Wednesday, October 7, 2026
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NATIONAL : बंगाल की नंदीग्राम-रेजिनगर विधानसभा सीटों के लिए 6 अक्टूबर को वोटिंग, आयोग ने घोषित किया शेड्यूल

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केंद्रीय चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की दो खाली विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव की तिथियों का ऐलान कर दिया है। नंदीग्राम और रेजिनगर सीटों के लिए 6 अक्तूबर को वोट डाले जाएंगे। नंदीग्राम सीट बीजेपी ने जीती थी जबकि रेजिनगर सीट हुमायूं कबीर की पार्टी ने कब्जाई थी। फाल्टा को छोड़ दें तो बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद ये पहले उपचुनाव हैं।

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में विधानसभा की दो खाली सीटों में लिए चुनाव आयोग ने उपचुनाव का ऐलान कर दिया है। राज्य की नंदीग्राम और रेजिनगर सीटों के लिए 6 अक्तूबर को वोट डाले जाएंगे। दोनों सीटों के नतीजे 9 अक्टूबर को घोषित किए जाएंगे। नंदीग्राम सीट पश्चिम बंगाल में मौजूदा सीएम शुभेंदु अधिकारी के सीट खाली करने के कारण होगा, जब रेजिनगर सीट टीएमसी से निष्कासित नेता हुमायूं कबीर ने खाली थी। दोनों ही नेता दो-दो सीटों से चुनाव जीते थे।

जानें पूरा शेड्यूल: कब क्या होगा
चुनाव आयोग के मुताबिक दोनों सीटों पर 6 अक्टूबर 2026 को मतदान होगा, जबकि मतगणना 9 अक्टूबर को होगी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के छोड़ने के बाद खाली हुई थी। उन्होंने कोलकाता की भवानीपुर विधानसभा सीट बरकरार रखने के लिए नंदीग्राम सीट से इस्तीफा दिया था। चुनाव आयोग की ओर से जारी कार्यक्रम के मुताबिक उपचुनाव के लिए गजट नोटिफिकेशन 9 सितंबर को जारी किया जाएगा। उम्मीदवार 16 सितंबर तक अपना नामांकन दाखिल कर सकेंगे। नामांकन पत्रों की जांच 17 सितंबर को होगी, जबकि उम्मीदवारी वापस लेने की आखिरी तारीख 19 सितंबर तय की गई है। इसके बाद 6 अक्टूबर को मतदान कराया जाएगा।

नौ अक्टूबर को आए रिजल्ट
9 अक्टूबर को वोटों की गिनती होगी। चुनाव आयोग ने पूरी चुनाव प्रक्रिया 11 अक्टूबर तक पूरी करने का लक्ष्य रखा है। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को लेकर भी निर्देश जारी किए हैं। आयोग के मुताबिक नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख तक मतदाता सूची को लगातार अपडेट करने की प्रक्रिया जारी रहेगी। इसके लिए निर्धारित नियमों और कटऑफ के मुताबिक प्राप्त आवेदनों पर विचार किया जाएगा।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (2026):
नंदीग्राम सीट से बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार पवित्र कर को 9,665 वोटों से हराया था। अगर इस सीट से ममता बनर्जी उतरतीं हैं तो मुकाबला बेहद कड़ा हो सकता है। 2021 के चुनावों में वह यहां से लड़ी थीं तब शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें हरा दिया था।
मुर्शिदाबाद जिले की रेजिनगर सीट पर आम जनता उन्नयन पार्टी के हुमायूं कबीर ने जीत हासिल की है। उन्होंने बीजेपी के बापन घोष को 58,876 वोटों के बड़े अंतर से हराया है। इस सीट पर अब देखना है कि टीएमसी और हुमायूं कबीर की पार्टी किसे उतारती है।

NATIONAL : क्या ममता ने बहाना किया था, पैर फ्रैक्चर था ही नहीं? मेडिकल रिकॉर्ड लीक होने से मचा बवाल, पूर्व CM ने अस्पताल को भेजा नोटिस

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पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मेडिकल रिकॉर्ड लीक होने से बंगाल में सियासी बवाल मच गया है। सीएम शुभेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान ममता के पैर में कोई फ्रैक्चर या हड्डी खिसकने की चोट नहीं थी। अब इन गोपनीय मेडिकल दस्तावेजों के लीक होने पर ममता के

पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मेडिकल रिकॉर्ड लीक होने के बाद राज्य की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पूर्व सीएम के निजी मेडिकल रिकॉर्ड और इलाज से जुड़े गोपनीय दस्तावेज बिना अनुमति सार्वजनिक करने के आरोप में कानूनी कार्रवाई की गई है। ममता बनर्जी के वकील ने इस मामले में SSKM अस्पताल प्रबंधन और राज्य स्वास्थ्य विभाग के कई अधिकारियों को सीधा कानूनी नोटिस भेजा है।

नोटिस में कहा गया है कि बिना किसी अनुमति के पूर्व मुख्यमंत्री के इलाज से जुड़ी संवेदनशील जानकारी और मेडिकल रिपोर्ट सार्वजनिक की गई है, जो मेडिकल गोपनीयता कानून और डॉक्टरों की पेशेवर आचार संहिता का घोर उल्लंघन है।

‘2021 चुनाव में ममता बनर्जी ने पैर टूटने का किया था नाटक’
हाल ही में राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने मेडिकल दस्तावेज दिखाकर आरोप लगाया था कि मार्च 2021 में विधानसभा चुनाव के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पैर में कोई फ्रैक्चर नहीं हुआ था। इसी का विरोध करते हुए ममता बनर्जी ने कानूनी नोटिस भेजा है

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने 2021 के नंदीग्राम चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी को पैर में लगी चोट से जुड़ी मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया है कि अस्पताल के रिकॉर्ड के मुताबिक उनके पैर में कोई फ्रैक्चर या हड्डी खिसकने (डिसलोकेशन) का सबूत नहीं था। सीएम ने कहा कि इसकी जांच की जाएगी।

TMC ने क्या कहा?
टीएमसी ने शुभेंदु अधिकारी के इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण, रुचिहीन और उपचुनावों को प्रभावित करने की कोशिश बताया है।

क्या है पूरा मामला?
दरअसल, तीन बार मुख्यमंत्री रहीं ममता बनर्जी को 10 मार्च, 2021 को नंदीग्राम के बिरुलिया इलाके के रेयापारा में चुनाव प्रचार के दौरान बाएं पैर में चोट लग गई थी। शुरू में, उन्होंने दावा किया था कि कुछ अज्ञात लोगों ने उन्हें धक्का दिया था, जिससे वह अपनी कार के खुले दरवाजे से टकरा गईं और उनके बाएं पैर में चोट लग गई। बाद में, उन्होंने एक वीडियो जारी किया और कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान भारी भीड़ ने उन्हें धक्का दिया था। उन्हें SSKM अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां पता चला कि उनके बाएं टखने और पैर की हड्डी और लिगामेंट में गंभीर चोटें आई हैं।

घटना के बाद बाद ममता बनर्जी को व्हीलचेयर पर चुनाव प्रचार करते देखा गया। इसके बाद, TMC ने 2021 के विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक जीत हासिल की और 210 से ज़्यादा सीटें जीतीं, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) सिर्फ़ 77 सीटों पर जीत पाई।

NATIONAL : फॉर्म-6 में एक कॉमा या फुल स्टॉप तक नहीं बदला… सुप्रीम कोर्ट के कमेंट के बाद चुनाव आयोग

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सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी के कुछ घंटों बाद चुनाव आयोग ने साफ किया कि मूल फॉर्म 6 में एक कॉमा भी नहीं बदला गया है। SIR के दौरान सिर्फ एक अतिरिक्त घोषणा पेज जोड़ा गया था, जो पिछले साल बिहार में बने प्रोटोकॉल का हिस्सा है।

चुनाव आयोग का बड़ा दावा
सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी के कुछ घंटों बाद चुनाव आयोग ने अपना रुख दोहराया है। साफ कहा कि मूल फॉर्म 6 में एक कॉमा या फुलस्टॉप भी नहीं बदला गया है। SIR के दौरान सिर्फ एक अतिरिक्त घोषणा पेज जोड़ा गया था, जो पिछले साल बिहार में बने प्रोटोकॉल का हिस्सा है। यह सफाई तब आई जब CJI सूर्यकांत ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी बदले हुए फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है। उन्होंने कहा कि साफ-साफ बता दें। जब रिकॉर्ड आएगा, तो हम देखना चाहेंगे कि बदलाव किसने किया।

चुनाव आयोग ने बताया कि अतिरिक्त घोषणा वाला पेज बिहार SIR के दौरान तैयार किए गए प्रोटोकॉल के तहत जोड़ा गया था। इस प्रोटोकॉल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सुनवाई के बाद कोर्ट ने माना कि यह कदम चुनाव आयोग को मिली संवैधानिक शक्तियों के दायरे में आता है। इंडिया टुडे ने सूत्रों के हवाले से बताया कि अतिरिक्त घोषणा भी उसी प्रोटोकॉल का हिस्सा थी, इसलिए मूल फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया।

ये भी पढ़ें:फॉर्म-6 और ज्ञानेश कुमार पर राहुल गांधी और चुनाव आयोग आमने-सामने!
वहीं, कानूनी जानकारों ने हालांकि अलग राय रखी है। उन्होंने कहा कि घोषणा जोड़ने से पहले सरकार और चुनाव आयोग के बीच जरूरी सलाह-मशविरा पूरा होना चाहिए था। किसी भी बदलाव या अतिरिक्त नियम को गजट में नोटिफाई करके संसद के सामने रखना जरूरी होता है। उनके मुताबिक, सिर्फ आंतरिक प्रोटोकॉल से फॉर्म में कुछ जोड़ना कानूनी प्रक्रिया का पूरा पालन नहीं माना जा सकता।

दूसरी ओर विपक्ष की तरफ से कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगाया कि उन्होंने फॉर्म 6 को गैर-कानूनी और एकतरफा तरीके से बदला। उन्होंने चुनाव आयोग के पिछले महीने जारी प्रेस बयान का हवाला दिया। उस बयान में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 के साथ दी गई घोषणा को सही ठहराया है। राहुल गांधी ने दावा किया कि आयोग का यह बयान और कोर्ट की ताजा टिप्पणी एक-दूसरे से मेल नहीं खाती।

दरअसल, यह पूरा मामला सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिका इंडियन एक्सप्रेस की हालिया रिपोर्ट के आधार पर दायर की गई थी। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि SIR से जुड़े फैसलों पर तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, आपत्ति उन फैसलों पर थी जिनमें फॉर्म 6 में आवेदक के पुरखों की जानकारी और पिछले SIR से लिंक देने की शर्त शामिल थी।

याचिका में आरोप है कि चुनाव नियमों के तहत जरूरी कानूनी बदलाव किए बिना ये शर्तें सॉफ्टवेयर के जरिए लागू कर दी गईं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि दो चुनाव आयुक्तों ने साफ कहा था कि तय फॉर्म में बिना कानूनी प्रक्रिया के बदलाव नहीं किया जा सकता। याचिका में कोर्ट से मांग की गई है कि CEC ज्ञानेश कुमार के तहत शुरू, मंजूर या लागू किए गए सभी फैसले, गाइडलाइन, निर्देश और सॉफ्टवेयर बदलाव असंवैधानिक और शुरू से अमान्य घोषित किए जाएं। याचिका में कहा गया है कि ये फैसले पूरे आयोग की मंजूरी के बिना या ज्यादातर चुनाव आयुक्तों की राय के खिलाफ लिए गए।

हालांकि चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मूल फॉर्म 6 जस का तस है। अतिरिक्त पेज सिर्फ घोषणा के लिए जोड़ा गया था और वह भी पहले से तय प्रोटोकॉल के तहत। उन्होंने जोर देकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस प्रोटोकॉल को आयोग की शक्तियों के अंदर मान चुका है।

NATIONAL : संयुक्त राष्ट्र को ठीक करने पर जोर: जयशंकर बोले- कुछ देश यूएन में सुधार के खिलाफ, क्यों नहीं बदल रही व्यवस्था?

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विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार की जरूरत पर एक बार फिर से जोर दिया। उन्होंने कहा कि वैश्विक संस्था बड़े मुद्दों पर निर्णय लेने में गतिरोध का सामना कर रही है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के मौजूदा ढांचे, अफ्रीका और अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था पर क्या बातें कहीं?

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र (UN) की मौजूदा व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी की है। बदलाव की जरूरत का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया के बड़े मुद्दों पर यह वैश्विक संस्था अब प्रभावी फैसले लेने में काफी हद तक नाकाम हो रही है। साढ़े चार साल से अधिक समय से चल रहे यूक्रेन-रूस संघर्ष और खाड़ी देशों के टकराव का जिक्र करते हुए विदेश मंत्री ने कहा, संयुक्त राष्ट्र इस समय गतिरोध में फंसा हुआ है। अफ्रीका के मुद्दों और कोविड महामारी जैसे बड़े मामलों के समय निर्णय लेने में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका काफी हद तक अप्रासंगिक रही है। जयशंकर ने दो-टूक कहा, समाधान संयुक्त राष्ट्र जैसी व्यवस्था को दरकिनार करना नहीं, बल्कि UN में सुधार है।

क्या बड़े वैश्विक मुद्दों पर UN अब प्रभावी नहीं रहा?
जयशंकर ने दिल्ली में आयोजित एक कॉन्क्लेव के दौरान कहा, यूएन सुरक्षा परिषद में गतिरोध के कारण अब निर्णय लेने की प्रक्रिया काफी हद तक प्रभावी नहीं रही। सुरक्षा परिषद अब वैश्विक हितों की पूरी तस्वीर का प्रतिनिधित्व नहीं करती। उन्होंने कहा कि दुनिया स्मार्ट, आपस में जुड़ी हुई और बहुध्रुवीय हो चुकी है, लेकिन UN की मौजूदा व्यवस्था अब भी पुराने ढांचे में अटकी हुई है। इस कार्यक्रम में सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज योंग बून येओ भी मौजूद रहे।

UN के सदस्य चार गुना बढ़े, सुधार में रुकावट कहां, व्यवस्था क्यों नहीं बदली?
विदेश मंत्री ने कहा, यूएन की शुरुआत 51 सदस्यों के साथ हुई थी और आज इसके सदस्यों की संख्या करीब चार गुना हो चुकी है। अगर संस्था का विस्तार चार गुना हो गया है तो उसके पुराने प्रबंधन ढांचे को बनाए रखना कैसे काम कर सकता है? जयशंकर ने किसी देश का नाम लिए बिना कहा कि कुछ देश यूएन में सुधार का विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वाले अफ्रीका और उसके हितों का तर्क इस्तेमाल करते हैं। अफ्रीका अब खुद अंतर-सरकारी वार्ताओं में अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुका है और बता चुका है कि वह क्या बदलाव चाहता है।

यूएन को दरकिनार करने के बजाय उसे ठीक करना चाहिए
जयशंकर ने कहा, दुनिया को यह तय करना होगा कि अप्रभावी संयुक्त राष्ट्र को केवल दरकिनार किया जाएगा या उसे प्रभावी बनाने की कोशिश की जाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा, दुनिया को यूएन की जरूरत है। इस संस्था ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की बड़ी सेवा की है। इसलिए हम सबका लक्ष्य यूएन में सुधार होना चाहिए, ना कि उसके बाहर काम करना।

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था का जिक्र करते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि मौजूदा समय में सिर्फ वित्तीय प्रणाली ही नहीं, बल्कि व्यापार व्यवस्था को लेकर भी दुनिया में यह भावना है कि मौजूदा सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा,मौजूदा व्यवस्था बाजार के सिद्धांतों पर आधारित थी, लेकिन आज दुनिया में बाजार से इतर कई ऐसी प्रथाएं मौजूद हैं, जिन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।इनसे अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है। बाजार के नियमों और वास्तविक रूप से मौजूद गैर-बाजार प्रथाओं के बीच संघर्ष अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की मुख्य समस्या है।

NATIONAL : संयुक्त राष्ट्र को ठीक करने पर जोर: जयशंकर बोले- कुछ देश यूएन में सुधार के खिलाफ, क्यों नहीं बदल रही व्यवस्था?

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विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार की जरूरत पर एक बार फिर से जोर दिया। उन्होंने कहा कि वैश्विक संस्था बड़े मुद्दों पर निर्णय लेने में गतिरोध का सामना कर रही है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के मौजूदा ढांचे, अफ्रीका और अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था पर क्या बातें कहीं?

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र (UN) की मौजूदा व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी की है। बदलाव की जरूरत का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया के बड़े मुद्दों पर यह वैश्विक संस्था अब प्रभावी फैसले लेने में काफी हद तक नाकाम हो रही है। साढ़े चार साल से अधिक समय से चल रहे यूक्रेन-रूस संघर्ष और खाड़ी देशों के टकराव का जिक्र करते हुए विदेश मंत्री ने कहा, संयुक्त राष्ट्र इस समय गतिरोध में फंसा हुआ है। अफ्रीका के मुद्दों और कोविड महामारी जैसे बड़े मामलों के समय निर्णय लेने में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका काफी हद तक अप्रासंगिक रही है। जयशंकर ने दो-टूक कहा, समाधान संयुक्त राष्ट्र जैसी व्यवस्था को दरकिनार करना नहीं, बल्कि UN में सुधार है।

क्या बड़े वैश्विक मुद्दों पर UN अब प्रभावी नहीं रहा?
जयशंकर ने दिल्ली में आयोजित एक कॉन्क्लेव के दौरान कहा, यूएन सुरक्षा परिषद में गतिरोध के कारण अब निर्णय लेने की प्रक्रिया काफी हद तक प्रभावी नहीं रही। सुरक्षा परिषद अब वैश्विक हितों की पूरी तस्वीर का प्रतिनिधित्व नहीं करती। उन्होंने कहा कि दुनिया स्मार्ट, आपस में जुड़ी हुई और बहुध्रुवीय हो चुकी है, लेकिन UN की मौजूदा व्यवस्था अब भी पुराने ढांचे में अटकी हुई है। इस कार्यक्रम में सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज योंग बून येओ भी मौजूद रहे।

UN के सदस्य चार गुना बढ़े, सुधार में रुकावट कहां, व्यवस्था क्यों नहीं बदली?
विदेश मंत्री ने कहा, यूएन की शुरुआत 51 सदस्यों के साथ हुई थी और आज इसके सदस्यों की संख्या करीब चार गुना हो चुकी है। अगर संस्था का विस्तार चार गुना हो गया है तो उसके पुराने प्रबंधन ढांचे को बनाए रखना कैसे काम कर सकता है? जयशंकर ने किसी देश का नाम लिए बिना कहा कि कुछ देश यूएन में सुधार का विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वाले अफ्रीका और उसके हितों का तर्क इस्तेमाल करते हैं। अफ्रीका अब खुद अंतर-सरकारी वार्ताओं में अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुका है और बता चुका है कि वह क्या बदलाव चाहता है।

यूएन को दरकिनार करने के बजाय उसे ठीक करना चाहिए
जयशंकर ने कहा, दुनिया को यह तय करना होगा कि अप्रभावी संयुक्त राष्ट्र को केवल दरकिनार किया जाएगा या उसे प्रभावी बनाने की कोशिश की जाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा, दुनिया को यूएन की जरूरत है। इस संस्था ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की बड़ी सेवा की है। इसलिए हम सबका लक्ष्य यूएन में सुधार होना चाहिए, ना कि उसके बाहर काम करना।

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था का जिक्र करते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि मौजूदा समय में सिर्फ वित्तीय प्रणाली ही नहीं, बल्कि व्यापार व्यवस्था को लेकर भी दुनिया में यह भावना है कि मौजूदा सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा,मौजूदा व्यवस्था बाजार के सिद्धांतों पर आधारित थी, लेकिन आज दुनिया में बाजार से इतर कई ऐसी प्रथाएं मौजूद हैं, जिन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।इनसे अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है। बाजार के नियमों और वास्तविक रूप से मौजूद गैर-बाजार प्रथाओं के बीच संघर्ष अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की मुख्य समस्या है।

NATIONAL : देश के छह राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की आठ विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के लिए मतगणना शुरू

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देश के छह राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की आठ विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के लिए मतगणना शुरू हो चुकी है। इनमें जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, झारखंड, तेलंगाना, पंजाब, मिजोरम और ओडिशा की आठ विधानसभा सीटों पर मंगलवार को हुए चुनाव के लिए आज शुक्रवार सुबह आठ बजे मतगणना शुरू हो गई है। आज ही बिहार विधानसभा चुनाव का रिजल्ट आना है। बिहार में भी मतगणना आरंभ हो चुकी है।

इन सीटों पर उपचुनाव के लिए मतगणना जारी

भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार, -जम्मू-कश्मीर की बडगाम और नगरोटा, राजस्थान की अंता, झारखंड की घाटशिला, तेलंगाना की जुबली हिल्स, पंजाब की तरनतारन, मिजोरम की डंपा और ओडिशा की नुआपाड़ा सीट के लिए आज शुक्रवार सुबह आठ बजे मतगणना शुरू हो गई।

उपचुनाव में बडगाम सीट सबसे अधिक चर्चा में

उपचुनाव में जम्मू-कश्मीर की बडगाम सीट सबसे अधिक चर्चा में रही है। यहां उपचुनाव मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के इस्तीफे के बाद कराया गया। 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दो सीटों गांदरबल और बडगाम से जीत हासिल की थी। बाद में उन्होंने गांदरबल सीट बरकरार रखते हुए बडगाम से इस्तीफा दे दिया। बडगाम से 20 उम्मीदवारों ने किस्मत आजमाई।

NATIONAL : इंतजार खत्म! दिल्ली चुनाव की तारीखों का ऐलान आज, चुनाव आयोग ने 2 बजे बुलाई प्रेस कॉन्फ्रेंस

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चुनाव आयोग ने आज दोपहर प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया है। खबरों की मानें तो आज चुनाव आयोग दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा कर सकता है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 का सभी को बेसब्री से इंतजार है। चुनावी तारीखों की घोषणा से पहले ही राजधानी का सियासी पारा रोज नए रिकॉर्ड तोड़ता है। वहीं अब इंतजार खत्म हो चुका है। चुनाव आयोग आज दिल्ली चुनाव की तारीखों की घोषणा कर सकता है। चुनाव आयोग ने आज दोपहर 2 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई है। कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग दिल्ली चुनाव की तारीखों का ऐलान करेगा।

फरवरी में पूरा होगा कार्यकाल
बता दें कि आगामी 23 फरवरी को दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल पूरा हो जाएगा। फरवरी में दिल्ली विधानसभा चुनाव होने हैं। वहीं आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग तारीखों का ऐलान कर सकता है। दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों पर अगले महीने मतदान होने की संभावना है।

पिछली बार कब हुए थे चुनाव?
इससे पहले 2020 में भी 6 जनवरी को चुनाव आयोग ने मतदान की घोषणा की थी और 8 फरवरी को दिल्ली विधानसभा चुनाव करवाए गए थे। इसके नतीजे 11 फरवरी को सामने आए थे। इस बार भी इन्हीं तारीखों के आसपास मतदान और परिणाम आने की उम्मीद है।

NATIONAL : जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर विवाद: पूर्व सीजेआई गवई समेत कई रिटायर्ड जजों ने क्यों जताई आपत्ति, क्या है मामला?

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मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी को लेकर पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने आपत्ति जताई है। भुइयां ने कहा था कि लाखों नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मनमानी होगी। पूर्व न्यायाधीशों का कहना है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे में क्या न्यायिक मर्यादा प्रभावित होती है? आइए, पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं…

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने रविवार को नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित 19वें जस्टिस बोध राज साहनी स्मृति मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में एसआईआर को लेकर टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिससे लाखों भारतीय नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित होते हैं, स्वाभाविक रूप से मनमानी होगी और संवैधानिक व्यवस्था का निषेध होगी। उन्होंने यह भी कहा था कि संविधान नागरिकों को दो वर्गों में नहीं बांटता। एक वर्ग ऐसा नहीं हो सकता जिसके पास मतदान का अधिकार हो और दूसरा ऐसा जिसके पास यह अधिकार न हो।

बीआर गवई ने जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर क्या कहा?
पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा कि न्यायिक मर्यादा उन्हें ऐसे मामले पर टिप्पणी करने की अनुमति नहीं देगी, जो सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन है। उनका कहना था कि शीर्ष अदालत के किसी मौजूदा न्यायाधीश को ऐसे मुद्दे पर सार्वजनिक बयान नहीं देना चाहिए, जिस पर उसी अदालत में सुनवाई हो रही हो। गवई की इस राय से दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसएन ढींगरा और आरएस सोढ़ी ने भी सहमति जताई और जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर सवाल उठाए।

सेवानिवृत्त जजों ने एसआईआर को लेकर क्या कहा?
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एसएन ढींगरा ने कहा कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी शीर्ष अदालत के मौजूदा न्यायाधीश की सीमाओं से काफी आगे थी। उन्होंने कहा कि जब मामला उसी अदालत में लंबित हो तो सार्वजनिक कार्यक्रम में ऐसी टिप्पणी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जस्टिस भुइयां को ऐसा बयान देने से पहले पूरे मामले के तथ्यों पर विचार करना चाहिए था। वहीं, एसएन ढींगरा ने चुनाव आयुक्तों के बीच एसआईआर को लेकर कथित मतभेदों पर कहा कि अगर कोई असहमति है तो चुनाव आयुक्त खुद अपनी बात रखने में सक्षम हैं।

जस्टिस आरएस सोढ़ी ने मतदान के अधिकार को लेकर क्या कहा?
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति आरएस सोढ़ी ने एसआईआर को मताधिकार से वंचित करने की प्रक्रिया बताए जाने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि मतदान का अधिकार कानूनी व्यवस्था के तहत तय होता है। अगर कोई व्यक्ति कानून में तय शर्तों के दायरे में आता है तो उसे वोट देने का अधिकार है और अगर वह शर्तों के दायरे में नहीं आता तो उसे वोट का अधिकार नहीं होगा। उन्होंने कहा कि अगर किसी ऐसे व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में है जो कानूनी शर्तें पूरी नहीं करता तो उसे हटाने की प्रक्रिया कानून के अनुसार होनी चाहिए। वहीं, पात्र व्यक्ति का नाम गलत तरीके से हट गया है तो वह फिर से नाम शामिल कराने की कानूनी प्रक्रिया अपना सकता है।

एसआईआर का मामला अभी कहां पहुंचा है?
एसआईआर और उससे जुड़े कई मुद्दे सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। इनमें चुनाव आयोग से जुड़े नए कानून की वैधता का मामला भी शामिल है। इस कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाले चयन पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखा गया है। ऐसे में जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी पर पूर्व सीजेआई और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की आपत्ति का मुख्य आधार यही है कि संबंधित मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लंबित है। जस्टिस भुइयां नालसार के कुलाधिपति भी रह चुके हैं। अपने संबोधन में उन्होंने विश्वविद्यालय के छात्रों की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने देश और दुनिया को दिखाया है कि कानून के छात्र किस तरह के होने चाहिए।

NATIONAL : भाजपा ने यूपी में चेहरे बदले, अब संगठन और सरकार में बदलाव की बारी

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Rajya Sabha Elections: भाजपा ने सबसे बड़ा बदलाव यह किया कि उत्तर प्रदेश से कार्यकाल पूरा कर रहे भाजपा के सभी आठ राज्यसभा सदस्यों को दोबारा टिकट नहीं दिया। इनमें केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा भी शामिल हैं।

UP BJP Rajya Sabha Candidates List:उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा की आठ उम्मीदवारों की सूची ने सिर्फ उच्च सदन के समीकरण नहीं बदले हैं, बल्कि प्रदेश भाजपा के संगठन और योगी सरकार में आने वाले संभावित बदलावों की जमीन भी तैयार कर दी है। पार्टी ने इस बार उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए किसी भी मौजूदा सदस्य को दोहराने के बजाय प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह सहित संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल रहे नेताओं को आगे किया है। ऐसे में 16 अक्टूबर के राज्यसभा चुनाव के बाद सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि इन नेताओं की मौजूदा जिम्मेदारियों की जगह कौन लेगा।

भाजपा ने धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को प्रत्याशी बनाया है। इनमें प्रकाश पाल प्रदेश भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा के अध्यक्ष, प्रियंका सिंह रावत प्रदेश उपाध्यक्ष और राम प्रताप सिंह चौहान प्रदेश महामंत्री हैं। धर्मपाल सिंह योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री होने के साथ आंवला से विधायक हैं।

राज्यसभा पहुंचेंगे तो प्रदेश संगठन में बदलेंगे चेहरे
भाजपा की सूची का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भाजपा ने केवल राजनीतिक रूप से सक्रिय नेताओं को ही नहीं, बल्कि संगठन की मौजूदा जिम्मेदारियां संभाल रहे तीन चेहरों को भी संसद भेजने का फैसला किया है। प्रकाश पाल को जून 2026 में प्रदेश भाजपा के पिछड़ा वर्ग मोर्चे की जिम्मेदारी दी गई थी। राम प्रताप सिंह चौहान प्रदेश महामंत्री हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संगठनात्मक कामकाज से जुड़े हैं। प्रियंका सिंह रावत प्रदेश उपाध्यक्ष हैं।

तीनों के राज्यसभा पहुंचने की स्थिति में पार्टी के सामने संगठन में उनकी जगह और जिम्मेदारियों को लेकर निर्णय का सवाल होगा। विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश संगठन में होने वाली ये नियुक्तियां इसलिए भी महत्वपूर्ण होंगी क्योंकि इनके जरिए क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व का अगला संतुलन तय होगा। भाजपा ने राज्यसभा की सूची के जरिए एक साथ संसद के लिए नए चेहरे चुने और प्रदेश संगठन में अगले बदलाव की गुंजाइश भी पैदा कर दी।

धर्मपाल सिंह के जाने से सरकार में एक जगह खाली
धर्मपाल सिंह के नाम ने राज्यसभा चुनाव को प्रदेश सरकार से भी जोड़ दिया है। वह आंवला से विधायक और योगी सरकार में पशुधन एवं दुग्ध विकास मंत्री हैं। राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने पर विधानसभा की सदस्यता छोड़नी होगी। इसके साथ ही सरकार में उनके विभाग और मंत्री पद को लेकर भी निर्णय करना पड़ेगा।

इससे विधानसभा चुनाव से पहले मंत्रिमंडल में फेरबदल की संभावना पर राजनीतिक नजरें टिक गई हैं। हालांकि भाजपा या सरकार ने अभी मंत्रिमंडल में किसी बदलाव की घोषणा नहीं की है। इसलिए फिलहाल स्पष्ट तथ्य यही है कि धर्मपाल सिंह के राज्यसभा जाने की स्थिति में सरकार और विधानसभा, दोनों स्तर पर नई व्यवस्था करनी होगी।

आठों पुराने सांसद बाहर, भाजपा ने बदली पूरी संसदीय टीम
भाजपा ने सबसे बड़ा बदलाव यह किया कि उत्तर प्रदेश से कार्यकाल पूरा कर रहे भाजपा के सभी आठ राज्यसभा सदस्यों को दोबारा टिकट नहीं दिया। इनमें केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा भी शामिल हैं। अन्य निवर्तमान सदस्यों में अरुण सिंह, सीमा द्विवेदी, नीरज शेखर, बृजलाल और गीता शाक्य के नाम हैं। दिनेश शर्मा का कार्यकाल भी समाप्त हो रहा है, लेकिन वे अब अंडमान-निकोबार के उपराज्यपाल हैं।

इस तरह भाजपा ने राज्यसभा में अपने उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधित्व के लिए पूरी तरह नए चेहरे चुने हैं। खास बात यह है कि पार्टी ने केंद्रीय स्तर पर चर्चित नामों के बजाय प्रदेश की राजनीति और संगठन से जुड़े चेहरों को प्राथमिकता दी है।

हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाए जाने से केंद्र में उनकी आगे की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे हैं। हालांकि पार्टी ने इन दोनों को टिकट नहीं देने का कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया है, इसलिए उनके भविष्य को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय अगले फैसलों का इंतजार करना होगा।

राज्यसभा की सूची से संगठन गढ़ने की कोशिश
भाजपा की सूची में तीन ओबीसी, दो दलित और तीन सामान्य वर्ग के चेहरे हैं। ओबीसी प्रतिनिधित्व में लोधी, पाल और कुर्मी समुदाय शामिल हैं, जबकि सामान्य वर्ग में दो ब्राह्मण और एक ठाकुर चेहरा है। दो महिलाएं, प्रियंका सिंह रावत और श्रुति गंगवार शामिल हैं।

हालांकि इस सूची का राजनीतिक महत्व केवल जातीय प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है। जिन नेताओं को चुना गया है, उनमें संगठनात्मक अनुभव को भी जगह मिली है। प्रकाश पाल और राम प्रताप सिंह चौहान जैसे नेताओं को राज्यसभा भेजने से प्रदेश भाजपा के संगठन में नए चेहरों के लिए जगह बनेगी। दूसरी तरफ विद्यासागर सोनकर और प्रियंका सिंह रावत जैसे पूर्व जनप्रतिनिधियों को फिर से राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका मिली है। यही बदलाव आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में अगली पंक्ति के नेताओं को सामने लाने की प्रक्रिया से जुड़ता है।

बरेली से दो नाम, पूर्वांचल और पश्चिमी यूपी को भी जगह
भाजपा ने क्षेत्रीय संतुलन को भी साधने की कोशिश की है। धर्मपाल सिंह और श्रुति गंगवार दोनों बरेली क्षेत्र से आते हैं। धर्मपाल सिंह लोधी समाज से हैं, जबकि श्रुति गंगवार पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार की बेटी हैं।
पूर्वांचल से विद्यासागर सोनकर और गोपी कृष्ण पांडेय जैसे नाम हैं। राम प्रताप सिंह चौहान को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संगठनात्मक कामकाज का अनुभव है। वहीं बाराबंकी की पूर्व सांसद प्रियंका सिंह रावत अवध क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं।

आठवीं सीट के साथ संगठन की परीक्षा भी
राज्यसभा चुनाव में भाजपा के सामने आठ सीटें जीतने का लक्ष्य है। विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों में भाजपा और उसके सहयोगी आठ सीटों तक पहुंचने की स्थिति में बताए जा रहे हैं, जबकि क्रॉस वोटिंग और अनुपस्थिति चुनाव के गणित को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए 16 अक्टूबर का चुनाव भाजपा के लिए सिर्फ राज्यसभा में आठ नए चेहरे भेजने का मामला नहीं रहेगा। उसके बाद प्रदेश संगठन और सरकार में होने वाले फैसले भी महत्वपूर्ण होंगे। एक तरफ राज्यसभा में नई टीम होगी, दूसरी तरफ संगठन में नई जिम्मेदारियां तय करनी होंगी और धर्मपाल सिंह के स्थान पर सरकार में भी निर्णय लेना होगा।

NATIONAL : विवाद के बाद चुनाव आयोग का फॉर्म-6 पर बड़ा फैसला, Annexure-D अब नहीं देना होगा, जानें डिटेल्स

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विवादों के बाद चुनाव आयोग ने उन राज्यों में ऑनलाइन वोटर एनरोलमेंट फॉर्म 6 से SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न) से जुड़ी अतिरिक्त घोषणापत्र को हटा दिया है, जहां वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न पूरा हो चुका है। यह फैसला आयोग की पूरी टीम द्वारा यह तय किए जाने के कुछ दिनों बाद लिया गया कि यह ज़रूरत सिर्फ़ इस प्रक्रिया के दौरान ही लागू होगी। यह घोषणापत्र, जिसमें नए आवेदकों को खुद को या अपने माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी को पहले हुए इंटेंसिव रिविज़न के दौरान तैयार वोटर लिस्ट से जोड़ने वाली जानकारी देनी होती है, उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ECINET पोर्टल पर उपलब्ध रहेगा जहां SIR चल रहा है।

चुनाव आयोग ने पोर्टल से हटाया
जिन राज्यों में SIR पूरा हो चुका है, वहां ECINET ऐप और पोर्टल के साथ-साथ संबंधित मुख्य चुनाव अधिकारी के पोर्टल्स से भी यह अतिरिक्त घोषणापत्र हटा दिया गया है। अब एनरोलमेंट चाहने वाले आवेदकों को सिर्फ़ ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स, 1960’ के तहत तय कानूनी फॉर्म 6 भरना होगा। यह कदम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञान कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी वाली पूरी चुनाव आयोग टीम की 26 सितंबर की बैठक के बाद उठाया गया है।

बैठक के बाद, चुनाव आयोग ने कहा था कि फॉर्म 6 के साथ जुड़ा घोषणापत्र SIR के लिए था और “गैर-SIR अवधि के लिए, नियमों (रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स 1960) के अनुसार लागू फॉर्म का इस्तेमाल किया जाएगा”। यह मुद्दा तब विवाद का विषय बन गया जब पता चला कि संधू और जोशी ने फॉर्म 6 से जुड़े बदलावों पर आपत्ति जताई थी।
फॉर्म 6 वह कानूनी फॉर्म है जिसका इस्तेमाल योग्य नागरिक वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के लिए आवेदन करने के लिए करते हैं। जोशी ने फॉर्म में बदलावों पर इस आधार पर आपत्ति जताई थी कि ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स, 1960’ के तहत तय फॉर्म में नियमों में संशोधन किए बिना बदलाव नहीं किया जा सकता। संधू भी उनसे सहमत थे।
ECINET पर ऑनलाइन फॉर्म 6 प्रक्रिया में SIR से जुड़ा घोषणापत्र शामिल किए जाने के बाद, संधू ने फिर से आपत्ति जताई और इस बदलाव को “अनधिकृत/गैर-कानूनी” बताते हुए इसे हटाने की मांग की

हालांकि, अपने सार्वजनिक बयानों में चुनाव आयोग ने कहा है कि फॉर्म 6 में खुद कोई बदलाव नहीं किया गया था और घोषणापत्र SIR के लिए एक अतिरिक्त ज़रूरत थी। इसमें यह भी कहा गया है कि बिहार SIR पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में इस घोषणा को सही ठहराया था।
26 सितंबर को ये फ़ैसले तब लिए गए जब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने दावा किया कि संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से जुड़े फ़ैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई थी; उनका कहना था कि ये फ़ैसले उनकी जानकारी या सिफ़ारिश के बिना लिए गए थे।
आयोग ने 26 सितंबर के अपने बयान में कहा कि SIR से जुड़े आदेशों को तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से मंज़ूरी मिली थी।

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