रीवा के एसडीएम आर.के. सिन्हा ने बुजुर्ग दंपत्ति की हालत देखकर भावुक होकर इंसाफ दिलाया. बेटों ने दो साल से नहीं दी थी मदद, जेल की चेतावनी पर सौंपा 28-28 हजार का चेक.

रीवा जिले के सिरमौर विधानसभा क्षेत्र से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो दिल को झकझोर देती है. एक ओर जहां समाज में बुजुर्गों की उपेक्षा आम होती जा रही है, वहीं सिरमौर के एसडीएम आर.के. सिन्हा ने एक ऐसा कदम उठाया, जो न केवल प्रशासनिक कर्तव्य था, बल्कि मानवीय करुणा की भी अनोखी मिसाल बन गया.
श्रीनिवास द्विवेदी और उनकी पत्नी, उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां उन्हें अपने बेटों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी. मगर दुखद ये रहा कि उनके दो पुत्रों—विनोद और विजय—ने उन्हें अकेला छोड़ दिया. दो साल से वृद्ध दंपत्ति भरण-पोषण के लिए तरसते रहे. अक्टूबर 2023 में उन्होंने एसडीएम कार्यालय में न्याय की गुहार लगाई थी. पहले भी आदेश पारित हुए, लेकिन बेटों ने अनदेखी कर दी.
जब हाल ही में दोबारा शिकायत आई, तो एसडीएम ने दोनों को बुलवाया. वृद्ध पिता को फटी धोती और मां को जर्जर साड़ी में देख कर एसडीएम भावुक हो उठे. उन्होंने तुरंत पुलिस को पत्र लिखकर बेटों को न्यायालय में हाजिर होने के निर्देश दिए और चेताया कि यदि भरण-पोषण नहीं दिया गया, तो उन्हें जेल भेजा जाएगा. इस चेतावनी का असर यह हुआ कि दोनों बेटों ने तुरंत 28-28 हजार रुपये के चेक सौंपे और बाकी बकाया 31 मार्च तक देने की बात कही.
जब न्याय की रोशनी इन बुजुर्गों तक पहुँची, तो पिता की आंखों से आंसू छलक पड़े. हाथ जोड़कर एसडीएम को धन्यवाद दिया. इस दौरान एसडीएम ने श्रीनिवास को नई धोती-कुर्ता और श्रीफल भेंट किया, वहीं उनकी पत्नी को साड़ी देकर सम्मानित किया. यह वह पल था, जब सरकारी कुर्सी पर बैठा एक अधिकारी सिर्फ शासक नहीं, बल्कि संबल और संवेदना का प्रतीक बन गया.
देश के कोने-कोने में ऐसे अनेक बुजुर्ग हैं, जिन्हें उनके ही बच्चों ने बेसहारा कर दिया है. कभी वृद्धाश्रम तो कभी दर-दर की ठोकरें उनकी नियति बन जाती हैं. लेकिन सिरमौर में आरके सिन्हा जैसे अधिकारियों की पहल उम्मीद की वह लौ हैं, जो अंधेरे में डूबे जीवन को रोशन कर सकती है. यह कहानी उन सभी कलयुगी संतानों के लिए चेतावनी भी है, जो अपने बुजुर्गों को बोझ समझने की भूल करते हैं.

