Tamil Nadu: विधानसभा से चुनाव पहले गरमाया भाषा विवाद, उदयनिधि स्टालिन बोले- तमिलनाडु में हिंदी की कोई जगह नहीं

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तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर हिंदी बनाम तमिल भाषा विवाद गरमाने लगा है। दरअसल, डिप्टी सीएम उदयनिधि स्टालिन ने हिंदी भाषा को लेकर सख्त रुख अपनाया है और कहा कि तमिल को किसी के सहारे की जरूरत नहीं है।

तमिलनाडु के डिप्टी मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने हिंदी भाषा को लेकर फिर साफ और सख्त रुख दोहराया है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में हिंदी थोपने का विरोध कोई नया मुद्दा नहीं है, बल्कि यह लंबे इतिहास और आंदोलन से जुड़ा हुआ है।

‘1937 के आंदोलन से आज तक वही रुख’
उदयनिधि स्टालिन ने बताया कि सबसे पहला हिंदी विरोध आंदोलन 1937-38 में समाज सुधारक पेरियार ने शुरू किया था, जब स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य बनाने का फैसला लिया गया था। उन्होंने कहा कि उस समय पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि (कलाईनार) भी 14 साल की उम्र में तिरुवरूर में हुए प्रदर्शन में शामिल हुए थे। स्टालिन ने याद दिलाया कि 21 फरवरी 1940 को सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा और हिंदी की अनिवार्यता खत्म कर दी गई।

‘तमिल को किसी सहारे की जरूरत नहीं’
उन्होंने कहा कि कई लोग सवाल उठाते हैं कि जब देश के दूसरे राज्यों में हिंदी स्वीकार कर ली गई है, तो तमिलनाडु ही इसका विरोध क्यों करता है। इस पर उन्होंने जवाब देते हुए कहा कि तमिल भाषा इतनी मजबूत और समृद्ध है कि उसे किसी दूसरी भाषा पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। डिप्टी सीएम ने द्रविड़ आंदोलन की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि डीएमके ही वह पार्टी है जिसने राज्य में दो-भाषा नीति को लागू रखा और साफ कहा कि यहां हिंदी के लिए कोई जगह नहीं होगी।

‘तमिल को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिलाने में डीएमके की अहम भूमिका’
उन्होंने यह भी दावा किया कि डीएमके ने ही राज्य का नाम बदलकर तमिलनाडु रखा और तमिल भाषा को ‘शास्त्रीय भाषा’ का दर्जा दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उदयनिधि स्टालिन के इस बयान को तमिलनाडु की भाषा राजनीति और केंद्र-राज्य संबंधों के संदर्भ में अहम माना जा रहा है, क्योंकि राज्य में लंबे समय से हिंदी विरोध और क्षेत्रीय पहचान का मुद्दा काफी संवेदनशील रहा है।

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