NATIONAL : सिंधु जल संधि निलंबन के बाद मोदी सरकार का बड़ा कदम, जम्मू-कश्मीर में रुके हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स को मिलेगी रफ्तार

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इस हफ्ते केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में एक अहम बैठक होने की संभावना है, जिसमें जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल, ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर, कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और अन्य संबंधित मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे. इससे पहले सिंधु जल संधि निलंबन के बाद अमित शाह और जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल की दो उच्चस्तरीय बैठकें हो चुकी हैं.

पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित करने के बाद मोदी सरकार अब जम्मू-कश्मीर में वर्षों से रुके पड़े हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स को तेजी से पूरा करने की दिशा में बड़े कदम उठाने जा रही है. इस हफ्ते केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में एक अहम बैठक होने की संभावना है, जिसमें जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल, ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर, कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और अन्य संबंधित मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे.

इससे पहले सिंधु जल संधि निलंबन के बाद अमित शाह और जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल की दो उच्चस्तरीय बैठकें हो चुकी हैं. इन बैठकों में यह रणनीति बनी है कि जम्मू-कश्मीर में ठप पड़ी पनबिजली परियोजनाओं (Hydro Power Projects) को फिर से शुरू किया जाए और नए प्रोजेक्ट्स को तेजी से आगे बढ़ाया जाए.

विशेषज्ञों का मानना है कि संधि निलंबन के बाद अब भारत को किसी भी नए प्रोजेक्ट से पहले पाकिस्तान को छह महीने का नोटिस देने की जरूरत नहीं होगी, न ही जल डेटा साझा करना अनिवार्य होगा. इससे प्रशासनिक प्रक्रिया में तेज़ी आएगी और परियोजनाएं समय पर पूरी हो सकेंगी.

जम्मू-कश्मीर में छह प्रमुख हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट हैं जिनमें तेजी आने की उम्मीद है

-सावलकोट प्रोजेक्ट (1,856 मेगावाट)
-पाकल दुल प्रोजेक्ट (1,000 मेगावाट)
-रतले प्रोजेक्ट (850 मेगावाट)
-बर्सर प्रोजेक्ट (800 मेगावाट)
-किरू प्रोजेक्ट (624 मेगावाट)
-किर्थाई-I और II प्रोजेक्ट (कुल 1,320 मेगावाट)

बढ़ेगी जम्मू-कश्मीर की बिजली उत्पादन क्षमता

इन प्रोजेक्ट्स के पूरा होने से जम्मू-कश्मीर की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 10,000 मेगावाट तक पहुंच सकती है. इसके अलावा, मैदानी राज्यों में सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता भी कई गुना बढ़ेगी. अब चेनाब और झेलम नदियों पर नए प्रोजेक्ट्स बनाना और वूलर झील को पुनर्जीवित करना संभव होगा, जिस पर पहले सिंधु जल संधि के कारण अड़चन थी. सरकार का यह कदम ऊर्जा आत्मनिर्भरता के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अहम माना जा रहा है.

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