जगन्नाथ मंदिर के भीतरी रत्न भंडार को 48 साल में पहली बार खोला गया है. इसके अंदर मौजूद सोने-चांदी और हीरे जैसी मूल्यवान धातुओं को गिना जा रहा है. इस मंदिर परिसर में कई और खुफिया चैम्बर होने का दावा भी किया जाता है जिसमें बड़ा खजाना छिपा हो सकता है.
ओडिशा के पुरी स्थितजगन्नाथ मंदिर में 48 साल बाद भीतरी रत्न भंडार खोला गया है. इसके साथ ही अंदर मौजूद बहुमूल्य आभूषणों को गिनने का काम किया जा रहा है. ऐसा कहा जाता है कि इस रत्न भंडार में सोने-चांदी का अथाह भंडार है. मंदिर के प्रांगण में आज भी ऐसे न जाने कितने खुफिया चैम्बर मौजूद हैं जहां खजाना होने का दावा किया जाता है. साथ ही, मंदिर में एक खुफिया सुरंग का जिक्र भी पुजारियों के वंशज करते हैं. आइए जानते हैं कि आखिर इस सुरंग का राज क्या है और यहां जिस खजाने का दावा किया जाता है, वो कैसे सदियों से सुरक्षित है.
बात साल 2018 की है. जब कुछ लोग अंधेरे रास्ते से होते हुए एक खुफिया तहखाने तक पहुंचे थे. इस गुप्त तहखाने का दरवाजा कई दशकों से खोला नहीं गया था. इसी दरवाजे के पीछे प्राचीन खजाने का भंडार बताया जाता है. उस वक्त दरवाजा तो मिला, लेकिन चाबी नहीं मिल सकी. उस दिन शुरू हुई वो तलाश साल जुलाई 2024 में पूरी हुई. जब उस खुफिया चैम्बर का दरवाजा खोल दिया गया. हालांकि उस वक्त भी मंदिर के रत्न भंडार का अंदरूनी चैम्बर तो खुल गया, लेकिन उसके अंदर से क्या निकला, इस पर आज तक सस्पेंस बना हुआ है.

सदियों से जिन परिवारों की पीढ़ियां जगन्नाथ मंदिर में सेवा पूजा करती आई हैं. उनके सदस्य मंदिर के खजाने को लेकर हैरान करने वाली बातें बताते हैं. जगन्नाथ मंदिर के पुजारी बासुदेव इस रहस्यमयी खजाने का श्रेय कुछ पुराने राजाओं को देते हैं. वही राजा अपना जीता हुआ सामान इस रत्न भंडार में रखते थे. सोने-चांदी के मुकुट, सिंहासन, हीरे, जेवरात आदि सब इसी में रखे जाते थे.
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि जगन्नाथ मंदिर के खजाने में इतनी प्रचुर मात्रा में सोना-चांदी और बहुमूल्य रत्न मौजूद थे कि हर 100 साल में एक बार होने वाले रघुनाथ श्रृंगार में पूरी झांकी सोने और रत्नों से पट जाती थी. शायद इसी सोने और रत्नों की चमक विदेशी आक्रांताओं को बार-बार पूरी की ओर खींच लाती थी.
इतिहास में जिक्र मिलता है कि जिस तरह सोमनाथ मंदिर को विदेशी आक्रमणकारियों ने 17 बार लूटा था. ठीक उसी तरह जगन्नाथ मंदिर को लूटने का प्रयास भी 18 बार किया गया था. हर बार मंदिर के प्रतिहारियों ने ही ठाकुर जी की प्रतिमा को उन आक्रमणकारियों से बचाया था. जब-जब आक्रमण होता था तब-तब प्रतिहारी प्रतिमा को लेकर किसी अज्ञात स्थान पर छिप जाते थे और ठाकुर जी के स्वरूप को सुरक्षित रखते थे. उन्हीं प्रतिहारियों के वंशज बताते हैं कि ठाकुर जी की प्रतिमा को लेकर उनके पूर्वज मंदिर के भीतर बनी गुप्त सुरंग में चले जाते थे. कहते हैं कि उस सुरंग में आज भी अथाह संपदा मौजूद है.
जगन्नाथ मंदिर के पुजारी पंडित सोमनाथ इस बात को दोहराते हैं कि मंदिर पर 18 बार आक्रमण हुआ. उन्होंने बताया कि भारत का सबसे बड़ा और धनी मंदिर है.
बता दें कि जगन्नाथ मंदिर में भगवान की इन मूर्तियों को हर 12 साल में एक बार बदलने की परंपरा भी है. जब मूर्तियां बदली जाती हैं तो उस दौरान मंदिर को बंद कर दिया जाता है. शहर की लाइट काट दी जाती है. पुजारी आंखों पर पट्टी बांधकर यह काम करते हैं. पुजारी बताते हैं कि उस दौरान रत्न भंडार से कई रहस्यमयी आवाजें सुनाई देती हैं.
पुजारी बासुदेव कहते हैं कि हमने इससे जुड़ी कई कहानियां सुनी हैं. उसके अंदर सांपों का गर्जन सुनाई देता है. वहां एक अन्न की हांडी भी रखी जाती है. आज तक पता नहीं चल पाया कि उसे कौन खा जाता है. हम लोग 15 दिन अनवसर में रत्न भंडार के सामने ही काम करते हैं. तब जगन्नाथ जी की लाइट भी काट दी जाती है. घना अंधेरा रहता है. तब बहुत सारी आवाजें सुनाई देती हैं.
भगवान जगन्नाथ के वर्तमान मंदिर का स्वरूप सातवीं शताब्दी का बताया जाता है. सदियों से इस दिव्य मंदिर का अपना एक कठिन अनुशासन है. परंपराएं हैं और उससे बढ़कर ऐसे तमाम रहस्य हैं जो दुनिया के लिए सदा से कौतूहल का विषय रहे हैं. लेकिन दुनिया भर के भक्त पूरी आस्था के साथ मंदिर से जुड़ी परंपराओं और रहस्यों का सम्मान करते हैं.




