गंगा में स्नान, कठिन तप… कल्पवासियों के संकल्प के आगे सर्दी ने भी टेके घुटने, महाकुंभ की प्राणशक्ति है ‘कल्पवास’

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त्रिवेणी के तट पर देश का सबसे बड़ा आध्यात्मिक आयोजन महाकुंभ चल रहा है। ऐसे मे संगम की रेती पर श्रद्धालु कल्पवास करते हुए नजर आ रहे हैं। सांसारिक मोह माया से मुक्त होकर श्रद्धालु नियम के साथ कल्पवास करते हैं। भारतीय आश्रम परम्परा में गृहस्थ आश्रम को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जिसमें साल में ग्यारह महीने घर में रहकर भी बस एक महीने मोह-माया से दूर रहकर पवित्र नदियों के संगम के  किनारे वास करके जप तप और साधना से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

मोक्ष की लालसा में लाखों श्रद्धालु महाकुंभ में वास कर रहे
मोक्ष की इसी लालसा को लेकर लाखों श्रद्धालु महाकुंभ मेले में धर्म की नगरी तीर्थराज प्रयाग में गंगा-यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी पर एक महीने तक वास करते हैं। जिसे कल्पवास कहा जाता है। संगम तट पर एक माह तक चलने वाले कल्पवास की शुरुवात पौष पूर्णिमा स्नान पर्व से हो गई है। संगम में स्नान, त्याग और संयम का जीवन जीते हुए पूरे समय भगवान के नाम का सत्संग करने वाले कल्पवासियों की इस अनूठी दुनिया में धर्म-आध्यात्म, आस्था- समर्पण और ज्ञान व संस्कृति के तमाम रंग देखने को मिलते हैं।

33 करोड़ देवी देवता एक महीने तक संगम की रेती में होते हैं विराजमान 
मान्यता है कि 33 करोड़ देवी देवता एक महीने तक संगम की रेती में विराजमान रहते हैं। कल्पवास करने आये श्रद्धालु दिन में तीन बार स्नान करते है और एक बार खाना खाते है। भजन कीर्तन करते है। तुलसी के पेड़ की पूजा करते हैं। पौष पूर्णिमा स्नान पर्व के साथ कल्पवास की शुरुआत होती है जो माघ पूर्णिमा तक रहती है। इसके बाद कल्पवासी अपने घर को रवाना हो जाते हैं। महाकुंभ मेला क्षेत्र में देश के अलग-अलग जिलों से आए श्रद्धालु एक ही जगह कल्पवास करते हैं।

दिनभर धार्मिक भजन कीर्तन का होता है आयोजन 
कल्पवास कर रहे श्रद्धालुओं का कहना है कि देश दुनिया में सुख शांति बनी रहे, सभी व्यक्ति सुखी जीवन व्यतीत करें इसकी वह प्रार्थना करते हैं। दिनभर धार्मिक भजन कीर्तन का आयोजन होता है, रामायण, महाभारत के पाठ पढ़े जाते हैं और सभी भगवानों के साथ-साथ मां तुलसी की पूजा भी की जाती है।

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