General knowledge : बड़े जहाजों में किस ईंधन का होता है इस्तेमाल, जानें आम फ्यूल से कितना होता है यह अलग

0
19

बड़े जहाजों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन आम ईंधन से अलग होता है. आइए जानते हैं क्या है दोनों के बीच फर्क. मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने कई व्यापारिक जहाजों पर हमलों की रिपोर्ट के बाद वैश्विक समुद्री व्यापार को लेकर चिंताओं को बढ़ा दिया है. बीते कुछ दिनों में ईरान और दूसरी शक्तियों से जुड़े क्षेत्रीय संघर्ष के बीच कथित तौर पर लगभग 18 मालवाहक जहाजों को हमलों या नुकसान का सामना करना पड़ा है. इन घटनाओं ने इस बात पर रोशनी डाली है कि व्यापार के लिए वैश्विक शिपिंग मार्ग कितना जरूरी है. इसी बीच आइए जानते हैं कि बड़े जहाज किस ईंधन का इस्तेमाल करते हैं और यह आम फ्यूल से कितना अलग होता है.

ज्यादातर बड़े मालवाहक जहाज हैवी फ्यूल ऑयल का इस्तेमाल करते हैं. इसे आमतौर पर बंकर ईंधन के रूप में जाना जाता है. यह ईंधन कच्चे तेल को रिफाइन करने के बाद बचा हुआ सबसे गाढ़ा और भारी अवशेष होता है. जब किसी रिफाइनरी में कच्चे तेल को संसाधित किया जाता है तो पेट्रोल, डीजल और विमानन ईंधन जैसे हल्के उत्पाद पहले निकाले जाते हैं. नीचे बचा हुआ गाढ़ा और भारी पदार्थ हैवी फ्यूल ऑयल में बदल दिया जाता है. ज्यादातर इसका इस्तेमाल बड़े समुद्री इंजनों में किया जाता है.

हैवी फ्यूल ऑयल और सामान्य ईंधनों के बीच एक बड़ा अंतर उनकी विस्कोसिटी है. पेट्रोल और डीजल पतले तरल पदार्थ होते हैं जो कमरे के तापमान पर आसानी से बहते हैं. हालांकि हैवी फ्यूल ऑयल काफी ज्यादा गाढ़ा होता है. अक्सर यह तारकोल या फिर डामर जैसा दिखता है. इस वजह से यह कमरे के तापमान पर सामान्य रूप से नहीं बह सकता. इसे जहाज के टैंकों के अंदर लगभग 100° C-120°C तक गर्म करना पड़ता है. ताकि यह इंजनों में पंप किए जाने लायक पर्याप्त तरल बन सके.

हैवी फ्यूल ऑयल को अक्सर कच्चे तेल की रिफायनिंग का एक वेस्ट उत्पाद बताया जाता है. पेट्रोल और डीजल जैसे ज्यादा मूल्य वाले ईंधन निकालने के बाद, बचे हुए पदार्थ को बंकर ईंधन में बदल दिया जाता है. क्योंकि यह रिफायनिंग प्रक्रिया के सबसे निचले हिस्से से आता है. इस वजह से इसमें सल्फर, वैनेडियम और निकेल जैसी भारी धातुओं और बाकी अशुद्धियों का उच्च स्तर होता है. इंजन के अंदर भारी ईंधन तेल जलाने से पहले जहाज पर ही उसे शुद्ध करने की प्रक्रिया की जाती है. जहाज ईंधन से पानी, रेत और धातु के कणों को निकालने के लिए सेंट्रीफ्यूज या प्यूरीफायर नाम की खास मशीनों का इस्तेमाल करते हैं.

भारी ईंधन तेल में मौजूद सल्फर की मात्रा की वजह से होने वाले भारी प्रदूषण के लिए इसकी लंबे समय से आलोचना हो रही है. पहले बंकर ईंधन में लगभग 3.5% तक सल्फर हो सकता था. इससे जहाजों से होने वाले वायु प्रदूषण में काफी योगदान मिलता था. इस समस्या को हल करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन ने IMO 2020 सल्फर कैप नाम का कड़ा नियम लागू किया. इन नियमों के तहत जहाज को काफी कम सल्फर वाला ईंधन तेल इस्तेमाल करना जरूरी है. इसमें सल्फर की मात्रा 0.5% तक सीमित होनी चाहिए.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here