसमें कहा गया था कि सोनभद्र में गैर वन भूमि घोषित करने में वन बंदोबस्त अधिकारी (एफएसओ) ने खुद को प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग करके अनियमितता की।

    लेकिन 19 सितंबर 2012 को तत्कालीन सचिव (वन) के मौखिक आदेश पर विभागीय वकील ने यह याचिका चुपचाप वापस ले ली। हालात का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि चार दशक पहले सोनभद्र के रेनूकूट इलाके में 1,75,896.490 हेक्टेयर भूमि को धारा-4 के तहत लाया गया था, लेकिन इसमें से मात्र 49,044.89 हेक्टेयर जमीन ही वन विभाग को पक्के तौर पर (धारा-20 के तहत) मिल सकी। यही हाल ओबरा व सोनभद्र वन प्रभाग और कैमूर वन्य जीव विहार क्षेत्र में है।

  • क्या है धारा-4 और धारा-20

    भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 के तहत सरकार किसी भूमि को वन भूमि में दर्ज करने की मंशा जाहिर करती है। इस पर आम लोगों से आपत्तियां भी मांगी जाती हैं। इन आपत्तियों की सुनवाई एसडीएम स्तर का अधिकारी करता है। सुनवाई की प्रक्रिया में उसे वन बंदोबस्त अधिकारी का दर्जा दिया जाता है।

    इन आपत्तियों पर सुनवाई के बाद धारा-20 के तहत कार्यवाही होती है, जिसमें भूमि को अंतिम रूप से बतौर वन भूमि दर्ज कर लिया जाता है। आपत्तियां जायज होने पर वन बंदोबस्त अधिकारी को यह अधिकार होता है कि धारा-4 की जमीन को वादी के पक्ष में गैर वन भूमि घोषित कर दे।

  • सोनभद्र में कानून की आड़ लेकर वन विभाग की जमीन कब्जाने का सिलसिला आज तक नहीं थमा है। इस गोरखधंधे में सरकारी कर्मचारियों, अफसरों और राजनेताओं से लेकर आम लोग तक शामिल हैं। जिन पर जंगल बचाने की जिम्मेदारी है, वे इस गैरकानूनी काम में और भी आगे हैं।राजस्व व वन विभाग के सूत्रों के मुताबिक, रेनुकूट डिवीजन के गांव जोगेंद्रा में एक राजनेता वन विभाग की 250 बीघा जमीन पर काबिज हैं। उनके सामने सारे कानून बौने नजर आ रहे हैं।

    इसी तरह सोनभद्र के गांव सिलहट में एक पूर्व विधायक ने 56 बीघा जमीन का बैनामा अपने भतीजों के नाम करा दिया। इस काम में सरकारी मुलाजिम भी पीछे नहीं हैं।

    ओबरा वन प्रभाग के वर्दिया गांव में एक कानूनगो ने अपने पिता के नाम जमीन कराई और बाद में उसे बेच दिया। घोरावल रेंज के धोरिया गांव में ऐसे ही एक रसूखदार ने 18 बीघा जमीन 90 हजार रुपये में खरीदी दिखाई और इसकी आड़ में और भी जमीन कब्जा ली।

    ओबरा डिवीजन के गांव वर्दिया में एक परिवार ने राजा बढ़हर का 26 मई 1952 का पट्टा दिखाकर 101 बीघा जमीन पर अपना दावा ठोक दिया। बताते हैं कि जिस तारीख का यह पट्टा है, उस दिन तक परिवार के दो सदस्य पैदा ही नहीं हुए थे, जबकि उनके नाम पट्टे में दर्ज हैं।

    इतना ही नहीं, भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 और धारा-20 में विज्ञापित जमीन को रसूखदारों के कहने पर चकबंदी में शामिल कर लिया जा रहा है, जबकि नियमानुसार ऐसा नहीं हो सकता।

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