NATIONAL : ‘न्यायपालिका को भ्रष्टाचार और आलोचना जैसे मुद्दों से नहीं भागना चाहिए’, आम जनता के भरोसे पर CJI सूर्यकांत बोले- फैसला पसंद आए ये जरूरी नहीं

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भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि न्यायपालिका पर जनता का भरोसा, लोगों की मंजूरी से अलग है। उन्होंने कहा कि लोगों की पसंद के फैसले देने से भरोसा नहीं बनता बल्कि निष्पक्ष तरीके से न्याय करने से जनता का विश्वास कायम होता है। CJI ने यह भी कहा कि अदालतों को जांच, सवाल और जरूरत पड़ने पर आलोचना के लिए तैयार रहना चाहिए।

आपको बता दें कि CJI सूर्यकांत सोमवार को दिल्ली में आयोजित छठे राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर में मुख्य वक्ता के तौर पर संबोधित कर रहे थे। इस कार्यक्रम का विषय था- Justice seen to be done: Transparency and public trust as pillars of the legal system.

कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और महेश जेठमलानी ने न्यायपालिका में प्रशासनिक सुधारों की जरूरत पर चिंता जताई। उन्होंने जजों की नियुक्ति समेत न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों से निपटने के लिए सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया। इस पर CJI ने कहा कि सुधार व्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए और कोई भी संस्था स्थिर रहकर लंबे समय तक ना तो टिक सकती है और ना ही इस बात पर गर्व कर सकती है कि उसमें कोई बदलाव नहीं हो रहा।

CJI सूर्यकांत ने कहा कि कुछ ऐसे मुद्दे भी होते हैं जिन पर सार्वजनिक मंच से जवाब देना उचित नहीं होता। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम कैसे बना और अब तक किस तरह काम करता रहा है, इन सवालों के उनके पास कानूनी और ऐतिहासिक जवाब हैं।

उन्होंने कहा कि कॉलेजियम की सिफारिशों पर केंद्र सरकार की ओर से जजों की नियुक्ति में आमतौर पर कोई बड़ी रुकावट नहीं आती। उनके मुताबिक, यह खुद बताता है कि कॉलेजियम में किस तरह चर्चा होती है और आखिर में सिफारिशें कैसे तय की जाती हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सुधार का स्वागत होना चाहिए।

जजों के खिलाफ शिकायतों से निपटने के लिए प्रशासनिक सुधारों पर CJI ने कहा, ”मुख्य न्यायाधीश के तौर पर मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने जो व्यवस्था बनाई है, वह मजबूत, जवाबदेह और समय पर कार्रवाई करने वाली है।”

शिकायतों पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत का मत
उन्होंने शिकायतों के गलत इस्तेमाल की आशंका भी जताई। CJI ने कहा कि अगर हर फैसले पर शिकायत की अनुमति हो तो कोई भी न्यायिक अधिकारी जब अंतरिम आदेश देता है, किसी मामले की सुनवाई टालता है या अंतिम फैसला सुनाता है तो हर चरण पर शिकायत हो सकती है।

उन्होंने कहा कि यह गंभीर चर्चा का विषय है कि क्या हर शिकायत को सार्वजनिक मंच या वेबसाइट पर डालना चाहिए। या फिर इसके लिए एक मजबूत आंतरिक व्यवस्था होनी चाहिए जो पूरी निष्पक्षता और जिम्मेदारी के साथ शिकायतों पर फैसला करे। CJI ने कहा कि ऐसी व्यवस्था पहले से मौजूद है। लेकिन उसमें भी समय-समय पर सुधार और बेहतर काम करने की गुंजाइश हमेशा रहती है।

कोर्ट में पारदर्शिता का मतलब क्या?
CJI सूर्यकांत ने कहा कि अदालत में पारदर्शिता का मतलब सिर्फ खुले दरवाजे और सार्वजनिक सुनवाई नहीं है। हालांकि ये भी इसका हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता का असली मतलब यह है कि अदालत के फैसले के पीछे क्या वजह है, इसे कोई भी व्यक्ति समझ और जांच सकता है। इसमें वह पक्ष भी शामिल है जिसके खिलाफ फैसला आया है।

उन्होंने कहा कि अगर कोई अदालत सिर्फ अपना फैसला सुनाती है। लेकिन उसके पीछे की वजह नहीं बताती तो उसे पूरी तरह पारदर्शी नहीं कहा जा सकता।

जनता का भरोसा और जनता की मंजूरी एक जैसी चीज नहीं है। इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि दोनों के बीच का अंतर बहुत मायने रखता है।

उन्होंने कहा, ”अदालत लोगों की पसंद बनकर या उनकी इच्छा के मुताबिक फैसला देकर भरोसा हासिल नहीं करती। अदालत का भरोसा तब बनता है जब जिस व्यक्ति के खिलाफ फैसला आया हो और जो बिल्कुल अलग नतीजा चाहता था, वह भी यह मानकर जाए कि उसके मामले में निष्पक्ष तरीके से फैसला हुआ है। भरोसा हासिल करना मंजूरी पाने से कहीं ज्यादा मुश्किल और ज्यादा महत्वपूर्ण है।”

CJI सूर्यकांत ने दिवंगत जस्टिस कृष्ण अय्यर का जिक्र करते हुए कहा कि वह जानते थे कि संस्थाएं जांच-पड़ताल से बचाकर रखने से साफ-सुथरी नहीं रहतीं। बल्कि वे लगातार जांच के दायरे में आने और उस जांच का सामना करने से मजबूत और विश्वसनीय बनी रहती हैं।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर क्या बोले CJI
‘CJI ने NCERT की एक किताब को लेकर सुप्रीम कोर्ट में शुरू हुई स्वतः संज्ञान (suo motu) कार्यवाही का भी जिक्र किया। इस किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक अध्याय था। उन्होंने कहा कि इस मामले में यह सवाल भी सामने आया कि उचित आलोचना और न्यायपालिका पर जनता के भरोसे के बीच क्या संबंध है।

उन्होंने कहा, ”हमने अपने आदेश में दोहराया कि एक संस्था के तौर पर न्यायपालिका आलोचना से न तो बच सकती है और न ही बचनी चाहिए। पारदर्शिता की असली भावना भी यही है। अदालत जनता का भरोसा हासिल करने के लिए खुद को जांच से ऊपर नहीं रख सकती। उसे जांच, सवाल और जरूरत पड़ने पर आलोचना का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।”

CJI सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका के लिए जनता का भरोसा कोई दिखावे की चीज नहीं है। यही वह आधार है जिस पर न्यायपालिका की पूरी ताकत और अधिकार टिके हैं।

उन्होंने कहा, ”पारदर्शिता इसलिए जरूरी है क्योंकि उसी से भरोसा पैदा होता है। ‘न्याय होता हुआ दिखना’ सिर्फ खुले में निष्पक्ष सुनवाई होने तक सीमित नहीं है। इसका मतलब यह भी है कि न्याय व्यवस्था बार-बार इस सवाल का सामना करने के लिए तैयार रहे कि क्या उसने अपने वादे और जिम्मेदारी को सही तरीके से निभाया है।”

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