Tuesday, May 5, 2026
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WORLD : यूएई के फुजैराह तेल संयंत्र पर हमला, ड्रोन और मिसाइल से भड़की आग

अबू धाबी/फुजैराह, 04 मई (हि.स.)। संयुक्त अरब अमीरात के फुजैराह क्षेत्र में स्थित एक पेट्रोलियम साइट पर हमले के बाद भीषण आग लगने की खबर है। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, यह घटना कथित तौर पर ईरान की ओर से किए गए ड्रोन हमले के बाद सामने आई, जिससे इलाके में हड़कंप मच गया।

फुजैराह मीडिया कार्यालय के अनुसार, हमले के तुरंत बाद पेट्रोलियम इंडस्ट्री एरिया में आग तेजी से फैल गई। आग पर काबू पाने के लिए फायर ब्रिगेड और आपातकालीन सेवाओं की टीमें तुरंत मौके पर पहुंचीं और बुझाने का काम शुरू किया गया। जानकारी के मुताबिक, इस हमले में तीन भारतीय घायल हुए हैं।

इससे पहले, यूएई के रक्षा मंत्रालय ने जानकारी दी थी कि देश की ओर कुछ मिसाइलें दागी गई थीं। अधिकारियों के मुताबिक, इनमें से कई मिसाइलों को वायु रक्षा प्रणाली ने रास्ते में ही निष्क्रिय कर दिया। हालांकि, कुछ हमलों के कारण सीमित स्तर पर नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है।

घटना के बाद पूरे इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और संवेदनशील ठिकानों पर निगरानी बढ़ा दी गई है। माना जा रहा है कि फुजैराह, जो यूएई का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा और तेल निर्यात केंद्र है, पर हमला क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकता है।

हाल के दिनों में खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों और टकराव की घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के इलाकों में पहले से ही तनाव बना हुआ है, ऐसे में इस तरह की घटनाएं वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और बाजारों पर असर डाल सकती हैं।

फिलहाल, यूएई प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है और नुकसान का आकलन किया जा रहा है। अधिकारियों ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और आधिकारिक सूचनाओं का ही पालन करने की अपील की है।

WORLD : होर्मुज में अमेरिकी जहाज पर ईरान का मिसाइल अटैक:अमेरिका बोला- ये झूठ; ट्रम्प ने कहा था यहां फंसे जहाजों को सुरक्षित निकालेंगे

ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में एक अमेरिकी नेवी शिप पर दो मिसाइलें दागीं। हमले में जहाज को नुकसान पहुंचा, जिसके बाद उसे पीछे हटना पड़ा। ईरानी न्यूज एजेंसी फार्स ने इस बारे में जानकारी दी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह हमला तब किया गया जब अमेरिकी जहाज ईरानी नौसेना की चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए होर्मुज से गुजरने की कोशिश की।

हालांकि, अमेरिकी सेंट्रल कमांड सेंटकॉम ने होर्मुज में अपने किसी भी नौसैनिक जहाज पर हमले की खबरों को खारिज कर दिया है। सेंटकॉम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि अमेरिकी सेना होर्मुज में प्रोजेक्ट फ्रीडम के तहत काम कर रही है।

इससे पहले, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा था कि अमेरिकी सेना इस इलाके में फंसे जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालने में मदद करेगी और किसी भी रुकावट का कड़ा जवाब दिया जाएगा।

NATIONAL : सुनेत्रा पवार ने बारामती में रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की, अजीत पवार के रिकॉर्ड को तोड़ा

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महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री और महायुति पार्टी की उम्मीदवार सुनेत्रा पवार ने सोमवार को बारामती विधानसभा उपचुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। सुनेत्रा को 2,18,969 वोट मिले और उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी को 2,18,034 वोटों से हराया।

पवार परिवार के अभेद्य गढ़ के रूप में जाना जाने वाला यह निर्वाचन क्षेत्र पूर्व उपमुख्यमंत्री अजीत पवार की विमान दुर्घटना में मृत्यु के बाद खाली हो गया था। इससे पहले, अजीत पवार ने इसी निर्वाचन क्षेत्र से 1.65 लाख वोटों का रिकॉर्ड बनाया था। हालांकि, सुनेत्रा पवार ने आज के नतीजों में इस आंकड़े को पार कर लिया है।

बारामती के अलावा, महायुति ने राहुरी विधानसभा उपचुनाव भी जीता। भाजपा विधायक शिवाजीराव करदिले के निधन के बाद यह सीट खाली हुई थी। भाजपा ने तब उनके बेटे अक्षय करदिले को इस सीट से उम्मीदवार बनाया। अक्षय ने एनसीपी (एसपी) उम्मीदवार मोकाटे गोविंद खांडू को 1,12,587 वोटों से हराया। अक्षय को 1,40,093 वोट मिले।

महा विकास अघाड़ी द्वारा सुनेत्रा के खिलाफ उम्मीदवार न उतारने का फैसला करने के बाद उनकी जीत का रास्ता आसान हो गया।इससे पहले, सुनेत्रा ने एनसीपी कार्यकर्ताओं और अपने समर्थकों से अपील की थी कि परिणाम घोषित होने के बाद वे विजय जुलूस न निकालें।

X पर एक पोस्ट में उन्होंने लिखा, “आज जैसे ही परिणाम घोषित किए जा रहे हैं, मैं आपके वोटों के माध्यम से मुझ पर जताए गए विश्वास को आदरणीय अजीत दादा (जैसा कि उन्हें प्यार से बुलाया जाता था) की पवित्र स्मृति को समर्पित करती हूं।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं और समर्थकों से, जो दादा से बेहद प्यार करते थे, विनम्र अपील करती हूं कि वे विजय जुलूस न निकालें और न ही गुलाल से जश्न मनाएं। आइए हम संयम बनाए रखें और उनके आदर्शों के अनुरूप आचरण करें।”

उन्होंने जनादेश देने के लिए मतदाताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा, “दादा के सपने को साकार करने का अवसर देने के लिए मैं बारामती की जनता की तहे दिल से आभारी हूं। यह अंत नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प, संघर्ष और एक नए बारामती की शुरुआत है।”

NATIONAL : तृणमूल से बहुसंख्यक नाराज, मुस्लिम सीटों पर झटका, कांग्रेस-लेफ्ट ने किया खेला; ओवैसी बेअसर

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बंगाल चुनाव में मुस्लिम वोटों के बंटवारे ने टीएमसी का खेल बिगाड़ दिया। पार्टी की मुस्लिम बहुल सीटें 75 से घटकर 50 रह गईं। कांग्रेस, वाम दल और हुमायूं कबीर ने टीएमसी के वोट काटे, जिसका फायदा भाजपा को मिला। भाजपा ने इन इलाकों में 18 सीटें जीतीं, जबकि ओवैसी का खाता भी नहीं खुला।

दुर्गा पंडालों और जनसभाओं में मक्का-मदीना की प्रशंसा भरे गीत गाने सहित मुस्लिम मतों को साधने के लिए नई-नई जुगत भिड़ाने का तृणमूल का दांव सफल नहीं रहा। तृणमूल को जहां दूसरे इलाकों में हिंदू मतों के ध्रुवीकरण का झटका लगा, वहीं मुस्लिम मतों के बिखराव का भी दंश झेलना पड़ा। 30 फीसदी से

बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं की कुल मतों में हिस्सेदारी करीब 28 फीसदी है। मुस्लिम मतदाता कई दशकों से 85 सीटों पर जीत-हार की पटकथा लिखते रहे थे। तृणमूल ने पिछली बार इनमें से 75 सीटें हासिल कर प्रचंड जीत दर्ज की थी। इस बार त्रिकोणीय मुकाबले से बाजी पलट गई। चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी कोई कमाल नहीं दिखा सकी।

तृणमूल कांग्रेस, जिसके पास बीते चुनाव में 50 फीसदी से अधिक मुस्लिम वोटरों वाली 43 में से 42 सीटें थी, उसकी संख्या घट कर 30 रह गई। वहीं, 30 फीसदी से अधिक वोटरों वाली 42 मुस्लिम सीटें, जिनमें तृणमूल के पास 33 सीटें थी, इस बार घट कर 20 रह गईं।

त्रिकोणीय लड़ाई में तृणमूल को नुकसान
मालदा, मुर्शिदाबार, उत्तर दिनाजपुर समेत कई क्षेत्रों की मुस्लिम बाहुल्य इन सीटों पर कहीं वाम दल, कहीं हुमायूं कबीर, कहीं एआईएसएफ तो कहीं कद्दावर निर्दलीय उम्मीदवारों ने मुकाबले को त्रिकोणात्मक या बहुकोणीय बना दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा 18 सीटें जीतने में कामयाब रही। हुमायूं कबीर दोनों सीटों पर जीते, मगर तीन अन्य सीटों पर तृणमूल की हार का कारण बने। कांग्रेस, निर्दलीय, एआईएसएफ ने तृणमूल को नुकसान पहुंचाया।

कांग्रेस मुस्लिम बाहुल्य फरक्का, रानीनगर, हुमायूं नौदा और रेजीनगर, एआईएसएफ भांगड़ सीट जीतने में कामयाब रही। इन दलों ने 20 सीटों पर मुस्लिम मतों में बंटवारा कर तृणमूल को नुकसान पहुंचाया।

ओवैसी की उम्मीदों पर फिरा पानी, एक भी जीत नहीं जीत सके
बंगाल चुनाव ने हैदराबाद से सांसद ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अरमानों पर पानी फेर दिया। पार्टी मुश्किल से बारह सीटें ही लड़ी थी, पर कामयाबी कहीं नहीं मिली। न हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी से गठबंधन तोड़कर अलग होने का फैसला सही ठहरा, न ही मुस्लिम वोटों की ध्रुवीकरण की कोशिश कामयाब हुई। बंगाल की सियासत में राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश करने का उसका मौका फिलहाल उसके हाथ से निकल गया है।

बिहार विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीत कर बेहतर प्रदर्शन करने पर माना जा रहा था कि ओवैसी बंगाल में कुछ बेहतर करेंगे। मुस्लिम वोटों को लेकर उनकी सक्रियता से तृणमूल भी बेचैन हो गई। मालदा जिले की मोथाबाड़ी और सुजापुर, मुर्शिदाबाद की सूती, रघुनाथगंज और कांदी, बीरभूम की नलहाटी और मुरारई, पश्चिम बर्धमान की आसनसोल उत्तर, उत्तर 24 परगना की हाबरा, बारासात और बसीरहाट दक्षिण उत्तर दिनाजपुर की करंदीघी सीट पर चुनाव लड़ा। यह वहीं सीटें हैं जिन्हें पिछली बार तृणमूल ने जीता। इसी कारण तृणमूल ने उस पर भाजपा की बी-टीम के रूप में काम करने और विपक्ष के मुस्लिम वोटों को बांटने का आरोप लगाया।

ओवैसी की पार्टी ने एक दो सीट को छोड़कर हर जगह निराशाजनक प्रदर्शन किया। 12 सीटों पर महज 0.09 फीसदी यानी 53924 वोट ही मिले।

NATIONAL : कांग्रेस की करारी हार के बाद नेता जितेंद्र सिंह ने असम प्रभारी पद से इस्तीफा दे दिया।

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जितेंद्र सिंह ने सोमवार को असम के प्रभारी पार्टी महासचिव पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया, और विधानसभा चुनावों के परिणामों की जिम्मेदारी ली जिसमें उनकी पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा।कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खर्गे को लिखे अपने इस्तीफे पत्र में सिंह ने कहा कि संगठन के हित में यही है कि वह पद छोड़ दें ताकि नए नेतृत्व और नई दिशा को जगह मिल सके।

“मैं तत्काल प्रभाव से असम के प्रभारी महासचिव पद से अपना इस्तीफा दे रहा हूं। हाल के चुनाव परिणाम बेहद निराशाजनक रहे हैं, और मैं इन परिणामों में अपनी भूमिका की पूरी जिम्मेदारी लेता हूं,” सिंह ने कहा।

उन्होंने कहा, “अपने सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद, हम असम के लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ रहे, जिनकी सेवा करने का हमने लक्ष्य रखा था। संगठन के हित में यही उचित है कि मैं पद छोड़ दूं ताकि नए नेतृत्व और नई दिशा को अवसर मिल सके।”

सिंह ने कहा कि उन्हें सेवा करने का अवसर मिला और अपने कार्यकाल के दौरान उन पर जो भरोसा जताया गया, उसके लिए वे आभारी हैं। उन्होंने कहा, “मैं असम की जनता के साथ-साथ असम के कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को उनके द्वारा दिखाए गए प्रेम और सम्मान के लिए धन्यवाद देता हूं।”उन्होंने आगे कहा, “मैं कांग्रेस पार्टी के मूल्यों और दृष्टिकोण के प्रति प्रतिबद्ध हूं और पार्टी के प्रयासों को उचित समझे जाने वाली किसी भी क्षमता में समर्थन देना जारी रखूंगा।”

सत्तारूढ़ एनडीए ने सोमवार को 126 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लगातार तीसरी बार असम में सरकार बनाने की राह पर कदम रखा है।जहां भाजपा ने 82 सीटें जीतीं, वहीं उसके सहयोगी दलों – बोडो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) और असम गण परिषद (एजीपी) – ने 10-10 सीटों पर कब्जा जमाया।

कांग्रेस को केवल 19 सीटें मिलीं और एक बड़े झटके के रूप में, उसके प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई जोरहाट में अनुभवी राजनेता और मौजूदा भाजपा विधायक हितेंद्रनाथ गोस्वामी से 23,181 वोटों से हार गए।

NATIONAL : बंगाल की जीत के साथ और ताकतवर हुई भाजपा: अब 21 राज्यों में एनडीए का दबदबा, छह राज्यों तक सिमटा इंडिया गठबंधन

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देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव नतीजों में बड़ा राजनीतिक बदलाव दिख रहा है। पश्चिम बंगाल में भाजपा बहुमत की ओर बढ़ रही है। इससे एनडीए 21 राज्यों में मजबूत हो गया है। वहीं, इंडिया गठबंधन छह राज्यों तक सिमटता नजर आ रहा है। तमिलनाडु में विजय की पार्टी ने चौंकाया है, जबकि केरल में कांग्रेस को राहत मिली है। असम में भी भाजपा ने जीत की हैट्रिक लगाई है।

पश्चिम बंगाल के चुनावी रण में शानदार फतह हासिल करने के साथ ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) देश की राजनीति में और भी ज्यादा ताकतवर हो गई है। बंगाल के इतिहास में एक ‘जीत’ का नया अध्याय जोड़ते हुए विपक्ष को करारी मात दी है। इस प्रचंड जीत के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का दबदबा देश के 21 राज्यों में कायम हो गया है। वहीं, केंद्र में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रहा इंडिया गठबंधन अब सिकुड़ कर सिर्फ छह राज्यों तक ही सीमित रह गया है। इस नतीजे ने देश के सियासी नक्शे को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है।

चुनाव आयोग के रुझानों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में भाजपा ने 147 सीटों के जादुई आंकड़े को आसानी से पार कर लिया है और दोपहर ढाई बजे तक वह 191 सीटों पर बढ़त के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। इस ऐतिहासिक जीत की खबर मिलते ही कोलकाता स्थित पार्टी कार्यालय में जश्न का माहौल बन गया। भाजपा कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे को ‘झालमुड़ी’ खिलाकर जीत की खुशी मनाई। केंद्रीय मंत्री और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार भी इस जश्न में शामिल हुए। इसके साथ ही असम में भी भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 79 सीटों पर बढ़त बना ली है, जहां जोरहाट सीट से कांग्रेस के गौरव गोगोई को भाजपा के हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने 23,182 वोटों से हरा दिया है। इन शानदार नतीजों को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज नई दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय पहुंचने वाले हैं।

क्या इंडिया गठबंधन और कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी?
इस चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन के भविष्य पर अनिश्चितता के भारी बादल मंडराने लगे हैं। भले ही केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन ने जीत हासिल की हो, लेकिन तमिलनाडु में द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा है। वहां ‘जन नायक’ अभिनेता विजय की नई पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) ने जबरदस्त उलटफेर करते हुए 234 में से 110 सीटों पर बढ़त बना ली है और विजय के परिवार में जश्न मन रहा है। अब कांग्रेस के पास अपने दम पर देश में सिर्फ तीन राज्यों- कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में ही पूर्ण बहुमत की सरकार बची है। इसके अलावा वह झारखंड में हेमंत सोरेन की पार्टी के साथ गठबंधन में है। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है, जो केंद्र में भाजपा का विरोध करती है लेकिन वह इंडिया गठबंधन से बाहर है।

21 राज्यों के जादुई आंकड़े तक पहुंचा एनडीए गठबंधन
पश्चिम बंगाल की शानदार फतह के बाद भाजपा ने अपने दम पर 15 राज्यों में सरकार बनाने का आंकड़ा छू लिया है। देश में कुल 29 राज्य हैं और बहुमत के लिए 14.5 राज्यों का आंकड़ा चाहिए होता है, जिसे भाजपा ने अकेले ही पार कर लिया है। इसके अलावा, अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर भाजपा का यह आंकड़ा 21 राज्यों तक पहुंच गया है। इसमें बिहार में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू), आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी), नगालैंड में नगा पीपुल्स फ्रंट और मेघालय में नेशनल पीपुल्स पार्टी के साथ गठबंधन की सरकारें शामिल हैं। इसका सीधा मतलब है कि देश के एक बहुत बड़े हिस्से पर अब सीधे तौर पर एनडीए का राज हो गया है।

NATIONAL : राहुल ने असम-बंगाल के नतीजों पर साधा निशाना; कहा- चुनाव चोरी, संस्था चोरी- अब और चारा ही क्या है!

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कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोमवार को गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि असम और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा चुनाव आयोग के सहयोग से चोरी किए गए हैं। उन्होंने दावा किया कि यह कोई अलग घटना नहीं, बल्कि एक लगातार दोहराया जाने वाला पैटर्न है। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि वे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इस आरोप से सहमत हैं कि राज्य में 100 से अधिक सीटें छीन ली गईं। उन्होंने लिखा कि असम और बंगाल के चुनाव परिणाम लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

कई राज्यों में दिखा पैटर्न- राहुल गांधी
राहुल गांधी ने आगे दावा किया कि यही स्थिति पहले भी कई चुनावों में देखी गई है। उन्होंने मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और लोकसभा 2024 का उल्लेख करते हुए कहा कि इन सभी चुनावों में एक समान पैटर्न सामने आया है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

ममता बनर्जी ने भी लगाए थे गंभीर आरोप
इससे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी भाजपा पर बड़ा हमला बोलते हुए आरोप लगाया था कि राज्य में 100 से अधिक सीटें लूटी गई हैं। उन्होंने चुनाव आयोग को भाजपा का आयोग बताते हुए चुनाव परिणामों को अनैतिक और अवैध करार दिया था। ममता बनर्जी ने कहा था कि उन्होंने संबंधित अधिकारियों को शिकायत दी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने केंद्रीय बलों की तैनाती और केंद्र सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए और इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताया।

बंगाल में बदले राजनीतिक समीकरण
हालांकि, चुनाव परिणामों के ताजा रुझानों में पश्चिम बंगाल में भाजपा को स्पष्ट बढ़त मिलती दिख रही है, जबकि टीएमसी को बड़ा नुकसान हुआ है। कई प्रमुख सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों ने मजबूत प्रदर्शन किया है। भवानीपुर और नंदीग्राम जैसी हाई-प्रोफाइल सीटों पर भी भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने जीत हासिल की, जिससे राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।

चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, कई सीटों पर मतगणना के अंतिम चरणों में भाजपा उम्मीदवार आगे रहे हैं, जिससे राज्य में सत्ता समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने भारी बहुमत हासिल किया था, जबकि भाजपा उस समय मुख्य विपक्ष के रूप में उभरी थी।

NATIONAL : अब कैसा दिखता है देश का सियासी नक्शा? नए शीर्ष पर पहुंची भाजपा, 72% क्षेत्रफल भगवामय

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पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी के नतीजे के साथ देश के सियासी नक्शे का रंग भी बदलेगा। आइये जानते हैं अभी कैसा है देश का सियासी नक्शा? पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद कैसे देश की सियासी तस्वीर बदली है? आइये जानते हैं…

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी में आज मतगणना है। मतगणना के साथ ही यह भी साफ हो जाएगा कि किस राज्य में किस दल की सरकार बनेगी। कहां कौन सत्ता में वापसी करेगा और कहां परिवार्तन होगा सब दोपहर तक साफ हो जाएगा। नतीजों के साथ देश के सियासी नक्शे का रंग भी बदलेगा।

कहां-कहां भाजपा-सहयोगियों की सरकार?
चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की मतगणना से पहले की बात करें तो इस वक्त 20 राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगियों की सरकार है। इनमें से 12 राज्यों में सीधा भाजपा अपने बल पर सत्ता में है, जबकि आठ राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगी सत्ता में हैं।


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राज्य

किससे गठबंधन?

आंध्र प्रदेश

टीडीपी, भाजपा

अरुणाचल प्रदेश

भाजपा

असम

भाजपा, एजीपी, यूपीपीएल, बीपीएफ

बिहार

जदयू, भाजपा, हम, लोजपा (आर), रालोमो

छत्तीसगढ़

भाजपा

दिल्ली

भाजपा

गोवा

भाजपा

गुजरात

भाजपा

हरियाणा

भाजपा

मध्य प्रदेश

भाजपा

महाराष्ट्र

भाजपा, शिवसेना (शिंदे गुट), एनसीपी (अजित गुट)

मणिपुर

भाजपा

मेघालय

एनपीपी, भाजपा

नगालैंड

एनडीपीपी, एनपीएफ, भाजपा

पुडुचेरी

एआईएनआरसी, भाजपा

ओडिशा

भाजपा

राजस्थान

भाजपा

त्रिपुरा

भाजपा, आईपीएफटी

उत्तर प्रदेश

भाजपा

उत्तराखंड

भाजपा

चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के नतीजों के मुताबिक, भाजपा अब जिन 21 राज्यों में शासन कर रही है, अगर उनका कुल क्षेत्रफल निकालें तो यह देश का करीब 72 फीसदी है। वहीं, आबादी के मामले में भाजपा इस वक्त भारत की 76 फीसदी आबादी पर शासन कर रही है।

भाजपा मौजूदा समय में जिन 21 राज्यों में शासन कर रही है, उनमें सबसे बड़ा राज्य राजस्थान है, जिसका क्षेत्रफल देश के कुल क्षेत्रफल का 10.40% है। वहीं, सबसे छोटा पुदुचेरी है, जिसका क्षेत्रफल देश का 0.01 फीसदी है।

इसके अलावा आबादी के लिहाज से भाजपा के शासन वाला सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश है, जिसके पास देश में 16.50 फीसदी आबादी है। वहीं, सबसे छोटा पुदुचेरी है, जिसकी आबादी देश की 0.10 फीसदी है।

कितने राज्यों की सरकार में कांग्रेस या गठबंधन की सरकार?

राज्य

किससे गठबंधन?

हिमाचल प्रदेश

कांग्रेस

झारखंड

जेएमएम, कांग्रेस

तमिलनाडु

डीएमके, कांग्रेस

कर्नाटक

कांग्रेस

तेलंगाना

कांग्रेस

जम्मू-कश्मीर

नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस

किन राज्यों में अन्य दलों की सरकार

राज्य

किस दल की सरकार

पंजाब

आप

पश्चिम बंगाल

तृणमूल कांग्रेस

केरल

एलडीएफ

सिक्किम

एसकेएम

मिजोरम

जेडपीएम

जब मोदी सत्ता में आए तब सात राज्यों में थीं भाजपा सरकारें
मई 2014 में नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली थी। उनके सत्ता में आने के समय देश के सात राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगी दल सरकार चला रहे थे। इनमें पांच राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री थे, जबकि आंध्र प्रदेश और पंजाब में उसकी सहयोगी पार्टी सत्ता में थी। इन दो राज्यों में देश की छह फीसदी से ज्यादा आबादी रहती है। बाकी पांच राज्यों छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा के मुख्यमंत्री थे। इन राज्यों में देश की 19 फीसदी से ज्यादा आबादी रहती है।

यानी, जब नरेंद्र मोदी देश की सत्ता में आए उस वक्त करीब 26 फीसदी आबादी पर भाजपा और उसकी सहयोगी सरकारें चल रही थीं। उस वक्त देश के 14 राज्यों में कांग्रेस और उसके सहयोगी पार्टियों की सरकार थी। कांग्रेस शासित इन राज्यों में देश की 37 फीसदी से ज्यादा आबादी रहती है। इन राज्यों में महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे बड़े राज्य शामिल थे।

2018 में पीक पर पहुंची भाजपा
2014 में सात राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकार थी। चार साल बाद मार्च 2018 में 21 राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकार थी। इन राज्यों में देश की करीब 71 फीसदी आबादी रहती है। ये वो दौर था, जब भाजपा शासन आबादी के लिहाज से पीक पर था। वहीं, चार राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। इन राज्यों की सात फीसदी आबादी रहती है।

दिल्ली चुनाव के नतीजों का क्या असर?
बिहार चुनाव से पहले दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए। फरवरी 2025 में हुए इस चुनाव के बाद 27 साल बाद भाजपा ने दिल्ली में वापसी की। देश की आबादी का लगभग 1.3 फीसदी हिस्सा यहां रहता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, दिल्ली की आबादी 1.68 करोड़ थी। देश के 0.02 फीसदी भू-भाग वाले केंद्र शासित प्रदेश में फरवरी 2025 तक आम आदमी पार्टी की सरकार शासन कर रही थी।

बिहार चुनाव में जीत के बाद क्या स्थिति?
बिहार में बीते साल नवंबर में एक बार फिर एनडीए की सरकार बनने के साथ ही देश के सियासी नक्शे में कोई बदलाव नहीं हो पाया। अगर सरकार बदलती तो भाजपा और उसके सहयोगी सरकारों की देश में कुल संख्या सिमटकर 19 राज्यों तक रह जाती, हालांकि एनडीए ने अपनी जमीन बचाए और बनाए रखी। फिलहाल एनडीए 20 राज्यों में काबिज है। अब 2026 के चुनाव उसकी बढ़ती या कम होती जमीन पर फैसला करेंगे।

NATIOANL : ममता बनर्जी के सत्ता गंवाने की ये रहीं 5 बड़ी वजह…

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पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी पहली बार राज्य में सत्ता में आने जा रही है और उसे दो-तिहाई से ज़्यादा बहुमत मिला है. बीजेपी ने जहां 206 सीटें जीत ली हैं, वहीं टीएमसी 80 पर ही जीत दर्ज कर सकी है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद अपनी भवानीपुर सीट से बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी से 15 हज़ार से अधिक वोटों से हार गईं. उससे पहले मतगणना के दौरान ही उन्होंने बीजेपी पर ‘वोट लूट’ का आरोप लगाया.

उन्होंने पत्रकारों से कहा, “बीजेपी ने 100 से ज्यादा सीटों की लूट की है. बीजेपी की जीत अनैतिक है. इलेक्शन कमीशन ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के साथ मिलकर जो किया है वो पूरी तरह अनैतिक है.”

उन्होंने जोर-जबरदस्ती से एसआईआर करने के आरोप लगाए और कहा, “उन्होंने अत्याचार किया. काउंटिंग एजेंटों को गिरफ़्तार किया. हम वापसी करेंगे.”

लेकिन पंद्रह साल तक लगातार सत्ता में रहने के बाद, तृणमूल कांग्रेस की इस चुनावी हार की वजह क्या हो सकती है, इसे लेकर काफ़ी चर्चा है.अब तक सामने आए नतीजों और रुझानों के आधार पर इस हार के पीछे पांच प्रमुख कारण माने जा रहे हैं.ममता बनर्जी, शुभेंदु अधिकारी और विजय के साथ-साथ चर्चित चेहरों की सीट का हाल जानिए

ममता बनर्जी के मज़बूत क़िले में कैसे हुई बीजेपी की एंट्री

  1. महिला सुरक्षा का सवाल
    कोलकाता में बीबीसी संवाददाता इशाद्रिता
    इमेज कैप्शन,कोलकाता में बीबीसी संवाददाता इशाद्रिता ने महिलाओं से बात की
    इसमें बहुत कम शक है कि पश्चिम बंगाल में महिला मतदाताओं का बड़ा हिस्सा लंबे समय से ममता बनर्जी की पार्टी का समर्थन करता रहा है.

स्कूली लड़कियों को साइकिल बांटने की योजना समेत लक्ष्मीर भंडार, कन्याश्री और सबुज साथी जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच तृणमूल सरकार को काफ़ी लोकप्रिय बनाया था.

लेकिन इस बार यह समर्थन आधार टूटता हुआ दिखाई दे रहा है. इसकी एक बड़ी वजह महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर पार्टी की कथित नाकामी हो सकती है.

दो साल पहले हुआ आरजी कर आंदोलन इस चुनाव को प्रभावित करता दिखा. इसका बड़ा उदाहरण पानीहाटी है, जिसे पारंपरिक तौर पर तृणमूल का गढ़ माना जाता रहा है.

वहां आरजी कर मामले में महिला की मां बीजेपी के टिकट पर चुनावी मैदान में थीं और उन्होंने 28,836 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.

पश्चिम बंगाल कवर कर रहे बीबीसी संवाददाताओं से भी कुछ महिलाओं की बातों सुरक्षा जैसे मुद्दे आए.

चुनाव प्रचार जब चल रहा था तो एक महिला ने टीएमसी सरकार के फिर से आने के सवाल पर कहा था, “क्या अब हम सुरक्षित भी रह पाएंगे? यही डर है. मैं अपने इन भाइयों की बात से सहमत हूं, मेरे पास अलग से कहने के लिए कुछ नहीं है. महिलाओं की अब कोई इज़्ज़त नहीं बचेगी. बिल्कुल भी नहीं. वे हमें तोड़कर रख देंगे. नहीं तो हमें यह क्यों सोचना पड़ता कि अभया की मां को जीत के बाद ही न्याय मिलेगा? क्या राज्य की हालत अब ऐसी हो गई है? क्या आप सोच सकते हैं कि वे हमारे साथ क्या करेंगे?”

कोलकाता में एक महिला के तौर पर सुरक्षित महसूस करने के सवाल पर एक महिला ने कहा, “आरजी कर घटना के बाद मैं अपने साथ कुछ सुरक्षा उपाय लेकर चलती हूं.”

एक अन्य युवती ने कहा, “कुछ जगहें अनसेफ़ महसूस होती हैं और रात के 9 -10 बजे के बाद तो असुरक्षित महसूस होता है.”

NATIONAL : केरलम में ‘लेफ्ट’ का आखिरी किला भी धवस्त, 50 साल में पहली बार एक भी राज्य में नहीं बची सरकार

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भारतीय राजनीति के मानचित्र पर दशकों तक अपनी गहरी ‘लाल’ छाप छोड़ने वाला वामपंथ आज एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां उसके पैरों के नीचे से आखिरी जमीन भी खिसक चुकी है।

केरलम विधानसभा चुनावों के परिणामों ने न केवल वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) की हार सुनिश्चित कर दी, बल्कि पिछले पांच दशकों के उस गौरवशाली अध्याय पर भी विराम लगा दिया जिसमें कम्युनिस्टों के पास कम से कम एक राज्य की सत्ता सुरक्षित रहती थी।

कभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति में एक शक्तिशाली ताकत रहने वाले वामदल अब 50 वर्षों से अधिक समय में पहली बार सभी राज्यों में सत्ता से बेदखल हो चुके हैं। दस साल बाद राज्य में कांग्रेस नीत यूडीएफ सरकार बनाएगी।

1977 के बाद यह पहला अवसर होगा जब देश के किसी भी राज्य में वामपंथियों की सरकार नहीं होगी। सत्ता का आखिरी गढ़ और ऐतिहासिक विरासत इस क्षण की गंभीरता को समझने के लिए अतीत पर एक नजर डालना जरूरी है।

केरलम सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि संसदीय साम्यवाद की वैश्विक प्रयोगशाला रहा है। 1957 में ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में यहीं दुनिया की पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार बनी थी। 2011 में बंगाल के 34 वर्षों के शासन के अंत और 2018 में त्रिपुरा के पतन के बाद, केरलम ही वह आखिरी किला था जिसने वामपंथ को राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक बनाए रखा था।

2021 में लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर इतिहास रचने वाली एलडीएफ के लिए यह हार केवल सत्ता का जाना नहीं, बल्कि उस सांगठनिक ऊर्जा का अंत है जो सरकारी संरक्षण से फलती-फूलती थी।

राष्ट्रीय राजनीति में सिकुड़ता प्रभाव एक समय था जब केंद्र की राजनीति वामदलों के इशारों पर घूमती थी। 2004 के दौर को याद करें, जब 61 लोकसभा सीटों के साथ वामपंथियों ने संप्रग सरकार की नीतियों की दिशा तय की थी।

1996 में तो ज्योति बसु, जो पहले ही दो दशकों तक बंगाल के मुख्यमंत्री रह चुके थे, संयुक्त मोर्चा गठबंधन के हिस्से के रूप में प्रधानमंत्री पद के करीब पहुंच गए थे।

बसु इस पद को स्वीकार करने के लिए तैयार थे, लेकिन उनकी पार्टी के पोलित ब्यूरो ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। पार्टी के भीतर ‘केरल लाबी’ के विरोध ने उसे ‘ऐतिहासिक भूल’ में बदल दिया।

आज स्थिति यह है कि लोकसभा में इनकी संख्या इकाई के अंक तक सिमट गई है और बंगाल जैसे पुराने गढ़ों में एक-एक सीट के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

आर्थिक उदारीकरण, पहचान आधारित राजनीति का उदय और संगठनात्मक थकान ने उस कैडर आधारित ढांचे को झकझोर दिया है जो कभी इनकी सबसे बड़ी ताकत हुआ करता था।

केरलम का यह पतन भारतीय राजनीति में एक बड़े वैचारिक शून्य और वामपंथ के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्नचिह्न छोड़ गया है।

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