ईरान ने बातचीत में 10 बिंदुओं की योजना पेश की थी. इसमें मिडिल ईस्ट से अमेरिकी सेना हटाने, प्रतिबंध खत्म करने, युद्ध की भरपाई और होर्मुज स्ट्रेट पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की मांग थी.
इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई बहुप्रतीक्षित बातचीत आखिरकार किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. करीब 21 घंटे तक चली इस लंबी और अहम मीटिंग से उम्मीद थी कि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव को कम करने का रास्ता निकलेगा और जंग पर विराम लग सकेगा. लेकिन रविवार को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ कर दिया कि उनकी टीम बिना किसी समझौते के पाकिस्तान से लौट रही है. इससे यह साफ हो गया है कि दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी काफी गहरे हैं और हालात जल्दी सुधरते नजर नहीं आ रहे.
दोनों देशों के प्रतिनिधि लगातार 21 घंटे तक आमने-सामने बैठकर बातचीत करते रहे. इस दौरान कई दौर की चर्चा हुई और अलग-अलग मुद्दों पर विस्तार से विचार किया गया. लिखित प्रस्ताव भी एक-दूसरे को दिए गए, लेकिन कोई ऐसा रास्ता नहीं निकल पाया जिस पर दोनों सहमत हो सकें.

अमेरिका चाहता था कि ईरान कुछ अहम मुद्दों पर साफ और मजबूत वादा करे. लेकिन ईरान ने इन शर्तों को मानने से इनकार कर दिया. जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिका ने अपनी सीमाएं साफ कर दी थीं, लेकिन ईरान उस पर सहमत नहीं हुआ.
सबसे बड़ा विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर रहा. अमेरिका चाहता है कि ईरान यह गारंटी दे कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और न ही ऐसी तकनीक विकसित करेगा जिससे वह जल्दी हथियार बना सके. लेकिन इस पर भरोसा नहीं बन पाया.
होर्मुज स्ट्रेट भी इस बातचीत का बड़ा मुद्दा रहा. यह दुनिया का बहुत महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है, जहां से लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है. ईरान इस पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है, जबकि अमेरिका चाहता है कि यह रास्ता सभी देशों के लिए खुला रहे.
ईरान की मांग है कि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं और उसकी विदेशों में फंसी संपत्तियों को वापस किया जाए. अमेरिका इस पर सख्त रुख अपनाए हुए है, जिससे बातचीत और मुश्किल हो गई.
इसी बीच इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि उनका देश ईरान और उसके सहयोगियों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगा. लेबनान में हो रहे हमलों से क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है, जिससे बातचीत का माहौल भी प्रभावित हुआ.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अगर समझौता नहीं भी होता है तो अमेरिका को कोई फर्क नहीं पड़ेगा. उनका यह बयान दिखाता है कि अमेरिका दबाव में आकर समझौता करने के मूड में नहीं है.
इस पूरी बातचीत में पाकिस्तान ने अहम भूमिका निभाई. उसने दोनों देशों को बातचीत के लिए एक मंच पर लाया. जेडी वेंस ने भी पाकिस्तान की कोशिशों की तारीफ की, लेकिन कहा कि मतभेद इतने गहरे थे कि समझौता नहीं हो पाया.
ईरान ने बातचीत में 10 बिंदुओं की योजना पेश की थी. इसमें मिडिल ईस्ट से अमेरिकी सेना हटाने, प्रतिबंध खत्म करने, युद्ध की भरपाई और होर्मुज स्ट्रेट पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की मांग शामिल थी. ये मांगें अमेरिका के लिए स्वीकार करना मुश्किल थीं.
अब जब बातचीत फेल हो गई है, तो स्थिति और जटिल हो गई है. होर्मुज स्ट्रेट, परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध और क्षेत्रीय संघर्ष जैसे मुद्दे अभी भी हल नहीं हुए हैं. अगर जल्द कोई समझौता नहीं हुआ, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है. तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, व्यापार प्रभावित हो सकता है और मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ सकता है. आने वाले समय में यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है, जिससे वैश्विक स्थिरता पर भी असर पड़ेगा.


