Thursday, September 10, 2026
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GUJARAT : गांधीनगर में निर्माणाधीन बिल्डिंग का हिस्सा गिरा, 12 लोग घायल, रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू

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गुजरात की राजधानी गांधीनगर के कुडासन इलाके में बुधवार को एक बड़ा हादसा हो गया। यहां निर्माणाधीन ‘बोस्की एम्पायर’ इमारत की एक स्लैब अचानक से गिर गई। इस हादसे में 12 से ज्यादा मजदूरों के मलबे में फंसे होने की आशंका है। अब तक 11 लोगों को बाहर निकालकर गांधीनगर सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

गांधीनगर : गुजरात की राजधानी गांधीनगर से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। यहां कुडासन इलाके में बन रही इमारत का एक हिस्सा अचानक ढह गया। हादसे में 12 लोगों के घायल होने की आशंका जताई जा रही है। हादसे की सूचना मिलते ही फायर ब्रिगेड और पुलिस की टीमें मौके पर पहुंच गई हैं और राहत एवं बचाव कार्य जारी है।

कहां की है घटना?

जानकारी के अनुसार, कुडासन में एक निर्माणाधीन ‘बोस्की एम्पायर’ इमारत की दीवार गिर गई। बताया जा रहा है कि हादसे के समय साइट पर कई मजदूर काम कर रहे थे। दीवार गिरने से कई मजदूर मलबे में दब गए। स्थानीय लोगों ने तुरंत प्रशासन को इसकी सूचना दी। घटना की जानकारी मिलते ही गांधीनगर फायर ब्रिगेड की टीमें और पुलिस मौके पर पहुंची। मलबे में दबे लोगों को निकालने का काम तेजी से चल रहा है। घायलों को तुरंत गांधीनगर सिविल हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है।

हादसे में 12 लोग जख्मी

बताया जा रहा है कि इस हादसे में करीब 12 लोग घायल हुए हैं, जिन्हें सिविल हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया है। हालांकि, अभी तक किसी की जान जाने की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कुछ लोगों के अभी भी मलबे में दबे होने की आशंका है, जिसके चलते बचाव कार्य युद्धस्तर पर जारी है। घटना की गंभीरता को देखते हुए गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी भी मौके पर पहुंचे।

बचाव कार्य में तेजी लाने के निर्देश

उन्होंने घटनास्थल का जायजा लिया और अधिकारियों को बचाव कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए। साथ ही उन्होंने घायलों के समुचित इलाज के लिए अस्पताल प्रशासन को निर्देशित किया है। प्रारंभिक जांच में निर्माण कार्य में लापरवाही की आशंका जताई जा रही है, लेकिन हादसे के सही कारणों का पता जांच के बाद ही चल सकेगा। प्रशासन ने इस मामले में जांच के आदेश दे दिए हैं।

MAHARASHTRA : गरबा में मुस्लिमों की एंट्री पर बवाल क्यों? संजय राउत ने उठाए सवाल, बोले- मोहन भागवत से पूछिए

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महाराष्ट्र में नवरात्रि से पहले गरबा और डांडिया आयोजनों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। विश्व हिंदू परिषद ने आयोजकों से प्रतिभागियों की पहचान जांचने और मुसलमानों को गरबा-डांडिया में शामिल नहीं करने की बात कही है। शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने इस रुख पर सवाल उठाते हुए मोहन भागवत के हिंदू-मुस्लिम एकता वाले बयान का हवाला दिया है। आखिर वीएचपी ने ऐसे नियम क्यों बनाए और अब विवाद कितना बढ़ेगा? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं…

महाराष्ट्र में अगले महीने होने वाले नवरात्रि उत्सव से पहले गरबा और डांडिया आयोजनों को लेकर विवाद तेज हो गया है। विश्व हिंदू परिषद ने मुसलमानों को गरबा और डांडिया कार्यक्रमों से दूर रखने की बात कही है। संगठन ने आयोजकों के लिए कुछ दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। इनमें कार्यक्रम में आने वाले लोगों की पहचान जांचने और आधार कार्ड देखने जैसी बातें शामिल हैं। इस साल नवरात्रि 11 अक्तूबर से शुरू होगी।

वीएचपी ने आयोजकों से क्या करने को कहा?
विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता और संयुक्त सचिव श्रीराज नायर ने कहा कि संगठन ने नवरात्रि के दौरान गरबा-डांडिया में मुस्लिम समुदाय के लोगों की भागीदारी नहीं होने देने का फैसला किया है। उनका तर्क है कि नवरात्रि देवी की पूजा का पर्व है और इसमें धार्मिक मान्यताओं से जुड़े नियमों का पालन होना चाहिए। वीएचपी ने इसे किसी समुदाय के खिलाफ कदम नहीं, बल्कि हिंदू त्योहारों के सांस्कृतिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए एहतियाती उपाय बताया है। संगठन ने प्रतिभागियों की पहचान की जांच और माथे पर तिलक लगाने का सुझाव भी दिया है।

संजय राउत ने मोहन भागवत का जिक्र क्यों किया?
शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने वीएचपी के रुख पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों ने भी भारत की आजादी और सांस्कृतिक संघर्ष में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। राउत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के हालिया विदेश दौरे के दौरान दिए गए हिंदू-मुस्लिम संबंधों से जुड़े बयान का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि एक तरफ ऐसी बातें कही जाती हैं और दूसरी तरफ उनके संगठन से जुड़े लोग इस तरह के नियम बना रहे हैं। राउत ने कहा कि मोहन भागवत को इस मामले पर बयान देना चाहिए।

वीएचपी ने भागवत के बयान पर क्या कहा?
मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम में कहा था कि अगर कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा। उन्होंने सभी इंसानों की गरिमा और सभी रास्तों के एक ही लक्ष्य तक पहुंचने की बात कही थी। वीएचपी के श्रीराज नायर से जब उनके बयान पर प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने कहा कि संगठन इस पर टिप्पणी नहीं करेगा। हालांकि, उन्होंने सवाल उठाया कि जिन लोगों की धार्मिक मान्यताएं नवरात्रि की पूजा पद्धति से अलग हैं, उनके लिए वीएचपी अपने दिशा-निर्देशों में बदलाव क्यों करे।

विपक्ष ने वीएचपी के नियमों पर क्या सवाल उठाए?
कांग्रेस विधायक अमीन पटेल ने वीएचपी के कदम को असंवैधानिक बताया और कहा कि त्योहार सामाजिक मेल-जोल और सांप्रदायिक सद्भाव के अवसर होते हैं।
उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय के लोगों को भी सद्भावना के तहत गरबा और डांडिया कार्यक्रमों में बुलाया जाता है और दूसरी ओर ईद तथा रमजान के मौकों पर दूसरे समुदायों के लोगों को आमंत्रित किया जाता है।
एनसीपी (एसपी) के प्रवक्ता क्लाइड क्रास्टो ने भी दिशा-निर्देशों की आलोचना की और भाजपा के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार से पूछा कि क्या वह वीएचपी को कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में निर्देश देने देगी।

महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष प्यारे खान ने कहा कि हर व्यक्ति को अपने धर्म का त्योहार मनाने का अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक आयोजनों में मुसलमानों को सामूहिक रूप से बाहर करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि कई संगठन मुसलमानों को भी ऐसे कार्यक्रमों में बुलाते हैं और त्योहार लोगों को जोड़ने का काम करते हैं, बांटने का नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को कार्यक्रम में बुलाना या नहीं बुलाना आयोजक की इच्छा हो सकती है, लेकिन कोई व्यक्ति बिना बुलाए जबरन ऐसे कार्यक्रम में नहीं जाता। इस पूरे विवाद ने महाराष्ट्र में धार्मिक आयोजनों में भागीदारी, पहचान की जांच और सामाजिक सद्भाव को लेकर बहस तेज कर दी है।

NATIONAL : राजस्थान निकाय चुनाव में कस्बों ने मारी बाजी: बड़े शहर पिछड़े, 72% से ज्यादा मतदान ने बढ़ाई सियासी हलचल

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राजस्थान नगरीय निकाय चुनाव के पहले चरण में 39 जिलों के 162 नगरीय निकायों के 5,393 वार्डों में कुल 72.09 फीसदी मतदान हुआ। प्रतापगढ़ के अरनोद में सबसे ज्यादा 91.98 फीसदी और चित्तौड़गढ़ नगर परिषद में सबसे कम 61.49 फीसदी मतदान दर्ज किया गया। आंकड़ों से छोटे कस्बों में बड़े शहरों की तुलना में ज्यादा मतदान का ट्रेंड सामने आया है।

राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव के पहले चरण का मतदान बुधवार को पूरा हो गया। 39 जिलों के 162 नगरीय निकायों के 5,393 वार्डों में हुए मतदान में कुल 72.09 प्रतिशत वोटिंग दर्ज की गई। कुल 57,52,280 मतदाताओं में से 41,46,667 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। पहले चरण में पार्षद के 5,393 पदों के लिए 20,623 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। मतदान सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक हुआ।

72 फीसदी से ज्यादा रहा कुल मतदान
राज्य में कुल मतदान प्रतिशत 72.09 फीसदी रहा। यानी हर 100 मतदाताओं में करीब 72 ने वोट डाला। कुल 57.52 लाख मतदाताओं में से 41.46 लाख से ज्यादा लोगों ने मतदान किया। यह आंकड़ा बताता है कि शहरी निकाय चुनाव में मतदाताओं की भागीदारी काफी मजबूत रही।

सबसे ज्यादा मतदान प्रतापगढ़ के अरनोद में
पहले चरण में सबसे ज्यादा मतदान प्रतापगढ़ जिले की अरनोद नगर पालिका में हुआ। यहां 91.98 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाला। यानी अरनोद में मतदान राज्य के औसत से करीब 20 प्रतिशत अंक ज्यादा रहा। इसके बाद भी कई छोटी नगरपालिकाओं में मतदान 90 फीसदी के आसपास या उससे ऊपर रहा। भीलवाड़ा की बिगोद नगरपालिका में 91.49 फीसदी, धौलपुर की सैंपऊ नगरपालिका में 90.77 फीसदी और डीग की पहाड़ी नगरपालिका में 90.32 फीसदी मतदान दर्ज हुआ।

सबसे कम मतदान चित्तौड़गढ़ में
सबसे कम मतदान चित्तौड़गढ़ नगर परिषद में हुआ। यहां सिर्फ 61.49 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाला। इसके बाद भीलवाड़ा नगर निगम में 62.71 फीसदी, अलवर नगर निगम में 64.60 फीसदी और डूंगरपुर नगर परिषद में 65 फीसदी मतदान हुआ।

बड़े शहरों के मुकाबले छोटे कस्बों में ज्यादा मतदान
पहले चरण के आंकड़ों में एक स्पष्ट ट्रेंड दिखाई देता है। छोटी नगरपालिकाओं में मतदान प्रतिशत काफी ऊंचा रहा, जबकि बड़े नगर निगमों और बड़े शहरों में वोटिंग अपेक्षाकृत कम रही। उदाहरण के तौर पर अरनोद, बिगोद, सैंपऊ और पहाड़ी जैसी छोटी नगरपालिकाओं में मतदान 90 फीसदी से ऊपर रहा। वहीं, पहले चरण में शामिल बड़े नगर निगमों में अलवर में 64.60 फीसदी, भीलवाड़ा में 62.71 फीसदी और बीकानेर में 68.20 फीसदी मतदान हुआ। भरतपुर नगर निगम में मतदान 73.13 फीसदी रहा। जयपुर जिले की 18 नगर निकायों में भी मतदान का पैटर्न इसी ट्रेंड को दिखाता है। यहां औसत मतदान करीब 72.66 फीसदी रहा। कानोता में 81.37 फीसदी और बस्सी में 79.05 फीसदी तक मतदान हुआ, जबकि सांभर में 62.92 फीसदी और फुलेरा में 65.76 फीसदी मतदान दर्ज किया गया।

चुनावी तस्वीर अब ईवीएम में बंद
पहले चरण में 20,623 प्रत्याशियों का चुनावी भविष्य EVM में बंद हो गया है। अब दूसरे चरण में 11 सितंबर को मतदान होगा। दोनों चरणों के वोटों की गिनती 14 सितंबर को की जाएगी।पहले चरण के आंकड़ों से फिलहाल इतना साफ है कि शहरी राजस्थान में मतदान को लेकर कस्बाई इलाकों में ज्यादा उत्साह रहा, जबकि बड़े शहरों में मतदाता अपेक्षाकृत कम संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचे। अब 14 सितंबर को नतीजों के साथ यह भी साफ होगा कि ज्यादा मतदान वाले इलाकों का चुनावी परिणाम किस पार्टी के पक्ष में जाता है।

NATIONAL : क्या मानसून सत्र की औपचारिक समाप्ति की अधिसूचना जारी हुई? कांग्रेस ने सरकार की मंशा पर उठाए सवाल

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संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुए 27 दिन बीत चुके हैं, लेकिन सरकार ने अब तक इसका औपचारिक सत्रावसान नहीं किया है। कांग्रेस ने इस असामान्य देरी पर गंभीर सवाल उठाते हुए आशंका जताई है कि पर्दे के पीछे कुछ संदिग्ध चल रहा है? कांग्रेस का आरोप है कि सरकार परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए जुगाड़ की फिराक में है। क्या वाकई सत्र को जीवित रखकर कोई राजनीतिक रणनीति बनाई जा रही है?
संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद भी मानसून सत्र का औपचारिक सत्रावसान यानी प्रोरोगेशन न किए जाने को लेकर देश की सियासत गरमा गई है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र सरकार की मंशा पर कड़े सवाल खड़े किए हैं और आरोप लगाया है कि इस असामान्य देरी के पीछे ‘कुछ तो गड़बड़’ है।

संसद के दोनों सदन 13 अगस्त को ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिए गए थे, लेकिन करीब चार हफ्ते बीत जाने के बावजूद राष्ट्रपति की ओर से सत्र की औपचारिक समाप्ति की अधिसूचना जारी नहीं की गई है। कांग्रेस का दावा है कि सरकार परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की संदिग्ध कोशिशों में लगी हुई है।

सत्रावसान में देरी पर कांग्रेस ने क्या गंभीर सवाल उठाए?
कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने बुधवार को सरकार के इस कदम पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर संसद के दोनों सदनों के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के तीन से चार दिनों के भीतर सत्रावसान की प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है। इससे पहले साल 2015 में दोनों सदनों के स्थगित होने और सत्रावसान के बीच 28 दिनों का सबसे लंबा अंतर दर्ज किया गया था। इस बार मानसून सत्र के स्थगित हुए 27 दिन पूरे हो चुके हैं और जल्द ही यह पुराना रिकॉर्ड भी टूटने वाला है। जयराम रमेश ने आशंका जताई कि क्या सरकार पर्दे के पीछे कोई बड़ी साजिश रच रही है।

क्या दो-तिहाई बहुमत जुटाने के लिए पार्टियां तोड़ने की हो रही है कोशिश?
कांग्रेस महासचिव ने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में निश्चित रूप से कुछ बहुत ही संदिग्ध चल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार संसद में ‘सुपर-टेंटेड’ यानी दागी दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की लगातार कोशिश कर रही है। उनका कहना था कि सरकार अन्य राजनीतिक दलों को तोड़ने में जुटी हुई है, लेकिन वह अपने इस लक्ष्य से अभी बहुत दूर है और उसके पास जरूरी संख्याबल नहीं है। रमेश ने दावा किया कि चाहे जो भी हथकंडे अपनाए जाएं, सरकार परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए यह संदिग्ध दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में कभी भी कामयाब नहीं हो पाएगी।

बजट सत्र में क्यों गिरा था परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक?
इस पूरे राजनीतिक विवाद की जड़ें पिछले बजट सत्र से जुड़ी हुई हैं। बजट सत्र के दौरान 17 अप्रैल को मोदी सरकार को लोकसभा में एक बड़ा झटका लगा था। तब लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिला आरक्षण को लागू करने के उद्देश्य से लाया गया परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक निचले सदन में गिर गया था।

उस समय सदन में मतदान करने वाले कुल 528 सांसदों में से 298 सांसदों ने विधेयक के समर्थन में वोट दिया था, जबकि 230 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया था। किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जिसके लिए उस दिन सदन में कम से कम
सत्र का स्थगन… लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों को 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया गया था।
सत्रावसान में बीता समय… सदनों के स्थगन के बाद 27 दिन बीत चुके हैं और 2015 के 28 दिनों के रिकॉर्ड के करीब पहुंच चुका है।
सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया… आमतौर पर संसद की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के 3 से 4 दिनों में सत्रावसान हो जाता है।
पक्ष और विपक्ष के वोट… विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े थे, जबकि विपक्ष में 230 सदस्यों ने मतदान किया था।
बहुमत के लिए जरूरी संख्या… दो-तिहाई विशेष बहुमत हासिल करने के लिए 352 वोटों की दरकार थी, जिसमें सरकार 54 वोटों से पिछड़ गई थी।

क्या सत्र को जीवित रखकर दोबारा बिल लाने की तैयारी है?
संसदीय परंपराओं और नियमों के मुताबिक जब तक किसी सत्र का विधिवत सत्रावसान नहीं होता, तब तक तकनीकी रूप से वह सत्र जीवित माना जाता है। ऐसे में सरकार किसी भी समय बहुत कम नोटिस पर दोबारा सदन की बैठक बुला सकती है। कांग्रेस इसी तकनीकी पहलू को लेकर आशंकित है कि सरकार नए सिरे से सत्र बुलाने की औपचारिकताओं से बचने और विपक्षी दलों में सेंध लगाकर विधेयक को फिर से सदन के पटल पर रखने की फिराक में है।

NATIONAL : क्या मानसून सत्र की औपचारिक समाप्ति की अधिसूचना जारी हुई? कांग्रेस ने सरकार की मंशा पर उठाए सवाल

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संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुए 27 दिन बीत चुके हैं, लेकिन सरकार ने अब तक इसका औपचारिक सत्रावसान नहीं किया है। कांग्रेस ने इस असामान्य देरी पर गंभीर सवाल उठाते हुए आशंका जताई है कि पर्दे के पीछे कुछ संदिग्ध चल रहा है? कांग्रेस का आरोप है कि सरकार परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए जुगाड़ की फिराक में है। क्या वाकई सत्र को जीवित रखकर कोई राजनीतिक रणनीति बनाई जा रही है?
संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद भी मानसून सत्र का औपचारिक सत्रावसान यानी प्रोरोगेशन न किए जाने को लेकर देश की सियासत गरमा गई है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र सरकार की मंशा पर कड़े सवाल खड़े किए हैं और आरोप लगाया है कि इस असामान्य देरी के पीछे ‘कुछ तो गड़बड़’ है।

संसद के दोनों सदन 13 अगस्त को ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिए गए थे, लेकिन करीब चार हफ्ते बीत जाने के बावजूद राष्ट्रपति की ओर से सत्र की औपचारिक समाप्ति की अधिसूचना जारी नहीं की गई है। कांग्रेस का दावा है कि सरकार परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की संदिग्ध कोशिशों में लगी हुई है।

सत्रावसान में देरी पर कांग्रेस ने क्या गंभीर सवाल उठाए?
कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने बुधवार को सरकार के इस कदम पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर संसद के दोनों सदनों के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के तीन से चार दिनों के भीतर सत्रावसान की प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है। इससे पहले साल 2015 में दोनों सदनों के स्थगित होने और सत्रावसान के बीच 28 दिनों का सबसे लंबा अंतर दर्ज किया गया था। इस बार मानसून सत्र के स्थगित हुए 27 दिन पूरे हो चुके हैं और जल्द ही यह पुराना रिकॉर्ड भी टूटने वाला है। जयराम रमेश ने आशंका जताई कि क्या सरकार पर्दे के पीछे कोई बड़ी साजिश रच रही है।

क्या दो-तिहाई बहुमत जुटाने के लिए पार्टियां तोड़ने की हो रही है कोशिश?
कांग्रेस महासचिव ने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में निश्चित रूप से कुछ बहुत ही संदिग्ध चल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार संसद में ‘सुपर-टेंटेड’ यानी दागी दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की लगातार कोशिश कर रही है। उनका कहना था कि सरकार अन्य राजनीतिक दलों को तोड़ने में जुटी हुई है, लेकिन वह अपने इस लक्ष्य से अभी बहुत दूर है और उसके पास जरूरी संख्याबल नहीं है। रमेश ने दावा किया कि चाहे जो भी हथकंडे अपनाए जाएं, सरकार परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए यह संदिग्ध दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में कभी भी कामयाब नहीं हो पाएगी।

बजट सत्र में क्यों गिरा था परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक?
इस पूरे राजनीतिक विवाद की जड़ें पिछले बजट सत्र से जुड़ी हुई हैं। बजट सत्र के दौरान 17 अप्रैल को मोदी सरकार को लोकसभा में एक बड़ा झटका लगा था। तब लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिला आरक्षण को लागू करने के उद्देश्य से लाया गया परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक निचले सदन में गिर गया था।
उस समय सदन में मतदान करने वाले कुल 528 सांसदों में से 298 सांसदों ने विधेयक के समर्थन में वोट दिया था, जबकि 230 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया था। किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जिसके लिए उस दिन सदन में कम से कम 352 वोटों की जरूरत थी, लेकिन सरकार जरूरी आंकड़े से काफी पीछे रह गई थी।

मानसून सत्र के सत्रावसान और मतदान से जुड़े अहम आंकड़े
सत्र का स्थगन… लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों को 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया गया था।
सत्रावसान में बीता समय… सदनों के स्थगन के बाद 27 दिन बीत चुके हैं और 2015 के 28 दिनों के रिकॉर्ड के करीब पहुंच चुका है।
सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया… आमतौर पर संसद की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के 3 से 4 दिनों में सत्रावसान हो जाता है।
पक्ष और विपक्ष के वोट… विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े थे, जबकि विपक्ष में 230 सदस्यों ने मतदान किया था।
बहुमत के लिए जरूरी संख्या… दो-तिहाई विशेष बहुमत हासिल करने के लिए 352 वोटों की दरकार थी, जिसमें सरकार 54 वोटों से पिछड़ गई थी।

क्या सत्र को जीवित रखकर दोबारा बिल लाने की तैयारी है?
संसदीय परंपराओं और नियमों के मुताबिक जब तक किसी सत्र का विधिवत सत्रावसान नहीं होता, तब तक तकनीकी रूप से वह सत्र जीवित माना जाता है। ऐसे में सरकार किसी भी समय बहुत कम नोटिस पर दोबारा सदन की बैठक बुला सकती है। कांग्रेस इसी तकनीकी पहलू को लेकर आशंकित है कि सरकार नए सिरे से सत्र बुलाने की औपचारिकताओं से बचने और विपक्षी दलों में सेंध लगाकर विधेयक को फिर से सदन के पटल पर रखने की फिराक में है।

NATIONAL : बीजेपी का साथ देने की सजा भुगत रहे व्यापारी, रायबरेली में राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर साधा निशाना

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रायबरेली: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष एवं रायबरेली सांसद राहुल गांधी अपने दो दिवसीय दौरे पर मंगलवार को रायबरेली पहुंचे। इस दौरान कई स्थानों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनका ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत किया। रायबरेली पहुंचने पर राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि केंद्र की आर्थिक नीतियों का सबसे ज्यादा असर छोटे और मध्यम कारोबारियों पर पड़ा है।

ने प्रधानमंत्री की हालिया आभूषण न खरीदने संबंधी अपील को गैरजरूरी बताते हुए कहा कि मंदी और महंगाई से जूझ रहे व्यापारियों के लिए ऐसे बयानों से चिंता और बढ़ती है। उन्होंने कहा कि लंबे समय से बीजेपी का समर्थन करने वाला व्यापारी वर्ग आज उसकी नीतियों से परेशान है और एक तरह से बीजेपी का साथ देने की सजा भुगत रहा है।

पहुंचे राहुल गांधी ने शहर और आसपास के इलाकों में विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात की। प्रभु टाउन में सर्राफा व्यापारी फाना त्रिवेदी के आवास पर हुई बैठक में व्यापारियों ने सोना-चांदी के कारोबार में आई गिरावट, महंगाई और बाजार में घटती क्रयशक्ति का मुद्दा उठाया। समस्याएं सुनने के साथ ही राहुल ने कहा कि कांग्रेस उनकी आवाज सड़क से संसद तक उठाएगी।

केमिस्ट असोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल से मिले राहुल
वहीं, भुएमऊ गेस्ट हाउस में नेता प्रतिपक्ष केमिस्ट असोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल से मिले। दवा कारोबारियों ने उनसे ऑनलाइन माध्यम से बिना चिकित्सकीय पर्चे के हो रही दवा बिक्री और इससे पारंपरिक दवा कारोबार पर पड़ रहे असर की शिकायत की।

NATIONAL : राहुल गांधी के सवाल पर सांसद और योगी के मंत्री में नोकझोंक, जमकर चले तीखे शब्द बाण; ऐसे सुलझा मामला

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दिशा की बैठक के दौरान राहुल गांधी के सवाल पर सांसद और मंत्री में नोकझोंक हो गई। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ योजना के बजट को लेकर मंत्री ने कहा कि सांसद को जानकारी ही नहीं है।यूपी के रायबरेली में बुधवार को कलेक्ट्रेट स्थित बचत भवन में दिशा की बैठक हुई। इसमें ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ योजना के बजट को लेकर सवाल-जवाब के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक हो गई।

राहुल गांधी ने योजना पर तंज कसते हुए कहा कि इसका प्रचार बहुत है, लेकिन जमीन पर इसका असर दिखाई नहीं देता। उन्होंने जिले को मिले बजट की जानकारी मांगी। अधिकारियों ने बताया कि योजना के तहत 30 लाख रुपये मिले हैं। इसमें 10 प्रतिशत राशि प्रचार पर खर्च होती है। इस पर राहुल ने सवाल उठाया।

किसी भी योजना के बारे में सवाल पूछने का अधिकार
राहुल के सवालों के बीच प्रदेश के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह बोल पड़े कि यह आश्चर्य की बात है कि सांसद को केंद्रीय योजना के बारे में जानकारी नहीं है। इस पर अमेठी सांसद किशोरी लाल शर्मा ने आपत्ति जताते हुए कहा कि सांसद को किसी भी योजना के बारे में सवाल पूछने का अधिकार है।

इसके बाद दोनों ओर से तीखे शब्द बाण चले। मामला बढ़ता देख राहुल गांधी ने हस्तक्षेप किया और दोनों को शांत कराया। उन्होंने मंत्री से कहा कि उनसे समझने में भूल हुई है। इसके बाद दिशा की बैठक की कार्यवाही आगे बढ़ी।

उधर, दिशा की बैठक शुरू होने से पहले सपा विधायकों ने पोस्टर-बैनर लहराकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। बछरावां विधायक श्याम सुंदर भारती और हरचंदपुर विधायक राहुल लोधी की पुलिस से नोकझोंक भी हुई। मामला बढ़ता देख एएसपी आलोक सिंह ने पोस्टर-बैनर लेकर विधायकों से उन्हें छीन लिया। सपा विधायकों ने कहा कि जब समस्याएं जस की तस हैं तो दिशा बैठक का क्या औचित्य है। बछरावां विधायक ने कहा कि गुंडे-माफियाओं को सत्ता का संरक्षण है।

NATIONAL : दिल्ली के सत्य निकेतन में पीजी इमारत गिरने से 6 की मौत, रेस्क्यू ऑपरेशन जारी

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दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पीजी इमारत गिरने से 6 लोगों की मौत हो गई। दिल्ली यूनिवर्सिटी साउथ कैंपस के पास हुए हादसे में रेस्क्यू जारी, सीएम ने मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए।

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में एक इमारत गिरने से छह लोगों की मौत हो गई। ये इलाका दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास है, जहां बहुत सारे छात्र रहते हैं। इमारत पीजी यानी पेइंग गेस्ट अकॉमडेशन के रूप में इस्तेमाल हो रही थी। हादसा रविवार दोपहर को हुआ। रात के ऑपरेशन के दौरान एक और शव मिला, जिससे मौतों की संख्या छह हो गई। रेस्क्यू टीमें अभी भी मलबा हटा रही हैं और फंसे हुए लोगों को खोज रही हैं।

रेस्क्यू ऑपरेशन जारी
एनडीआरएफ, दिल्ली फायर सर्विस, दिल्ली पुलिस और दूसरी एजेंसियों की टीमें मौके पर काम कर रही हैं। भारी मलबा हटाने का काम चल रहा है। हादसे ने पीजी इमारतों की सुरक्षा और निर्माण तथा फायर सेफ्टी नियमों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ये इलाका घनी आबादी वाला है।

सरकार की कार्रवाई
दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री कार्यालय ने बताया कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मौके पर जाकर समीक्षा के बाद मजिस्ट्रेट जांच का आदेश दिया है। इमारत के मालिक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का भी निर्देश दिया गया है। सीएमओ के मुताबिक जिम्मेदार लोगों को पूरी तरह जवाबदेह ठहराया जाएगा और कानून के सख्त प्रावधानों के तहत कार्रवाई होगी।

अवैध इमारतों को सील करने का आदेश
दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) ने चार या उससे ज्यादा मंजिल वाली सभी अवैध इमारतों को तुरंत सील करने का आदेश दिया है। दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और तत्काल बर्खास्तगी की चेतावनी भी दी गई है। ये आदेश तुरंत लागू होंगे।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
कांग्रेस नेता और एआईसीसी उत्तराखंड प्रभारी कुमारी शैलजा ने छात्र सुरक्षा पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि बच्चे भविष्य बनाने की उम्मीद लेकर दिल्ली आते हैं, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है। उन्होंने कोचिंग सेंटर की पुरानी घटना का भी जिक्र किया। पूर्व दिल्ली मुख्य सचिव उमेश सैगल ने कहा कि ये अकेला मामला नहीं है। दिल्ली के कुछ इलाकों में हर पांच में से एक इमारत अनधिकृत है। या तो ब्लूप्रिंट मंजूर नहीं होते, या बाद में मंजिलें बढ़ा दी जाती हैं, या निर्माण कमजोर होता है। उन्होंने भीड़भाड़ वाले इलाकों में नई निर्माण मंजूरी रोकने की बात कही।

एनएसयूआई अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने स्थिति को गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि रेस्क्यू जारी है और कई छात्र बाहर निकाले गए तो मृत पाए गए। उन्होंने तीन छात्रों को बचाने का दावा किया और समय पर मदद न पहुंचने की बात कही। दिल्ली भाजपा युवा मोर्चा अध्यक्ष रजत चौधरी ने कहा कि स्थिति गंभीर है। एंबुलेंस और डॉक्टर पर्याप्त संख्या में हैं। उन्होंने जल्दी रेस्क्यू की अपील की और पार्टियों से राजनीति न करने को कहा। उन्होंने प्रभावित परिवारों और रेस्क्यू टीमों के साथ खड़े होने की बात कही।

WORLD : राजनाथ सिंह की श्रीलंका यात्रा: हिंद महासागर साझेदारी को मजबूत करने की बड़ी तैयारी

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राजनाथ सिंह का कोलंबो दौरा भारत-श्रीलंका के रक्षा संबंधों में एक नए दौर की शुरुआत करेगा, जिसमें समुद्री सुरक्षा और हिंद महासागर मुख्य मुद्दा होगा.

नई दिल्लीः रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की आगामी श्रीलंका यात्रा उनके रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण दक्षिणी पड़ोसी के साथ भारत के जुड़ाव में एक ऐतिहासिक पल है, क्योंकि दशकों में किसी भारतीय रक्षा मंत्री की इस द्वीप राष्ट्र की यह पहली आधिकारिक यात्रा है. यह यात्रा सिर्फ एक औपचारिक उच्च-स्तरीय मुलाकात से कहीं बढ़कर है.

8 से 10 सितंबर तक होने वाला यह दौरा हिंद महासागर में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच दोनों देशों के रिश्तों में रक्षा और समुद्री सुरक्षा को मुख्य केंद्र में रखने के नई दिल्ली के इरादे को दर्शाता है. रविवार को रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, इस यात्रा के दौरान राजनाथ सिंह श्रीलंका के शीर्ष नेतृत्व के साथ कई अहम मुद्दों पर चर्चा करेंगे. कोलंबो में भारतीय प्रवासियों से भी बातचीत करेंगे. राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे.

भारत और श्रीलंका के बीच गहरे सभ्यतागत संबंध और एक बहुआयामी साझेदारी है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा, रक्षा, आर्थिक व व्यापार सहयोग और मजबूत जन-संबंधों पर आधारित है. दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को तब और गति मिली जब भारत ने आर्थिक संकट के दौरान श्रीलंका की मदद की और 2025 में श्रीलंका में आए चक्रवात डिटवा के बाद सबसे पहले मदद पहुंचाने वाले देशों में से एक रहा. इसने ‘पड़ोसी पहले’ की नीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘महासागर’ (MAHASAGAR – क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास के लिए आपसी और समग्र प्रगति) के दृष्टिकोण के प्रति भारत की निरंतर प्रतिबद्धता को रेखांकित किया.

मंत्रालय ने कहा कि सिंह की श्रीलंका यात्रा “एक मजबूत समुद्री और रक्षा साझेदारी सहित पारस्परिक रूप से लाभकारी क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से मजबूत और मैत्रीपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करेगी.”

इस यात्रा का समय विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है. श्रीलंका हिंद महासागर में कुछ सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के बीच एक बेहद अहम स्थान पर है, जबकि भारत अपनी ‘पड़ोसी पहले’ की नीति और मोदी के ‘महासागर’ (MAHASAGAR) दृष्टिकोण के तहत पूरे क्षेत्र में सुरक्षा साझेदारियों के अपने नेटवर्क को मजबूत करना चाहता है. इसलिए, सिंह की यह यात्रा ऐसे समय पर हो रही है जब भारत की समुद्री सुरक्षा के लिहाज से श्रीलंका का रणनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है.

दशकों में किसी भी भारतीय रक्षा मंत्री ने श्रीलंका का दौरा नहीं किया है. श्रीलंका के गृहयुद्ध के अंतिम वर्षों के दौरान, जब द्वीप पर हो रहे घटनाक्रमों से भारत के सुरक्षा और राजनीतिक हित सीधे जुड़े थे, तब 2008 में तत्कालीन रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी की यात्रा पर विचार किए जाने की खबर थी. हालांकि, एंटनी ने श्रीलंका की यात्रा नहीं की थी. इसके बजाय, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, विदेश सचिव और रक्षा सचिव ने कोलंबो का दौरा किया था.

इसलिए, राजनाथ सिंह की यह यात्रा एक लंबे अंतराल के बाद रक्षा-मंत्री स्तर के राजनीतिक जुड़ाव की बहाली को दर्शाती है. यह भी ध्यान देने योग्य है कि सिंह सितंबर 2023 में श्रीलंका की यात्रा पर जाने वाले थे, लेकिन बाद में उस यात्रा को स्थगित कर दिया गया था.

जब श्रीलंका ईंधन, भोजन, दवाओं और विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रहा था, तब भारत ने उसे बड़े पैमाने पर आर्थिक और मानवीय सहायता प्रदान की थी. उस सहायता ने नई दिल्ली के प्रति एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सद्भावना स्थापित करने में मदद की और अपने निकटतम पड़ोस में सबसे पहले मदद पहुंचाने वाले देश के रूप में भारत की छवि को और मजबूत किया.

इसके बाद दोनों देशों के संबंधों को एक मजबूत रणनीतिक आयाम मिला. रक्षा और समुद्री सहयोग द्विपक्षीय संबंधों के महत्वपूर्ण हिस्से बन गए हैं, जिसमें भारत प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण, समुद्री क्षेत्र की जागरूकता, सैन्य अभ्यास, उपकरण और संस्थागत आदान-प्रदान पर ध्यान केंद्रित कर रहा है.

राजनाथ सिंह की चर्चाओं में शामिल होने वाले सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक अप्रैल 2025 में श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके की भारत यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित भारत-श्रीलंका रक्षा सहयोग समझौता ज्ञापन (MoU) का कार्यान्वयन होने की संभावना है.

यह समझौता दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए एक व्यापक संस्थागत ढांचा प्रदान करता है. इसका महत्व द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को व्यक्तिगत अभ्यासों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और उपकरण सहायता से आगे बढ़ाकर एक अधिक संरचित साझेदारी की ओर ले जाने में है.

दोनों दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के बीच रक्षा बलों के प्रमुखों के दौरों के माध्यम से उच्च स्तरीय रक्षा जुड़ाव नियमित रहा है. इसके अलावा, द्विपक्षीय रक्षा सहयोग की समीक्षा करने और उसे गति देने के लिए हर साल रक्षा सचिवों के बीच एक वार्षिक रक्षा वार्ता आयोजित की जाती है.

भारत से श्रीलंका के लिए लगातार नौसैनिक बातचीत और जहाजों व पनडुब्बियों के दौरे होते रहे हैं. बहुपक्षीय अभ्यासों के अलावा, द्विपक्षीय अभ्यास स्लिनेक्स (SLINEX – नौसेना अभ्यास) और मित्र शक्ति (MITRA SHAKTI – थलसेना अभ्यास) हर साल बारी-बारी से भारत और श्रीलंका में आयोजित किए जाते हैं.

क्षमता निर्माण (कैपेसिटी बिल्डिंग) के मामले में, 6 मिलियन डॉलर की अनुदान सहायता से स्थापित समुद्री बचाव समन्वय केंद्र को जून 2024 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की श्रीलंका यात्रा के दौरान शुरू किया गया था.

आतंकवाद विरोधी और अन्य संबंधित क्षेत्रों में सुरक्षा सहयोग भी दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों का एक महत्वपूर्ण पहलू है. कोलंबो सुरक्षा कॉन्क्लेव, जो हाल के समय में क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों से निपटने के लिए एक प्रमुख मंच के रूप में उभरा है, अगस्त 2024 में इसके संस्थापक दस्तावेजों पर हस्ताक्षर होने से और मजबूत हुआ.

श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति उसे भारत की हिंद महासागर रणनीति में एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण स्थान देती है. यह द्वीप प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के करीब है और भारत की दक्षिणी तटरेखा के पास स्थित है. इसलिए, श्रीलंका के समुद्री बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों, निगरानी क्षमताओं या बाहरी सुरक्षा साझेदारियों को प्रभावित करने वाले किसी भी घटनाक्रम का भारत के रणनीतिक माहौल पर सीधा असर पड़ता है.

नई दिल्ली के लिए, अपने आसपास के पानी की निगरानी करने की श्रीलंका की क्षमता को मजबूत करने से कई उद्देश्य पूरे होते हैं. जैसे, मादक पदार्थों (ड्रग्स) की तस्करी और अवैध मछली पकड़ने का मुकाबला करना, समुद्री आपात स्थितियों का जवाब देना, निगरानी में सुधार करना और उत्तरी हिंद महासागर की समग्र सुरक्षा को मजबूत करना.

भारत पहले ही समुद्री सुरक्षा क्षमताएं बनाने में श्रीलंका की मदद कर चुका है. दोनों देशों ने अपनी नौसेनाओं और अन्य समुद्री सुरक्षा एजेंसियों के बीच भी सहयोग विकसित किया है.

इस यात्रा के भू-राजनीतिक महत्व को हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी से अलग करके नहीं देखा जा सकता. श्रीलंका के रणनीतिक बंदरगाहों और उसकी भौगोलिक स्थिति ने चीन के बड़े आर्थिक और बुनियादी ढांचे के जुड़ाव को आकर्षित किया है. भारत के लिए, यह बात इस द्वीप को हिंद महासागर में प्रभाव और रणनीतिक पहुंच बनाने की व्यापक प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है.

हालांकि, नई दिल्ली का दृष्टिकोण तेजी से इस बात पर केंद्रित रहा है कि वह कोलंबो के साथ अपने संबंधों को भारत और चीन के बीच किसी एक को चुनने वाले विकल्प के रूप में पेश करने से बचे. इसके बजाय, भारत ने क्षमताएं, प्रशिक्षण, मानवीय सहायता और समुद्री सुरक्षा सहयोग प्रदान करके श्रीलंका के मुख्य सुरक्षा भागीदार के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास किया है.

राजनाथ सिंह की आगामी यात्रा इसी दृष्टिकोण के बिल्कुल अनुकूल है. इसका उद्देश्य श्रीलंका से यह मांग करने के बजाय कि वह किसी अन्य शक्ति के मुकाबले भारत को चुने, इस बात को सुनिश्चित करना अधिक है कि श्रीलंका के सुरक्षा ढांचे के लिए भारत हमेशा अपरिहार्य बना रहे.

श्रीलंकाई मीडिया ने रविवार को रिपोर्ट दी कि सिंह की यात्रा के दौरान रक्षा से जुड़े तीन नए समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है. ‘संडे टाइम्स’ न्यूज वेबसाइट की एक रिपोर्ट के अनुसार, इनके तहत भारतीय एयर-डिफेंस गन, दोनों देशों के कैडेट कोर के बीच बेहतर संबंध और श्रीलंका डिफेंस कॉलेज व भारतीय रक्षा संस्थानों के बीच अधिक सहयोग को शामिल किया जाएगा.

रक्षा मंत्रालय द्वारा ‘महासागर’ (MAHASAGAR) का स्पष्ट रूप से जिक्र किया जाना बेहद महत्वपूर्ण है. यह अवधारणा समुद्री सुरक्षा को आर्थिक विकास, कनेक्टिविटी, क्षमता निर्माण और मानवीय सहायता से जोड़ने के भारत के प्रयास को दर्शाती है. श्रीलंका इस दृष्टिकोण के लिए एक स्वाभाविक भागीदार है क्योंकि वहां भारत के हित पारंपरिक रक्षा सहयोग से कहीं आगे तक फैले हुए हैं.

बंदरगाह, शिपिंग, ऊर्जा सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, मत्स्य पालन, कनेक्टिविटी और समुद्री निगरानी इस रिश्ते के आपस में जुड़े हुए तत्व हैं. इसलिए, राजनाथ सिंह की इस यात्रा को अपने निकटतम समुद्री पड़ोस में ‘महासागर’ दृष्टिकोण को अधिक रणनीतिक और संस्थागत मजबूती देने के भारत के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है.

लिहाजा, राजनाथ सिंह की इस यात्रा का वास्तविक महत्व केवल रक्षा-मंत्री स्तर के जुड़ाव में दशकों पुराने अंतराल को समाप्त करने में नहीं है, बल्कि इस बात में है कि कोलंबो की यह वापसी क्या दर्शाती है: एक अधिक संस्थागत, समुद्री-केंद्रित और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भारत-श्रीलंका रक्षा साझेदारी का उभरना.

BUSINESS : रेलवे के 8 मल्टी-ट्रैकिंग प्रोजेक्ट्स को मंजूरी:₹20 हजार करोड़ से 9 राज्यों में 1200km नई रेल लाइनें बिछेंगी; एक करोड़ लोगों को फायदा

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पीएम मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को कैबिनेट मीटिंग हुई। इसमें रेलवे के आठ मल्टी ट्रैकिंग प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई। इन परियोजनाओं पर कुल ₹20 हजार करोड़ खर्च होंगे।इन प्रोजेक्ट्स के तहत से पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना के 20 जिलों में करीब 1,200km रेल लाइनें बढ़ाई जाएंगीं। इससे 6,900 गांवों के एक करोड़ लोगों को बेहतर रेल कनेक्टिविटी मिलने की उम्मीद है।

27 मिलियन टन अतिरिक्त माल ढुलाई होगी

इन परियोजनाओं से हर साल करीब 27 मिलियन टन अतिरिक्त माल ढुलाई की क्षमता विकसित होगी। इससे उद्योगों तक कच्चा माल पहुंचाने और तैयार माल को बाजार तक ले जाने में मदद मिलेगी। साथ ही, माल परिवहन की लागत कम करने में भी फायदा हो सकता है।

तेल आयात और कार्बन उत्सर्जन घटेगा

सरकार ने रेलवे को पर्यावरण के लिहाज से बेहतर और ऊर्जा-कुशल परिवहन माध्यम बताया है। नई रेल लाइनों से माल और यात्रियों के परिवहन में रेलवे की हिस्सेदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी।

सरकार के अनुमान के अनुसार, इन परियोजनाओं से हर साल करीब 12 करोड़ लीटर तेल की बचत हो सकती है। इसके अलावा 62 करोड़ किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम होने का अनुमान है।

सरकार ने इस कमी को करीब 2.48 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर बताया है। इससे देश के जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने और लॉजिस्टिक्स लागत कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

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