Thursday, April 16, 2026
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NATIONAL : बकाया DA का भुगतान, महिला-युवा को 3000 रुपये प्रति माह… बंगाल के लिए BJP ने जारी किया ‘भरोसा पत्र’

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भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए आज अपने चुनावी वादों का पिटारा खोल दिया है. गृह मंत्री अमित शाह ने बंगाल चुनाव के लिए पार्टी का चुनावी घोषणापत्र जारी कर दिया है. बीजेपी अपने चुनावी घोषणापत्र को संकल्प पत्र का नाम देती आई है, लेकिन इस बार पार्टी ने नाम का ये ट्रेंड भी बदला है. बीजेपी ने पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र को भरोसा पत्र नाम दिया है.

चुनाव घोषणापत्र का नाम भरोसा पत्र दिए जाने को बंगाल की चुनावी लड़ाई भय बनाम भरोसा बनाने की कोशिश से जोड़कर देखा जा रहा है. बीजेपी का यह भरोसा पत्र तीन बड़े वोट बैंक के इर्द-गिर्द तैयार किया गया है. बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में महिला वोट बैंक के साथ ही सरकारी कर्मचारी और युवाओं पर फोकस किया है. बीजेपी ने सरकारी कर्मचारियों के लिए बकाया डीए भुगतान के साथ ही सरकार बनने के 45 दिन में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने का वादा किया है.

बीजेपी ने भरोसा पत्र में वादा किया है कि सरकार बनी, तो 45 दिन के भीतर महंगाई भत्ते का सारा बकाया चुका दिया जाएगा. महिलाओं के लिए ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार की लक्ष्मी भंडार योजना की काट के लिए बीजेपी ने हर महीने तीन हजार रुपये देने का वादा किया है. पार्टी ने युवाओं के लिए युवा साथी योजना का वादा किया है. बीजेपी ने वादा किया है कि सरकार बनी तो युवाओं को तीन हजार रुपये मासिक वजीफा दिया जाएगा.

गौरतलब है कि गृह मंत्री अमित शाह ने करीब हफ्तेभर पहले ही पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ चार्जशीट जारी किया था. इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार के कार्यकाल को भय का कार्यकाल बताया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक दिन पहले ही पश्चिम बंगाल के हल्दिया में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए छह गारंटी दी थी. पीएम की पहली गारंटी पश्चिम बंगाल में कानून का भरोसा कायम करने की थी.

NATIONAL : कर्नाटक के लिए पीएम मोदी के 9 संकल्प, सिद्धारमैया ने बेंगलुरु में गर्मजोशी से किया स्वागत

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को कर्नाटक के मांड्या में श्री गुरु भैरवैय्या मंदिर का भव्य उद्घाटन किया. इस अवसर पर उन्होंने जल संरक्षण से लेकर योग और फिटनेस तक, जनता से नौ विशेष संकल्प लेने की अपील की. पीएम ने पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के साथ एक विशेष पुस्तक का विमोचन भी किया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को कर्नाटक के मांड्या में आदिचुनचनगिरी मठ के गुरु भैरवैय्या मंदिर का उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बेंगलुरु एयरपोर्ट पहुंचे, जहां कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने उनका जोरदार स्वागत किया. इस दौरान पीएण मोदी ने मुख्यमंत्री से बातचीत की, जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं.

इन तस्वीरों में पीएम मोदी को कांग्रेस नेता और सीएम के कान में कुछ कहते हुए देखा जा सकता है. समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान सिद्धारमैया ने एक पत्र लिखकर राज्य में लंबे वक्त से लंबित कम से कम 18 परियोजनाओं की और ध्यन आकर्षित किया, जिनमें रेलवे, जन जीवन मिशन, ग्राम पंचायतों को अनुदान, नेशनल हाईवे को सही करने जैसी मांगे शामिल हैं. मुख्यमंत्री ने केंद्र से इन सभी परियोजनाओं पर तत्काल मदद मांगी है.

मेमोरेंड के अनुसार, सिद्धारमैया ने प्रधानमंत्री ने से कोलार में रेलवे कोच फैक्ट्री का निर्माण, मैसूर तक हाई-स्पीड रेल का विस्तार, बेंगलुरु सबअर्बन रेल के लिए फंड जारी करना, बेंगलुरु-मुंबई हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर का शुभारंभ, जल जीवन मिशन (JJM), ग्राम पंचायतों को 15वें वित्त आयोग के अनुदान, राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं को मंजूरी और उन्नयन, राजस्व घाटे के अनुदान, बेंगलुरु के लिए विशेष अनुदान, मेकेदातु पीने के पानी की परियोजना का शीघ्र मूल्यांकन और मंजूरी, KWDT-II अवॉर्ड की गजट नोटिफिकेशन और अपर कृष्णा परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करना, महादयी परियोजना के अंतर्गत कलसा नाला डायवर्सन प्रोजेक्ट को वन्यजीव मंजूरी, नदियों के इंटर-लिंकिंग (ILR) योजनाओं में कर्नाटक का उचित हिस्सा, कर्नाटक की 56 प्रतिशत आरक्षण नीति को नौवीं अनुसूची में शामिल करना, कुछ पिछड़े वर्गों को अनुसूचित जनजाति (ST) की केंद्रीय सूची में शामिल करना, शरावती पंप्ड स्टोरेज परियोजना (2000 मेगावाट) और रायचूर में AIIMS की स्थापना की मांग की है.

इसके बाद उन्होंने मांड्या पहुंचकर आदिचुंचनगिरी महासंस्थान मठ के श्री गुरु भैरवैय्या मंदिर का उद्घाटन किया और एक जनसभा को संबोधित किया. पीएम ने जनसभा को संबोधित करते हुए लोगों से नौ सामूहिक संकल्प लेने की अपील की. पीएम ने कहा कि इन संकल्पों को अपनाकर हम तेजी से विकसित कर्नाटक और विकसित भारत की ओर बढ़ सकते हैं.

उन्होंने पहली प्राथमिकता जल संरक्षण और बेहतर जल प्रबंधन को दी. इसके बाद ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत पौधारोपण, सार्वजनिक और धार्मिक स्थलों पर स्वच्छता, स्थानीय उत्पादों के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ को मजबूत करने, घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने, रसायन मुक्त प्राकृतिक खेती अपनाने, मिलेट्स (मोटा अनाज) के जरिए स्वस्थ खानपान और योग-फिटनेस को अपनाने का आह्वान किया. पीएम ने कहा कि इन नौ संकल्पों पर ईमानदारी से चलकर हम तेजी से प्रगति कर सकते हैं.

बता दें कि श्री गुरु भैरवैय्या मंदिर का निर्माण द्रविड़ वास्तुकला शैली में किया गया है जो भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा. ये मंदिर प्रतिष्ठित वोक्कालिगा समुदाय द्वारा पूजनीय दिवंगत द्रष्टा को एक श्रद्धांजलि है. इस खास मौके पर पीएम मोदी और जद (एस) संरक्षक एचडी देवेगौड़ा ने संयुक्त रूप से ‘सौंदर्य लहरी और शिव महिम्न स्तोत्रम’ नामक पुस्तक का विमोचन भी किया. मंदिर के उद्घाटन से पहले पीएम ने ज्वाला पीठ के दर्शन किए, जहां पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने तपस्या की थी.

NATIONAL : महाराष्ट्र में 1 मई से ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी अनिवार्य, वरना रद्द होगा लाइसेंस

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महाराष्ट्र में रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए एक बड़ा और सख्त नियम लागू होने जा रहा है। आगामी 1 मई यानी ‘महाराष्ट्र दिवस’ (Maharashtra Day) से सभी लाइसेंसधारी रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए स्थानीय भाषा ‘मराठी’ का ज्ञान होना अनिवार्य कर दिया गया है। राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने दो टूक चेतावनी दी है कि जिन चालकों को मराठी पढ़नी और लिखनी नहीं आती, उनके लाइसेंस तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिए जाएंगे।

इस नए नियम को सख्ती से लागू करने के लिए मोटर परिवहन विभाग के 59 क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय कार्यालयों के माध्यम से एक विशेष लाइसेंस जांच अभियान चलाया जाएगा। इस अभियान के तहत संबंधित चालकों का परीक्षण किया जाएगा कि उन्हें मराठी भाषा पढ़नी और लिखनी आती है या नहीं।

परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने स्पष्ट किया कि मोटर परिवहन विभाग के नियमों के अनुसार, रिक्शा या टैक्सी चालक को लाइसेंस देते समय स्थानीय भाषा (मराठी) का ज्ञान होना पहले से ही अनिवार्य शर्त है। इसके बावजूद, मुंबई महानगर क्षेत्र, छत्रपति संभाजीनगर और नागपुर जैसे बड़े शहरों से लगातार शिकायतें मिल रही थीं।

यात्रियों का कहना था कि कई लाइसेंसधारी चालक उनसे मराठी में संवाद नहीं कर पाते हैं और कुछ जानबूझकर मराठी बोलने से बचते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए अब प्रशासन ने सख्ती बरतने का फैसला किया है।

मंत्री सरनाईक ने कहा, “जिस प्रदेश में हम रहते हैं और अपना व्यवसाय करते हैं, वहां की भाषा सीखना हर व्यक्ति का कर्तव्य है। अपनी मातृभाषा पर गर्व करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी दूसरे राज्य में काम करते समय वहां की स्थानीय भाषा का सम्मान करना भी है।”

इस फैसले के दायरे में सिर्फ चालक ही नहीं, बल्कि अधिकारी भी आएंगे। मंत्री ने सख्त लहजे में कहा कि नियमों की अनदेखी कर बिना मराठी ज्ञान के गलत तरीके से लाइसेंस जारी करने वाले परिवहन अधिकारियों की भी जांच होगी और उन पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

NATIONAL : छत्तीसगढ़- वेदांता पावर प्लांट में बॉयलर फटा, 12 की मौत:30-40 मजदूर झुलसे, 16 की हालत गंभीर; परिजनों का हंगामा, 5-5 लाख मुआवजे की घोषणासक्ती18 घंटे पहले

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छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में वेदांता पावर प्लांट में मंगलवार दोपहर बॉयलर ब्लास्ट हो गया। हादसे में 12 मजदूरों की मौत हो गई है। ASP पंकज पटेल ने इसकी पुष्टि की है। 4 मजदूरों की मौत मौके पर ही हो गई थी। वहीं 18 घायलों को रायगढ़ के जिंदल फोर्टिस अस्पताल लाया गया, जहां 8 मजदूरों ने दम तोड़ दिया है। बाकी 10 घायलों की हालत गंभीर है। मजदूर 80% झुलस गए हैं।

घटना डभरा थाना क्षेत्र की है। हादसे में 30 से 40 मजदूर गंभीर रूप से झुलसे हैं। रायगढ़ के ही मेट्रो हॉस्पिटल में 3 घायलों का इलाज चल रहा है। 2 मजदूरों को अपेक्स हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। 6 गंभीर रूप से घायलों को बिलासपुर रेफर किया गया है।

हादसे के बाद प्लांट के बाहर मजदूरों के परिजनों ने हंगामा कर दिया। उन्होंने प्रबंधन पर कार्रवाई और मुआवजे की मांग की। कुछ मजदूर लापता हैं। परिजनों का कहना है कि प्रबंधन कोई जानकारी नहीं दे रहा है। वहीं कलेक्टर अमृत विकास तोपनो ने मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए हैं।

PMO ने मुआवजे की घोषणा की है। PMNRF से हर मृतकों के परिवार वालों को 2 लाख रुपए और घायलों को 50 हजार रुपए दिए जाएंगे। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने घटना पर दुख जताया है। उन्होंने कहा कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। साथ ही मृतकों के परिवार वालों को 5-5 लाख रुपए और घायलों को 50 हजार रुपए देने का ऐलान किया।

NATIONAL : महिला आरक्षण व परिसीमन पर संसद में टकराव के आसार; सरकार ऐतिहासिक कदम बता रही, विपक्ष पर सवाल उठा रहा

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महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच बहस शुरू हो गई है, जिसमें विपक्ष ने संघीय ढांचे और राज्यों के हितों पर असर को लेकर आपत्ति जताई है। दक्षिणी राज्यों ने परिसीमन के प्रस्ताव का विरोध करते हुए इसे राजनीतिक असंतुलन बढ़ाने वाला बताया है और कई मुख्यमंत्रियों ने संयुक्त रणनीति की बात कही है। वहीं, विपक्ष की बैठक और संसद में जरूरी बहुमत के अभाव के चलते इन विधेयकों पर सहमति बनना अभी अनिश्चित बना हुआ है।

संसद के विशेष सत्र में इस सप्ताह महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी हुई। केंद्र सरकार जहां इसे ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसके पीछे की मंशा पर सवाल उठा रहा है।

कांग्रेस ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, विधेयक का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है और इससे संसदीय लोकतंत्र को नुकसान हो सकता है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि सरकार की नीयत चालाकी भरी है। वहीं, दक्षिण भारत के कई गैर-बीजेपी मुख्यमंत्रियों ने परिसीमन के मुद्दे पर केंद्र के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने चेतावनी दी कि यदि राज्य के हितों को नुकसान पहुंचा या उत्तरी राज्यों का राजनीतिक प्रभाव बढ़ाया गया, तो तमिलनाडु में व्यापक आंदोलन होगा।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सभी दलों की बैठक बुलाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सिर्फ जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का बंटवारा करने से संघीय संतुलन बिगड़ सकता है और दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय होगा। रेड्डी ने आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, पुडुचेरी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों को भी पत्र लिखकर इस मुद्दे पर संयुक्त रणनीति बनाने का आह्वान किया है। उनका कहना है कि बिना राज्यों की सहमति के कोई भी फैसला व्यापक विरोध को जन्म देगा।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने परिसीमन के मुद्दे पर केंद्र सरकार के खिलाफ तीखा रुख अपनाते हुए बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है। एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा, यदि इस प्रक्रिया से तमिलनाडु को नुकसान हुआ या उत्तरी राज्यों की राजनीतिक शक्ति असंतुलित रूप से बढ़ाई गई, तो राज्य में व्यापक विरोध प्रदर्शन होंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि राज्य का हर परिवार सड़कों पर उतरेगा और उनके नेतृत्व में एक विशाल जनआंदोलन खड़ा किया जाएगा। यह मत सोचिए कि चुनाव के समय ध्यान कहीं और है और आप दिल्ली में चुपचाप परिसीमन कर लेंगे। अगर तमिलनाडु के साथ अन्याय हुआ, तो पूरा देश इसे महसूस करेगा। स्टालिन ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया पूरी तरह गोपनीयता में लिपटी हुई है। न तो उनकी पार्टी डीएमके और न ही किसी अन्य राजनीतिक दल या राज्य से इस पर कोई परामर्श किया गया है। उन्होंने कहा, हमें यह तक नहीं बताया गया है कि यह परिसीमन कैसे किया जाएगा।

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा सीटों के परिसीमन से दक्षिण के राज्यों को नुकसान होने की आशंका सिरे से खारिज कर दी। उन्होंने कहा, संविधान संशोधन विधेयक के तहत लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर अधिकतम 850 किए जाने से दक्षिणी राज्यों को लाभ होगा, क्योंकि निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या में आनुपातिक वृद्धि की जाएगी।

रिजिजू ने जोर देकर कहा, संविधान संशोधन विधेयक पूरी तरह से संतुलित, सुविचारित है और प्रत्येक समुदाय, क्षेत्र और राज्य की आकांक्षाओं का ध्यान रखेगा। इसलिए इसकी आलोचना की कोई गुंजाइश नहीं है। अगर कोई नीतियों और कार्यक्रमों के संदर्भ में इसकी आलोचना करता है, तो राजनीतिक क्षेत्र में यह पूरी तरह से समझ में आता है। लेकिन विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का कोई भी दल विरोध नहीं कर रहा है। मंत्री ने कहा, यह केवल सरकार का विधेयक नहीं है, बल्कि यह सभी राजनीतिक दलों और पूरे देश का किसी न किसी रूप में विधेयक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सभी दल एकजुट होकर महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य का समर्थन करेंगे।

यदि कांग्रेस ने सरकार का साथ नहीं दिया तो उसे इन विधेयकों को पारित कराना मुश्किल होगा क्योंकि नियमत: किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में मौजूद सदस्यों के दो तिहाई बहुमत की जरूरत है। सरकार के पास अपने दम पर लोकसभा या राज्यसभा, कहीं भी यह बहुमत नहीं है। लोकसभा में दो तिहाई बहुमत की संख्या 362 है जबकि एनडीए के पास कुल 292 सदस्य ही है। इसी तरह राज्यसभा में दो तिहाई का आंकड़ा 163 का है जबकि सरकार के पास 141 सदस्य ही हैं।

महिला आरक्षण विधेयक और लोकसभा-विधानसभा सीटों के परिसीमन पर विचार करने के लिए कांग्रेस समेत विपक्ष के सभी दल बुधवार को बैठक करेंगे। दक्षिण के राज्यों के विरोध को देखते हुए यह माना जा रहा है कि कांग्रेस इन बदलावों का समर्थन करने से हाथ खींच ले।

Indian Army: थिएटर कमान पर बनी सहमति, CDS अनिल चौहान बोले- ऑपरेशन तिरंगा के तहत जल्द सरकार को जाएगा प्रस्ताव

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देश के सैन्य ढांचे में बड़े बदलाव की तैयारी तेज हो गई है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अनिल चौहान ने बताया कि थिएटर कमान गठन पर तीनों सेनाओं में सहमति बन चुकी है। ‘ऑपरेशन तिरंगा’ के तहत तैयार प्रस्ताव 1-2 हफ्तों में सरकार को सौंपा जाएगा, जिससे सेना की ताकत और समन्वय और मजबूत होगा।

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने देश के सैन्य ढांचे में बड़े बदलाव को लेकर अहम जानकारी दी है। बंगलूरू में आयोजित ‘रण संवाद-2026’ कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि थिएटर कमान के गठन को लेकर तीनों सेनाओं के बीच चर्चा पूरी हो चुकी है और एक से दो सप्ताह के भीतर इसका प्रस्ताव सरकार को सौंप दिया जाएगा। जनरल चौहान ने बताया कि थिएटर कमानों के गठन की पूरी प्रक्रिया को ‘ऑपरेशन तिरंगा’ नाम दिया गया है।

उन्होंने कहा कि रिपोर्ट तैयार करने का काम अंतिम चरण में है और सेना की ओर से आवश्यक कार्य लगभग पूरा हो चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि तीनों सेनाएं इस पर सहमत हैं और आपसी चर्चा समाप्त हो चुकी है। हालांकि अधिकारियों के अनुसार, प्रस्ताव को औपचारिक रूप से सरकार तक पहुंचने में करीब दो सप्ताह का समय लग सकता है। इसके बाद इसे रक्षा मंत्री और फिर सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। सीडीएस ने कहा कि थिएटर कमान के दो प्रमुख पहलू हैं अवधारणा और कार्यान्वयन।

वर्तमान में सेना, नौसेना और वायुसेना की कुल 17 अलग-अलग कमानें हैं। थिएटर कमान का उद्देश्य इन तीनों सेनाओं की ताकत और संसाधनों को एक भौगोलिक क्षेत्र के तहत एक ही कमांडर के अधीन लाना है, ताकि युद्ध की स्थिति में एकीकृत रणनीति के तहत कार्रवाई हो सके।

आधुनिक युद्ध अब केवल जमीन या हवा तक सीमित नहीं रह गए हैं। अंतरिक्ष, साइबर और सूचना क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों के बीच अलग-अलग कमान के तहत काम करना कठिन हो गया है। एकीकृत कमान बनने से संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा, सैन्य खर्च में कमी आएगी और निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक तेज और प्रभावी होगी। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में सीडीएस पद के गठन के साथ ही थिएटर कमान की प्रक्रिया शुरू हुई थी।

NATIONAL : सम्राट का चुनावी करियर: RJD से जीता पहला चुनाव, फिर लगातार तीन हार; BJP में आने के नौ साल में ही बनेंगे CM

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बिहार को बुधवार (15 अप्रैल) को नया मुख्यमंत्री मिलेगा। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने और सीएम पद से इस्तीफा दिए जाने के बाद भाजपा विधायक दल की बैठक में सम्राट चौधरी को मंगलवार को नेता चुना गया। बिहार के डिप्टी सीएम विजय सिन्हा ने इस बैठक में उनके नाम का प्रस्ताव रखा। कुशवाहा जाति से ताल्लुक रखने वाले सम्राट चौधरी दिग्गज नेता शकुनी चौधरी के बेटे हैं।

कौन हैं सम्राट चौधरी?

16 नवंबर, 1968 में जन्मे सम्राट चौधरी बिहार के नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। सम्राट के पिता शकुनी चौधरी अलग-अलग पार्टियों से कई बार विधायक, सांसद और मंत्री रहे हैं। समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शकुनी चौधरी भी एक हैं। बिहार में कुशवाहा समाज के बड़े नेताओं में शकुनी चौधरी शुमार किए जाते हैं। अब सम्राट चौधरी अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

साल 1990 में सक्रिय राजनीति में उतरने वाले सम्राट चौधरी ने अपने करियर की शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल से की थी। हालांकि, बाद में वे जदयू से होते हुए हम और भाजपा तक आए। एक तरह से देखा जाए तो सम्राट चौधरी का चुनावी और राजनीतिक सफर बेहद उतार-चढ़ाव वाला और कई दलों से जुड़ा रहा है। आखिरकार इन बदलावों के बाद अब वे बिहार के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं।

  1. शुरुआती राजनीतिक दौर और राजद में भूमिका

उन्होंने 1990 में सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और शुरुआती दिनों में समता पार्टी से भी जुड़े रहे। मई 1999 में वे राबड़ी देवी की राजद सरकार में कृषि मंत्री बने, लेकिन कम उम्र से जुड़े विवाद के कारण उन्हें उस पद से इस्तीफा देना पड़ा।

2000: चुनाव में मिली पहली जीत
साल 2000 में हुए विधानसभा चुनाव में बिहार में बहुत कुछ बदल चुका था। राज्य की सत्ता पर काबिज पार्टी का नाम और मुख्यमंत्री भी बदल चुका था। उस दौर में बिहार के सबसे कद्दावर नेता लालू प्रसाद यादव घोटाले के आरोप में जेल आ जा रहे थे। उनकी जगह उनकी पत्नी राबड़ी देवी राज्य की सत्ता पर काबिज थीं। इन सबके बीच हुए चुनाव में परबत्ता सीट पर लालू की राजद से राकेश कुमार (सम्राट चौधरी) ने जीत दर्ज की। सम्राट चौधरी ने निर्दलीय चुनाव लड़ रहे रामानंद प्रसाद सिंह को 12,777 वोट से हरा दिया था। इस तरह वे राजद के टिकट पर जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे। हालांकि, एक बार फिर उनकी उम्र को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद उनका निर्वाचन रद्द कर दिया गया।

2004: नहीं कायम रख पाए परबत्ता की सीट

2004 में राकेश कुमार का निर्वाचन रद्द होने के बाद परबत्ता सीट पर उपचुनाव कराए गए। उप चुनाव में जदयू के रामानंद प्रसाद सिंह ने राजद के राकेश कुमार यानी सम्राट चौधरी को 11,134 वोट से हरा दिया।

2005: एक ही साल में लगातार दो हार

2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए थे। पहली बार फरवरी में और दूसरी बार अक्तूबर में राज्य की जनता ने वोट डाला। बिहार में ऐसा पहली बार हुआ था जब एक ही साल में दो बार चुनाव हुए थे। फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में जदयू के रामानंद प्रसाद सिंह ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने राजद के राकेश कुमार यानी सम्राट चौधरी को 1,918 वोट से हराया था।

इसके बाद अक्तूबर में नए सिरे से हुए चुनाव में भी परबत्ता सीट से रामानंद प्रसाद ने लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की। एक बार फिर उन्होंने पूर्व विधायक राकेश कुमार उर्फ सम्राट चौधरी को हराया। हालांकि, इस बार राकेश कुमार राजद के टिकट पर नहीं बल्कि निर्दलीय चुनाव लड़ रहे थे।

  1. फिर शुरू हुआ जदयू में सफर

साल 2014 में उन्होंने राजद के 13 विधायकों को अलग कर जदयू में शामिल होने की रणनीति बनाई। इसके बाद 2014 में ही जीतन राम मांझी की सरकार में उन्हें नगर विकास और आवास मंत्री बनाया गया। 2015 में जीतन राम मांझी ने नीतीश कुमार बगावत की। मांझी ने जब हम बनाई तो सम्राट के पिता शकुनी चौधरी भी इसके सक्रिय सदस्य बने। यहां तक की हम के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। इस दौरान सम्राट पर हम के कार्यक्रमों में भाग लेने। 2015 के विधानसभा चुनाव में हम उम्मीदवार पिता और भाई के लिए प्रचार करने का आरोप लगा। मामला विधान परिषद तक पहुंचा। यहां तक कि जनवरी 2016 में उनकी विधान परिषद सदस्यता रद्द कर दी गई। जबकि उनका कार्यकाल 23 मई 2020 तक का था।

  1. भाजपा में सफर और विधान परिषद सदस्य

जून 2017 में सम्राट चौधरी भाजपा में शामिल हो गए और 2018 में पार्टी की बिहार इकाई के प्रदेश उपाध्यक्ष बने। 2020 में वे बिहार विधान परिषद के सदस्य (एमएलसी) चुने गए और 2021 में एनडीए सरकार में पंचायती राज मंत्री बने।

  1. प्रमुख पदों पर नियुक्ति

2022 में उन्हें बिहार विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष चुना गया। इसके बाद, मार्च 2023 में उन्हें बिहार भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जिस पद पर वे 26 जुलाई 2024 तक रहे।

  1. भाजपा और जदयू के साथ आने के बाद बने उपमुख्यमंत्री

जनवरी 2024 में जब नीतीश कुमार ने एनडीए में वापसी की, तो सम्राट चौधरी को बिहार का उपमुख्यमंत्री बनाया गया और उन्हें वित्त व स्वास्थ्य जैसे कई महत्वपूर्ण विभाग सौंपे गए।

2025 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने तारापुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और राजद के प्रत्याशी अरुण कुमार को 45,000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से हराया। 2025 में एनडीए की जीत के बाद वे फिर से भाजपा विधायक दल के नेता चुने गए और उन्हें लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ बिहार का गृह मंत्री भी बनाया गया।

उस जीत के महज एक साल बाद ही नीतीश कुमार अब बिहार के मुख्यमंत्री पद से दूर राज्यसभा जा चुके हैं। इसी के साथ भाजपा ने अब इस राज्य की कमान सम्राट चौधरी को सौंपी है।

बिहार की राजनीति में जातीय समीकरणों की बहुत अहमियत है। सम्राट चौधरी कुशवाहा जाति से ताल्लुक रखते हैं और बिहार में इस जाति का आधार करीब 7-9 प्रतिशत है। बिहार में यादव जाति के बाद सबसे ज्यादा वोटर कुशवाहा जाति के ही हैं। बिहार में हुए जातीय सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग 27 प्रतिशत, अति-पिछड़ा वर्ग 36 प्रतिशत है, जो राज्य की कुल आबादी का 63 प्रतिशत हो जाते हैं। यही वजह है कि बिहार की जातीय राजनीति को साधने में सम्राट कुशवाहा भाजपा के लिए अहम हैं।

NATIONAL : लोकसभा सीटें 850 तक बढ़ाने के लिए संसद में होगा बिल पेश, परिसीमन और महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की तैयारी

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केंद्र सरकार ने मंगलवार को सांसदों के साथ संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 का मसौदा साझा कर दिया है। यह महिला आरक्षण विधेयक में प्रस्तावित संशोधन है, जिसका उद्देश्य लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करना है, जिसमें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सदस्य शामिल होंगे। बिल के गुरुवार को लोकसभा में पास होने की संभावना है।

केंद्र सरकार भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे में बड़े बदलाव की दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक, 2026 के जरिए लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों के पुनर्समायोजन, निर्वाचन क्षेत्रों के नए परिसीमन और महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण को जल्द लागू करने का रास्ता साफ करने की कोशिश की गई है। इसके तहत लोकसभा की सीटें 850 तक करने का प्रस्ताव है। इसके लिए लोकसभा में गुरुवार को बिल पेश होने वाला है।

यह प्रस्ताव सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि जनसंख्या की संवैधानिक परिभाषा बदलने, परिसीमन पर लगी पुरानी रोक हटाने और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी नए ढांचे को लागू करने का व्यापक प्रयास है। सरकार के मुताबिक, 1971 की जनगणना के आधार पर लंबे समय से जमी हुई सीट व्यवस्था अब देश की मौजूदा जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती।

पिछले दशकों में शहरीकरण, आंतरिक माइग्रेशन, आबादी का असमान विस्तार और नए सामाजिक-राजनीतिक संतुलन ने प्रतिनिधित्व के सवाल को और अहम बना दिया है। ऐसे में यह विधेयक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित और समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

विधेयक का सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से सबसे असरदार प्रावधान लोकसभा की सदस्य संख्या में वृद्धि से जुड़ा है। संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन का प्रस्ताव रखते हुए यह व्यवस्था की जा रही है कि राज्यों के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या 815 से अधिक नहीं होगी। इसके अलावा केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकतम 35 सदस्य हो सकेंगे।

इस बदलाव का मतलब यह है कि भविष्य में लोकसभा की कुल क्षमता मौजूदा संख्या से काफी अधिक हो सकती है और वह 850 तक हो सकती है। सरकार का तर्क है कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का आधार जनसंख्या और क्षेत्रीय संतुलन होना चाहिए।

यदि किसी राज्य या क्षेत्र की आबादी में भारी वृद्धि हुई है, तो वहां के मतदाताओं को उसी अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। यही वजह है कि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव सिर्फ तकनीकी संशोधन नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के पुनर्गठन का संकेत माना जा रहा है। इस प्रस्ताव का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा।

विधेयक का दूसरा अहम हिस्सा परिसीमन की प्रक्रिया को फिर से सक्रिय करना है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 में मौजूद उस प्रावधान को हटाने का प्रस्ताव है, जिसके कारण 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने तक सीटों का नया पुनर्समायोजन नहीं किया जा सकता था। इस रोक को हटाकर सरकार नवीनतम प्रकाशित जनगणना के आधार पर परिसीमन का रास्ता खोलना चाहती है।

परिसीमन विधेयक, 2026 के तहत केंद्र सरकार एक नए परिसीमन आयोग का गठन करेगी। इस आयोग की संरचना भी स्पष्ट की गई है। आयोग के अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश होंगे। मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके द्वारा नामित चुनाव आयुक्त पदेन सदस्य होंगे। आयोग का मुख्य काम नवीनतम जनगणना के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या तय करना, उनका पुनर्समायोजन करना और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं निर्धारित करना होगा।

प्रक्रिया के तहत आयोग अपने प्रारूप प्रस्ताव राजपत्र में प्रकाशित करेगा। इसके बाद सार्वजनिक आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए जाएंगे। एक बार अंतिम आदेश आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित हो जाने के बाद उन्हें कानून का दर्जा मिल जाएगा और उन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।

परिसीमन के दौरान यह भी ध्यान रखा जाएगा कि निर्वाचन क्षेत्र भौगोलिक रूप से सुगठित हों, प्रशासनिक इकाइयों की सीमाओं का सम्मान हो और जनसुविधाओं तथा स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाए। इसका उद्देश्य सिर्फ जनसंख्या के आधार पर गणितीय विभाजन करना नहीं, बल्कि व्यावहारिक और प्रशासनिक रूप से सक्षम निर्वाचन क्षेत्र बनाना है।

विधेयक में जनसंख्या की परिभाषा भी बदली जा रही है। अनुच्छेद 55, 81, 170, 330 और 332 में “जनसंख्या” का अर्थ अब उस जनगणना से होगा जिसे संसद कानून द्वारा निर्धारित करे और जिसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित हो चुके हों। इससे भविष्य में परिसीमन और सीट आवंटन के लिए अधिक लचीला और अपडेट आधार उपलब्ध होगा।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व को लेकर भी विधेयक में विशेष प्रावधान किए गए हैं। अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों में एसटी समुदायों के लिए सीटों के पुनर्समायोजन और आरक्षण अनुपात को लेकर स्पष्टता दी गई है, ताकि परिसीमन के बाद भी उनका प्रतिनिधित्व प्रभावित न हो।

इस पूरे विधायी पैकेज का सबसे चर्चित पहलू महिलाओं के लिए आरक्षण को जल्द प्रभावी बनाना है। 106वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन उसके लागू होने को परिसीमन और जनगणना से जोड़ा गया था।

इसी वजह से इसके अमल में समय लगने की आशंका थी। अब नया विधेयक अनुच्छेद 334A को बदलाव का प्रस्ताव करता है, ताकि महिलाओं के लिए आरक्षण “लेटेस्ट प्रकाशित जनगणना” के आधार पर किए जाने वाले परिसीमन के तुरंत बाद लागू किया जा सके।

इसका मतलब यह है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना का लंबा इंतजार जरूरी नहीं रहेगा, बल्कि उपलब्ध लेटेस्ट प्रकाशित आंकड़ों के आधार पर प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकेगी। यह आरक्षण लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों में दिल्ली, पुडुचेरी तथा जम्मू-कश्मीर की विधानसभाओं पर लागू होगा।

महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन के आधार पर आवंटित की जाएंगी। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए उप-आरक्षण लागू होगा।

इससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ संख्या के स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक विविधता के स्तर पर भी बढ़ेगी। विधेयक के अनुसार यह आरक्षण प्रारंभिक रूप से 15 वर्षों के लिए लागू रहेगा। संसद चाहे तो कानून बनाकर इसकी अवधि आगे भी बढ़ा सकती है।

संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 के जरिए तीन प्रमुख कानूनों में बदलाव प्रस्तावित हैं—केंद्र शासित प्रदेश सरकार अधिनियम, 1963; राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम, 1991; और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019। पुडुचेरी में विधानसभा की सदस्य संख्या अब परिसीमन आयोग तय करेगा और यह संख्या 30 से कम नहीं होगी।

केंद्र सरकार द्वारा मनोनीत सदस्यों की संख्या बढ़ाकर पांच की जाएगी, जिनमें दो महिलाएं होंगी। दिल्ली के मामले में विधानसभा की सदस्य संख्या परिसीमन आयोग तय करेगा और यह 70 से कम नहीं होगी। नए परिसीमन के लागू होने तक चुनाव मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर कराए जा सकेंगे। जम्मू-कश्मीर में विधानसभा की कुल सदस्य संख्या 114 से कम नहीं होगी।

पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र के लिए 24 सीटें रिक्त रखी जाएंगी और उन्हें कुल सदस्य संख्या की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा। उपराज्यपाल द्वारा महिलाओं और कश्मीरी प्रवासियों के प्रतिनिधित्व के लिए मनोनीत सदस्यों की संख्या परिसीमन के बाद बढ़ाकर तीन की जा सकेगी।

सरकार का कहना है कि 1971 की जनगणना पर आधारित सीट फ्रीज अब अपने उद्देश्य से आगे निकल चुका है। उस समय परिवार नियोजन को बढ़ावा देने और राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए यह व्यवस्था की गई थी। लेकिन अब देश की आबादी, बसावट, शहरी विस्तार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की जरूरतें बदल चुकी हैं। महिला रिजर्वेशन प्रावधान को महिला राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है, क्योंकि इससे संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी संरचनात्मक रूप से बढ़ेगी।

पांच मुख्य बातें

लोकसभा की कुल सदस्य संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव, जिसमें राज्यों से चुने जाने वाले सदस्यों की अधिकतम संख्या 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35 तक हो सकती है।

जनसंख्या की नई परिभाषा तय की जाएगी, जो संसद द्वारा निर्धारित और प्रकाशित नवीनतम जनगणना पर आधारित होगी।

परिसीमन पर लगी पुरानी संवैधानिक रोक हटेगी जिससे लेटेस्ट जनगणना के आधार पर सीटों और सीमाओं का पुनर्निर्धारण संभव होगा।

महिला आरक्षण को जल्द लागू करने का रास्ता ताकि लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में एक-तिहाई आरक्षण परिसीमन के तुरंत बाद लागू हो सके।

WORLD : ट्रम्प बोले-ईरान से 2 दिन में बातचीत हो सकती है:आसिम मुनीर का काम बेहतर, इसलिए पाकिस्तान में मीटिंग होने की संभावन

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि ईरान के साथ बातचीत अगले 2 दिनों में फिर से शुरू हो सकती है और इसके लिए पाकिस्तान सबसे ज्यादा संभावित जगह है।

उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि हालात तेजी से बदल रहे हैं, इसलिए बातचीत जल्द शुरू हो सकती है। ट्रम्प ने यह भी कहा कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर अच्छा काम कर रहे हैं, इसलिए वहां बातचीत होने की संभावना बढ़ गई है।

इससे पहले ईरान और अमेरिका के बीच 11 अप्रैल को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में 21 घंटे सीजफायर वार्ता हुई थी। हालांकि यह वार्ता बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई थी।

WORLD : ट्रंप ने पीएम मोदी को किया फोन, 40 मिनट हुई बातचीत, होर्मुज जलमार्ग को लेकर की अहम चर्चा

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन करके पश्चिम एशिया संकट के बारे में जानकारी दी। इस दौरान उन्होंने होर्मुज जलमार्ग को खुला और सुरक्षित रखने की जरूरत पर जोर दिया। ट्रंप के साथ फोन पर हुई लगभग 40 मिनट की बातचीत के बाद मोदी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि उन्होंने और अमेरिकी राष्ट्रपति ने द्विपक्षीय संबंधों में हुई महत्वपूर्ण प्रगति की समीक्षा की।

प्रधानमंत्री ने कहा कि दोनों पक्ष सभी क्षेत्रों में भारत-अमेरिका व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “मुझे मेरे मित्र राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का फोन आया था। हमने विभिन्न क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग में हासिल की गई महत्वपूर्ण प्रगति का जायजा लिया। हम सभी क्षेत्रों में अपनी व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।” उन्होंने लिखा, “हमने पश्चिम एशिया की स्थिति पर भी चर्चा की और होर्मुज जलमार्ग को खुला और सुरक्षित रखने के महत्व पर जोर दिया।”

ट्रंप-मोदी की बातचीत के बाद अमेरिकी राजदूत ने कहा कि नयी दिल्ली और वाशिंगटन के बीच आने वाले दिनों में ऊर्जा सहित विभिन्न क्षेत्रों में कुछ बड़े सौदे होने की उम्मीद है। हालांकि, उन्होंने इन सौदों के बारे में विस्तार से बताने से इनकार कर दिया। यह अमेरिकी राष्ट्रपति और पीएम मोदी के बीच इस साल फोन पर हुई तीसरी बातचीत थी। वहीं, अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में हाल में हुई शांति वार्ता के बाद यह दोनों नेताओं की पहली बातचीत है। ट्रंप और पीएम मोदी ने 2 फरवरी को एक व्यापार समझौते में हुई प्रगति की घोषणा करने और 24 मार्च को पश्चिम एशिया की स्थिति पर चर्चा करने के लिए फोन पर बातचीत की थी।

गोर के मुताबिक, बातचीत के अंत में ट्रंप ने पीएम मोदी से कहा, “मैं बस आपको यह बताना चाहता हूं कि हम सब आपसे प्यार करते हैं।” अमेरिकी राजदूत ने कहा, “कुछ बड़े सौदे हैं, जिनकी घोषणा अगले कुछ दिनों या हफ्तों में की जाएगी। हमारे रिश्ते मजबूत स्थिति में हैं, कुछ बहुत ही दिलचस्प और रोमांचक होगा।”

अमेरिकी राजदूत ने कहा, “तेल और गैस की कीमतों में बढ़ोत्तरी का केवल एक ही कारण है और वह यह है कि कोई (ईरान) इस क्षेत्र को बंधक बनाए हुए है।” उन्होंने कहा, “जाहिर है कि अमेरिका इस जलमार्ग को खोलना चाहता है और इसलिए मुझे लगता है कि इससे भारत सहित पूरी दुनिया को फायदा होगा।” गोर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नाकेबंदी पर भी चर्चा की।

सर्जियो गोर ने इस्लामाबाद में वार्ता विफल होने के बाद ईरान और अमेरिका के बीच नयी बातचीत की संभावनाओं से जुड़े सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “भविष्य में होने वाली किसी भी वार्ता की घोषणा करना मेरा काम नहीं है। उन्होंने नाकेबंदी और होर्मुज जलमार्ग जल्द से जल्द फिर से खोलने के महत्व पर चर्चा की। सच कहूं तो, इस वजह से पूरा क्षेत्र, पूरी दुनिया पीड़ित है।”

पाकिस्तान के इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच हुई बातचीत नाकाम रहने का एक प्रमुख कारण यह था कि दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद गहरे अविश्वास को दूर करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए। अमेरिका और ईरान के संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं जिनमें राजनीतिक, सामरिक और वैचारिक मतभेद गहराई से जुड़े हुए हैं। ऐसे में पहले पर्दे के पीछे से कूटनीतिक और छोटे-छोटे समझौते पर आगे बढ़ने की जरूरत थी लेकिन सीधे औपचारिक वार्ता शुरू कर दी गई। यही कारण था कि लंबी वार्ता के बावजूद संवाद सकारात्मक दिशा में आगे नहीं बढ़ पाया। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें

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