Tuesday, September 28, 2021
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जब नागों के जीवन पर छाया संकट, जानें नाग पंचमी के महत्व को

नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा का विधान है। यह प्रतीकात्मक रूप में पर्यावरण के प्रति जागरूकता ही नहीं देता, बल्कि आध्यात्मिक संदेश भी देता है। क्योंकि मनुष्य का जीवन भी विपरीत परिस्थितियों के नागों की मौजूदगी में व्यतीत होता है। आत्मा यदि परमात्मा का अंश है तो काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि किसी विषैले सर्प से कम नहीं हैं, जो हमें आत्मरूप परमात्मा तक पहुंचने नहीं देते। हमें विपरीत परिस्थितियों के सर्पों को भी स्वीकार करना होगा और उनसे बचने या पार पाने के उपाय अपने विवेक द्वारा ढूंढ़ने होंगे।

नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा का विधान है। यह प्रतीकात्मक रूप में पर्यावरण के प्रति जागरूकता ही नहीं देता बल्कि आध्यात्मिक संदेश भी देता है। क्योंकि मनुष्य का जीवन भी विपरीत परिस्थितियों के नागों की मौजूदगी में व्यतीत होता है।

जब राजा परीक्षित को तक्षक सर्प ने मार डाला

पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग के अंतिम राजा परीक्षित को तमाम यज्ञ, अनुष्ठान के बावजूद तक्षक नामक सर्प ने मार डाला था। परीक्षित अभिमन्यु के पुत्र थे, जिन्हें अश्र्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में ही मार डाला था, लेकिन मृत रूप में जन्मे परीक्षित को योग-शक्ति से कृष्ण ने बचा लिया था। परीक्षित का आशय ही परीक्षण से है। संसार, आत्मा, परमात्मा के परीक्षण में अविवेकरूपी सर्प के डसने की आशंका निरंतर बनी रहती है। विकार रूपी कलियुग जब विवेक रूपी परीक्षित के राज्य में घुसने की कोशिश करने लगा तो दयाभाव में आकर परीक्षित ने सोना, जुआ, मद्य, स्त्री और हिंसा में कलियुग को स्थान दे दिया। इन्हीं पंचस्थलों से निकलने वाले सर्प मनुष्य के सुखद जीवन को डसते हैं।

आस्तिक ने की थी नागों की रक्षा

नाग पंचमी की एक पौराणिक कथा के अनुसार, नागों की माता कद्रू ने अपनी सौत विनता को धोखा देने के लिए अपने पुत्रों से कहा, लेकिन पुत्रों ने सौतेली मां को धोखा देने से मना कर दिया, जिससे माता के शाप से नाग जलने लगे। वे भागते हुए ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने श्रावण मास की पंचमी को नागों को वरदान दिया कि तपस्वी जरत्कारु नाम के ऋषि का पुत्र आस्तिक नागों की रक्षा करेगा। जब परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने इंद्र सहित तक्षक को अग्निकुंड में आहुति के लिए मंत्रपाठ किया, तब आस्तिक ने तक्षक की प्राण-रक्षा की। यह तिथि भी पंचमी ही थी।

मान्यता है कि नागों की ज्वलनशीलता कम करने के लिए उन्हें दूध से स्नान कराने एवं पूजा करने का विधान बना। विकारों का सर्प हमेशा सकारात्मक परिस्थितियों को डसता रहता है। यह भगवान शिव के गले की तरह हर व्यक्ति के गले में लिपटा रहता है। द्वापर में कालिया नाग ने यमुना के जहर को प्रदूषित कर जहरीला बना दिया था। उस कालिया नाग का वध करने कृष्ण को यमुना में कूदना पड़ा।

इस दृष्टि से देखा जाए, तो सावन के महीने में महादेव की पूजा में जहरीली परिस्थितियों से जूझने का भी संदेश निहित है। आज के समय में कोरोना के कारण ऐसी विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न हो रही हैं, जिन पर हमें विजय प्राप्त करनी है। श्रीहनुमान जी लंका की विषैली परिस्थितियों में जाकर विभीषण रूपी सकरात्मकता ढूंढ़ लेते हैं।

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