Saturday, August 22, 2026
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NATIONAL : टीचर की क्रूरता: होमवर्क नहीं करने पर छह साल के बच्चे को जड़ा थप्पड़, अस्पताल में मौत; परिवार ने लगाए कई आरोप

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विशाखापत्तनम में छह साल के बच्चे की स्कूल में मौत के बाद हड़कंप मच गया। पुलिस के मुताबिक, होमवर्क पूरा नहीं करने पर शिक्षक ने बच्चे को थप्पड़ मारा, जिसके कुछ ही देर बाद वह कक्षा में गिर पड़ा। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मौत की असली वजह क्या थी? क्या स्कूल की लापरवाही सामने आएगी?

आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में छह साल के बच्चे की स्कूल की कक्षा में गिरने के बाद मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, बच्चे ने होमवर्क पूरा नहीं किया था। इसी बात पर शिक्षक ने उसे थप्पड़ मारा था। घटना वन टाउन इलाके के एक निजी स्कूल की बताई जा रही है। घटना के बाद बच्चे के परिजन स्कूल के बाहर पहुंचे और शिक्षक को उसकी मौत के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की।

CCTV में क्या दिखाई दे रहा है?
सोशल मीडिया पर वायरल सीसीटीवी फुटेज में बच्चा हाथ में स्लेट लिए शिक्षक के सामने कतार में खड़ा दिखाई दे रहा है। फुटेज में वह घबराया हुआ नजर आता है और शिक्षक से उसे न मारने की गुहार लगाता दिखता है। इसके बाद शिक्षक बच्चे को अपने पास खींचकर उसके गाल पर थप्पड़ मारती दिखाई देती है। कुछ ही सेकंड बाद बच्चा शिक्षक के ऊपर गिर जाता है।

स्कूल में बच्चे के गिरने के बाद क्या हुआ?
विशाखापत्तनम के राजस्व मंडल अधिकारी साधु दिलीप चक्रवर्ती ने बताया कि शिक्षक ने अन्य शिक्षकों को घटना की जानकारी दी। इसके बाद वे मौके पर पहुंचे और बच्चे को सीपीआर देने की कोशिश की। बाद में स्कूल स्टाफ बच्चे को नजदीकी अस्पताल ले गया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। अधिकारी के मुताबिक, शुरुआती तौर पर आशंका जताई गई कि बच्चा घबराहट के कारण कार्डियक अरेस्ट का शिकार हुआ।

किंग जॉर्ज अस्पताल की अधीक्षक डॉ. आई. वाणी ने कहा कि बच्चे को अस्पताल लाए जाने तक उसकी मौत हो चुकी थी। उन्होंने कहा कि उन्होंने भी सीसीटीवी वीडियो देखा है, लेकिन फिलहाल यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि बच्चे को घबराहट के कारण कार्डियक अरेस्ट हुआ या मौत की कोई दूसरी वजह थी। उन्होंने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत की सही वजह स्पष्ट हो सकेगी।

बच्चे के शव का क्या हुआ?
बच्चे के शव को पोस्टमार्टम के लिए किंग जॉर्ज अस्पताल भेजा गया। अस्पताल प्रशासन के मुताबिक, शुरुआत में बच्चे के माता-पिता ने पोस्टमार्टम के लिए सहमति नहीं दी थी। बाद में पुलिस की जानकारी के अनुसार, परिजनों ने पोस्टमार्टम के लिए सहमति दे दी। अस्पताल प्रशासन ने कहा कि रिपोर्ट आने के बाद ही मौत का सटीक कारण बताया जा सकेगा।

परिवार ने शिक्षक पर क्या आरोप लगाया?
बच्चे के पिता ने बताया कि उनका परिवार पिछले सप्ताह कुछ दिनों के लिए तीर्थयात्रा पर गया था और बुधवार को ही वापस लौटा था। इसी वजह से बच्चे का होमवर्क पूरा नहीं हो पाया था। उन्होंने कहा कि बच्चे को पहले से कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या नहीं थी। पिता ने सवाल उठाया कि UKG के बच्चे के साथ शिक्षक इस तरह का व्यवहार कैसे कर सकती हैं।

बच्चे की मां ने आरोप लगाया कि स्कूल प्रबंधन ने घटना की जानकारी परिवार को नहीं दी। उनके मुताबिक, स्कूल स्टाफ बच्चे को सीधे अस्पताल ले गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। परिवार ने शिक्षक और स्कूल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। स्कूल की ओर से मामले पर फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

पुलिस और शिक्षा विभाग ने क्या कदम उठाया?

वन टाउन पुलिस थाने के एक अधिकारी ने बताया कि मामले की जांच शुरू कर दी गई है। वहीं, विशाखापत्तनम जिला शिक्षा विभाग ने भी मामले की जांच शुरू की है। जांच में बच्चे की मौत की परिस्थितियों के साथ यह भी देखा जा रहा है कि स्कूल की ओर से किसी तरह की लापरवाही हुई थी या नहीं। RDO ने भी मामले में जांच कराने की बात कही है।अपनी

NATIONAL : महाराष्ट्र में खुले खाने के तेल की बिक्री पर पूरी तरह रोक! FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे का बड़ा फैसला, दिए कड़े निर्देश

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महाराष्ट्र में ‘सेफ फूड, सेफ महाराष्ट्र’ अभियान के तहत एफडीए कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने खुले खाद्य तेल की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। नियमों का उल्लंघन करने पर उम्रकैद और 10 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है।

महाराष्ट्र में खाद्य तेल व्यापार में सुरक्षा और मानकों के गंभीर उल्लंघनों को देखते हुए अन्न व औषधि प्रशासन (FDA) ने एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला लिया है। FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जानकारी दी कि राज्यभर में खुले और बिना पैक किए हुए खाद्य तेल की बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। राज्य में चलाए जा रहे “सेफ फूड, सेफ महाराष्ट्र” अभियान के तहत खाद्य तेल निर्माण, पैकेजिंग, परिवहन से लेकर खुदरा बिक्री तक की पूरी सप्लाई चेन के लिए नया कंप्लायंस ऑर्डर जारी कर दिया गया है।

पिछले साल जांचे गए नमूनों में मिले कई गंभीर उल्लंघन
कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने बताया कि राज्य में 1,247 खाद्य तेल नमूनों की जांच के दौरान बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां पाई गईं। इनमें से 77 नमूने मानक से कम पाए गए। 13 नमूने पूरी तरह असुरक्षित पाए गए, 15 नमूने मिसब्रांडेड घोषित किए गए। इस जांच अभियान के दौरान लगभग 3.20 लाख किलोग्राम असुरक्षित खाद्य तेल भी जब्त किया गया।

FDA के इस सख्त फैसले के 3 मुख्य कारण
FDA कमिश्नर के अनुसार, बाजार में खुले और घटिया तेल की बिक्री से आम जनता की सेहत को गंभीर खतरे पैदा हो रहे थे। बिना लेबल और बैच नंबर के मिलने वाले खुले तेल का सोर्स ट्रैक करना असंभव होता है। हवा और रोशनी के संपर्क में आकर यह जल्दी खराब होता है। इसमें आर्जेमोन या मिनरल ऑयल की मिलावट से एपिडेमिक ड्रॉप्सी (Epidemic Dropsy) जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है, जिससे हार्ट फेलियर, ग्लूकोमा और मृत्यु तक हो सकती है।

पेंट या ग्रीस के रसायनों वाले डिब्बों तथा जंग लगे सिंगल-यूज टिन के डिब्बों के उपयोग से मैटेलिक प्रदूषण होता है। इससे तेल में घुलने वाला लेड बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसके अलावा तलने के लिए तेल को बार-बार गरम करने से हानिकारक टोटल पोलर कंपाउंड्स (TPC) बनते हैं। नए तेल में TPC का स्तर 15% से कम होना चाहिए, और इस्तेमाल किए गए तेल में 25% से अधिक नहीं होना चाहिए। 25% से अधिक TPC वाला तेल कैंसर, हाइपरटेंशन, लिवर और किडनी की गंभीर बीमारियों का कारण बनता है।

नियमों के उल्लंघन पर कड़े दंड और सजा का प्रावधान
खाद्य सुरक्षा कानून के तहत नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अब कड़ी कार्रवाई की जाएगी। असुरक्षित भोजन बेचने या उपलब्ध कराने पर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम की धारा 59 के तहत उम्रकैद तक की सजा और 10 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। बिना लाइसेंस या पंजीकरण के खाद्य कारोबार संचालित करने पर 10 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है। मिलावटी पदार्थ रखने और भ्रामक विज्ञापन करने पर भी 10 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वहीं, मानक से कम खाद्य तेल बेचने पर 5 लाख तक और मिसब्रांडेड तेल बेचने पर 3 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

रिटेलर्स और कंपनियों के लिए नए निर्देश
पूरी सप्लाई चेन पर लागू: यह आदेश तेल के निकालने, प्रोसेसिंग, ट्रांसपोर्टेशन से लेकर बाजार में रिटेल बिक्री तक लागू रहेगा। अब केवल सही तरीके से लेबल की गई और सीलबंद पैकेजिंग ही बेची जा सकेगी। यदि सील टूटी या संदिग्ध पाई जाती है, तो रिटेलर को खेप रिजेक्ट करनी होगी, अन्यथा उन पर भी सीधी कार्रवाई होगी। खाद्य तेल व्यवसाय में शामिल कंपनियों के पास तय मानकों के अनुसार 8 से 9 अलग-अलग लाइसेंस होना अनिवार्य है।

NATIONAL : ‘छात्र अब अपनी बात कहने के लिए आगे आ रहे हैं, इसे रोका नहीं जा सकता’, राहुल गांधी का केंद्र पर सीधा प्रहार

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को कहा कि छात्र अब अपनी बात कहने के लिए आगे आ रहे हैं और इसे रोका नहीं जा सकता। उन्होंने छात्रों से इस ऊर्जा का इस्तेमाल देश के युवाओं के लिए बुनियादी बदलाव लाने में करने का आग्रह किया।

अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी का भारत का सपना, जिसमें हर कोई स्वराज के रास्ते पर चल सके, तभी पूरा हो सकता है जब सरकार युवाओं के लिए रास्ते खोले और देश उन्हें उस रास्ते पर चलने में मदद करे।

लोकसभा में विपक्ष के नेता ने भाजपा-संघ पर अल्पसंख्यकों पर हमले करने, आदिवासियों की जमीन छीनने और दलितों का उत्पीड़न करने का आरोप भी लगाया और कहा कि इन चीजों को बदलना जरूरी है।

उन्होंने कहा, “सरकार और देश का काम है आपकी कल्पनाओं के लिए रास्ते खोलना और आपको यह महसूस कराना, आपमें यह विश्वास और भरोसा जगाना कि सच क्या है। देश को उस रास्ते पर चलने में आपकी मदद करनी चाहिए। यही गांधीजी का भारत के लिए सपना है और यही स्वराज का रास्ता है।”

राहुल गांधी ने छात्रों का आह्वान करते हुए कहा कि भयमुक्त समाज का निर्माण केवल युवा ही कर सकते हैं। उन्होंने छात्रों को प्रेरित किया कि वे किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक कार्रवाई से डरे बिना शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अन्याय के खिलाफ एकजुट हों और अपनी मांगों को मजबूती से सरकार के सामने रखें।

BUSINESS : चीनी सस्ती हो सकती है, आयात टैक्स फ्री हुआ:दो महीने में 40% महंगी

करनाल ब्रेकिंग न्यूज : आने वाले दिनों में चीनी सस्ती हो सकती है। केंद्र सरकार ने इसके आयात को टैक्स फ्री कर दिया है। चीनी के लगातार बढ़ते दामों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने ये फैसला लिया है। ये छूट 31 अक्टूबर तक रहेगी। अभी चीनी रिटेल में ₹55 प्रति किलो के करीब बिक रही है।

खराब मौसम से गन्ना उत्पादन घटा, 8 साल बाद इम्पोर्ट

चीनी की किल्लत और दाम बढ़ने की मुख्य वजह मौसम की मार है। बारिश और सूखे के कारण गन्ने की फसल प्रभावित हुई है, क्योंकि गन्ने फसल को ज्यादा पानी की जरूरत होती है।

गन्ने का उत्पादन घटने और मांग बढ़ने से चीनी के दाम देशभर में पिछले दो महीनों में करीब 40% तक बढ़ गए हैं। आशंका है कि अगले तीन महीनों तक कीमतें ऊंचे स्तर पर ही रहेंगी।इस कारण करीब 8 साल बाद सप्लाई की कमी को पूरा करने के लिए चीनी का आयात किया जा रहा है।

त्योहारी सीजन में मांग पूरी करने की तैयारी

सरकार के आदेश के मुताबिक, चीनी की इस खेप का आयात आज से लेकर 31 अक्टूबर 2026 तक पूरा करना होगा।

मांग में बढ़ोतरी: भारत दुनिया में चीनी का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। अक्टूबर के दौरान देश में दिवाली और दुर्गा पूजा जैसे बड़े त्योहार आते हैं, जिसमें मिठाई, केक और पकवानों की भारी डिमांड के कारण शक्कर की खपत सबसे ज्यादा होती है। इसके अलावा, बिस्कुट और मिठाई कंपनियां भी चीनी का स्टॉक जमा करने लगती हैं।

त्योहारों पर राहत: त्योहारों से ठीक पहले बिना टैक्स के इतनी बड़ी मात्रा में चीनी बाजार में आने से सप्लाई चेन मजबूत होगी और हलवाइयों से लेकर आम जनता को महंगे दामों से राहत मिलेगी।

चीनी के निर्यात पर 30 सितंबर 2026 तक बैन रहेगा.सरकार ने देश में शक्कर की कमी न हो, इसलिए इसके निर्यात पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी है। यह रोक 30 सितंबर 2026 तक लागू रहेगी।सरकार ने चीनी को पूरी तरह प्रतिबंधित कैटेगरी में डाल दिया है, यानी अब सरकार की इजाजत के बिना कोई भी व्यापारी देश से बाहर चीनी नहीं बेच पाएगा।

कमोडिटी मार्केट के एक्सपर्ट्स और बाजार विश्लेषकों का मानना है कि भारत सरकार के इस फैसले का असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिखेगा। जैसे ही भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार से 10 लाख टन कच्ची चीनी की उठाएगा, ग्लोबल मार्केट में इसकी मांग अचानक बढ़ जाएगी।इसका सीधा असर लंदन और न्यूयॉर्क के कमोडिटी एक्सचेंजों में चीनी की बेंचमार्क कीमतों पर पड़ेगा और वहां आने वाले दिनों में शक्कर के दाम बढ़ सकते हैं।

देश में चीनी की किल्लत और दाम बढ़ने की मुख्य वजह मौसम की मार रही है। बारिश और सूखे के कारण गन्ने की फसल प्रभावित हुई है, क्योंकि गन्ने फसल को ज्यादा पानी की जरूरत होती है।उत्पादन घटने और मांग बढ़ने से चीनी के दाम बढ़ गए हैं। आशंका है कि अगले तीन महीनों तक कीमतें ऊंचे स्तर पर ही रहेंगी। पिछले दो महीनों में कीमतें करीब 40% बढ़ी।

NATIONAL : चंपत राय बोले-राम मंदिर निर्माण समिति अध्यक्ष ने मनमानी की:पूर्व IAS नृपेंद्र मिश्रा ने सलाह कभी नहीं मानी, अपनी पसंद के लोग चुने

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अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट से इस्तीफे के बाद चंपत राय ने गुरुवार को 9 पन्नों का दूसरा लेटर जारी किया। इसमें उन्होंने मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष और पूर्व IAS अधिकारी नृपेंद्र मिश्र की भूमिका को लेकर कई दावे किए हैं।

चंपत राय ने कहा, ‘राम मंदिर निर्माण के लिए बने ट्रस्ट में 15 ट्रस्टी थे और नृपेंद्र मिश्र को निर्माण समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। मिश्र के सुझाव पर लार्सन एंड टूब्रो (L&T) को मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी दी गई। भवनों के डिजाइन और निर्माण से जुड़े काम के लिए नोएडा की डिजाइन एसोसिएट फर्म का चयन भी किया।

चंपत राय ने कहा कि नृपेंद्र मिश्र ने निर्माण समिति में अपनी पसंद के लोगों को शामिल किया। इनमें से कुछ लोग छह साल के दौरान केवल एक-दो बार ही अयोध्या आए। पूर्व NBCC चेयरमैन अनूप मित्तल लगातार नृपेंद्र मिश्र के साथ निर्माण समिति की बैठकों में शामिल होते थे।

चंपत राय ने चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद 26 जून को महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया था। 6 जुलाई को ट्रस्ट की बैठक में इस्तीफा मंजूर किया गया था। उसी दिन चंपत राय ने एक लेटर जारी कर ट्रस्टी अनिल मिश्र पर गंभीर आरोप लगाए थे।

चंपत राय ने कहा कि मंदिर निर्माण से जुड़े फैसले समिति की बैठकों में लिए जाते थे, लेकिन कई मामलों में बाद में बदलाव किए गए और नृपेंद्र मिश्र के फैसलों को प्राथमिकता दी गई। कई मामलों में समिति के अन्य सदस्यों के सुझावों या फैसलों को महत्व नहीं दिया गया।

चंपत राय ने लिखा- लेटर में लिखा कि 1528 में बाबर की सेनाओं द्वारा राम जन्मभूमि मंदिर तोड़े जाने के बाद अयोध्या के संतों, स्थानीय राजाओं-रियासतों और गृहस्थ समाज की ओर से मंदिर की भूमि हासिल करने के लिए संघर्ष जारी रहा। 1949 में स्थानीय समाज द्वारा उस स्थान पर कब्जा किए जाने के बाद यह संघर्ष समाप्त हुआ।

1950 से 1989 के बीच स्थानीय अदालतों में चार वाद दायर किए गए। इन मुकदमों को वाद दायर करने वालों ने अपने स्तर पर लड़ा। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई की। करीब 15 साल चली सुनवाई के दौरान तीनों न्यायाधीशों ने स्वतंत्र रूप से अपने फैसले लिखे और कुल निर्णय करीब 8,500 पन्नों का रहा।सुप्रीम कोर्ट ने बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की। तीन सदस्यीय मध्यस्थता समिति बनाई गई थी। मार्च से जुलाई 2019 तक कई दौर की बैठकें हुईं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका।

इसके बाद 6 अगस्त 2019 से सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने नियमित सुनवाई शुरू की। 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया, जिसके बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र नाम से स्वतंत्र ट्रस्ट का गठन किया। इसमें कुल 15 ट्रस्टियों की व्यवस्था की गई। एक स्थान निर्मोही अखाड़ा और एक स्थान अनुसूचित जाति/जनजाति प्रतिनिधित्व के लिए सुरक्षित रखा। अयोध्या के जिलाधिकारी, उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर आईएएस अधिकारियों को पदेन न्यासी बनाए गया।

विश्व हिंदू परिषद के दिवंगत नेता अशोक सिंहल के मंदिर निर्माण से जुड़े सुझाव नृपेंद्र मिश्र को बताए गए। मंदिर निर्माण के लिए लार्सन एंड टुब्रो (L&T) का चयन किया गया। निर्माण की निगरानी के लिए टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (TCE) को चुना गया। मंदिर परिसर के दूसरे भवनों की डिजाइन के लिए नोएडा की डिजाइन एसोसिएट फर्म और उसके प्रमुख जय काकतीकर को जिम्मेदारी दी गई।

राम मंदिर में दर्शन से जुड़ी व्यवस्थाओं का उल्लेख

ट्रस्ट के वित्तीय लेन-देन का आंतरिक और वैधानिक ऑडिट कराया जाता है। वैधानिक ऑडिट दिल्ली की फर्म वी. शंकर अय्यर द्वारा किया जाता है।

रामपथ पर बिरला धर्मशाला के सामने यात्री सेवा केंद्र बनाया गया है। यहां पहले परिवहन निगम का बस अड्डा था। ट्रस्ट ने जमीन खरीदकर दो मंजिला प्री-फैब्रिकेटेड भवन बनवाया है।

22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद रोजाना 75 हजार से अधिक श्रद्धालु आ रहे हैं। महाकुंभ के दौरान रोजाना 3 लाख से अधिक श्रद्धालु रोज पहुंचे।

रामलला दर्शन के लिए 8 लाइन बनाई गई हैं। इनमें 1 विशिष्ट दर्शन, 1 सुगम या व्हीलचेयर दर्शन और 6 सामान्य लाइन हैं। सभी के रास्ते अलग हैं, जिससे क्रॉसिंग की स्थिति नहीं बनती।

VIP दर्शन के दौरान भी सामान्य श्रद्धालुओं का दर्शन जारी रहता है। राज्यपाल, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और न्यायाधीशों के लिए अलग व्यवस्था है।

असमर्थ श्रद्धालुओं के लिए मुफ्त व्हीलचेयर उपलब्ध है। भजन, कीर्तन, सुंदरकांड के लिए भी परिसर में फ्री व्यवस्था की जाती है।

ट्रस्ट के बैंक खातों में चेकबुक का इस्तेमाल नहीं होता। सभी भुगतान बैंक ट्रांसफर के जरिए होते हैं और नकद भुगतान नहीं किया जाता। ट्रस्ट के खाते SBI, PNB और बैंक ऑफ बड़ौदा में हैं।

NATIONAL : जेन जेड के बाद अब सड़क पर ताकत दिखा रहा है जेन अल्फा, देश भर में क्यों हो रहे हैं प्रदर्शन

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मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए होने वाली NEET और दूसरी परीक्षाओं के पेपर लीक के खिलाफ युवाओं ने कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था. इसके बाद तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया था. छात्रों के इस प्रदर्शन को जेन जेड या जेन जी का प्रदर्शन बताया गया. इसके बाद झारखंड की राजधानी में भी छात्रों ने प्रदर्शन किया. इसके 24 दिन बाद झारखंड सरकार ने कई प्रतियोगी परीक्षाओं और उनके परिणाम को रद्द करने का फैसला किया. इसे जेन जी छात्रों की जीत की तरह देखा जा रहा है. वहीं इस बीच देश के कई राज्यों ने जेन अल्फा (2010 के बाद पैदा हुए बच्चों) ने भी अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया है. ये सड़क,ट्रांसपोर्ट, बिजली-पानी और शिक्षकों की कमी जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं.कई राज्य सरकारों ने उनकी मांगों पर तेजी से कदम उठाकर उनकी समस्याओं का समाधान किया है.

दरअसल 2010 से 2024 के बीच पैदा हुए बच्चों को जेन- अल्फा का नाम दिया गया है. इस जेन अल्फा ने अपनी मांगों को लेकर उत्तर प्रदेश,बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश तक धरना-प्रदर्शन किया है. ये युवा अपने लिए बुनियादी सुविधाएं मांग रहे हैं. जेन अल्फा का सबसे ताजा प्रदर्शन लखनऊ में हुआ. बुद्धेश्वर-मोहान रोड पर स्थित जय प्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय की छात्राओं ने सोमवार सुबह जमकर प्रदर्शन किया. ये छात्राएं शिक्षकों की कमी, खराब भोजन,खराब स्वास्थ्य व्यवस्था के खिलाफ सड़क पर उतरीं. इन छात्रों ने अपने विद्यालय परिसर से चार किमी दूर दुबग्गा-कानपुर बाईपास चौराहे पर हरदोई-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग पर मूसलाधार बारिश के बीच धरने पर बैठ गईं. वहां इन छात्राओं ने नारेबाजी की. इससे वहां लंबा जाम लग गया. इसके बाद प्रशासन हरकत में आया और छात्राओं की समस्याओं के समाधान का आश्वासन दिया.

उत्तर प्रदेश में जेन अल्फा का सबसे पहला प्रदर्शन फतेहपुर में हुआ था. फतेहपुर के किशनपुर स्थित सर्वोदय इंटर कॉलेज के छात्र-छात्राओं ने स्कूल में बिजली, पंखे, शुद्ध पेयजल, साफ-सुथरे शौचालय, मिड-डे मील और बैठने के लिए बेंच जैसी सुविधाओं की मांग को लेकर सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया था. घटना की जानकारी पाकर जिला विद्यालय मौके पर पहुंचे. उन्होंने विद्यालय का निरीक्षण कर छात्रों की सभी मांगों को तत्काल पूरा करने निर्देश दिए.

वहीं उत्तर प्रदेश के ही हमीरपुर जिले में जेन-अल्फा ने हाथों में तिरंगा लेकर कलेक्ट्रेट के सामने प्रदर्शन किया था. ये बच्चे गांव की बदहाल सड़क को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे. उनका कहना था कि सड़क हमारी पढ़ाई और स्कूल के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है. उनका कहना था कि बरसात में इन बच्चों का स्कूल जाना बंद हो जाता है. अधिकारियों ने बच्चों को आश्वस्त किया कि सड़क का निर्माण कराया जाएगा. इसके बाद अधिकारी गांव में पहुंचे भी. इसका मतलब यह हुआ कि छात्रों के प्रदर्शन के बाद प्रशासन हरकत में आया.

वहीं राजस्थान में भी जेन अल्फा फार्म में चल रहा है. राजस्थान के अलवर के थानागाजी में स्कूल में शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं की बदहाली पर छात्राओं ने अधिकारियों से तीखे सवाल पूछे. इसका परिणाम यह हुआ कि प्रशासन को वहां सात नए टीचर तैनात करने पड़े. वहीं सिरोही में हॉस्टल के खाने की खराब गुणवत्ता को लेकर नंगे पैर पैदल चलते हुए 50 छात्राएं कलेक्ट्रेट पहुंच गईं.कलेक्टर ने उनकी बात सुनने के बाद जांच समिति का गठन किया और रोज खाने की गुणवत्ता जांचने का आदेश दिया.

बस का किराया बढ़ा तो छात्राओं ने कहा ‘एमएलए-जी, किराया कम करो’
मध्य प्रदेश के विदिशा में प्राइवेट बस ऑपरेटरों ने बस किराया बढ़ा दिया था. वो स्कूली बच्चियों का किराया 10 रुपये की जगह 25 रुपये वसूलने लगे थे. इसके विरोध में सिरोंज बस स्टैंड पर लड़कियों ने प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारी छात्राओं ने नारा लगाया,’एमएलए-जी, किराया कम करो.’ इसके बाद अधिकारियों की दखल के बाद पुराना किराया बहाल किया गया.

इसी तरह झारखंड के गढ़वा में एक शिक्षक के तबादले के विरोध में छात्र सड़क पर उतर आए. उन्हें समझाने पहुंचे प्रखंड प्रमुख ने एक छात्र को थप्पड़ मार दिया. इससे गुस्साए छात्रों ने उनकी गाड़ी तोड़ दी.

यह तो केवल कुछ उदाहरण है, जिनमें जेन अल्फा ने अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया है. इसके अलावा भी कई जगह जेन अल्फा अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरे. इसमें अच्छी बात यह है कि प्रशासन ने इन मामलों को संवेदनशीलता से हैंडल किया और जेन अल्फा की मांगों को प्राथमिकता के आधार पर सुलझाया.

NATIONAL : अमित शाह शुक्रवार को आयेंगे बंगाल, तीन दिवसीय दौरे में केंद्रीय गृह मंत्री करेंगे सीमा सुरक्षा की समीक्षा

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीन दिवसीय दौरे पर पश्चिम बंगाल पहुंच रहे हैं. इस दौरे में वे उत्तर और दक्षिण बंगाल के सीमावर्ती इलाकों, विशेषकर ‘चिकेन नेक’ की सुरक्षा का जायजा लेंगे.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह शुक्रवार को तीन दिवसीय दौरे पर पश्चिम बंगाल आ रहे हैं. पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद केंद्रीय गृहमंत्री का यह दूसरा दौरा है. अपने इस दौरे में केंद्रीय गृह मंत्री उत्तर व दक्षिण बंगाल में विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होंगे. जानकारी के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 17 जुलाई की उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी स्थित बागडोगरा एयरपोर्ट पहुंचेंगे और वहां सिलीगुड़ी स्थित बीएसएफ के कैंप में ठहरेंगे. इसको लेकर सभी प्रशासनिक तैयारियां पूरी कर ली गयी हैं.

चिकेन नेक की सुरक्षा को लकर करेंगे समीक्षा
जानकारी के अनुसार, 18 जुलाई को केंद्रीय गृह मंत्री उत्तर बंगाल के दो बीएसएफ कैंपों का दौरा करेंगे. इसके बाद दोपहर एक बजे से उत्तरकन्या में उत्तर बंगाल के सीमावर्ती इलाकों विशेष कर चिकेन नेक की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण बैठक करेंगे. बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री अमित शाह बागडोगरा से कोलकाता एयरपोर्ट आयेंगे. इसके बाद 19 जुलाई यानी रविवार को दक्षिण बंगाल के सभी सीमावर्ती जिलों के पुलिस अधीक्षकों (एसपी) और जिलाधिकारियों के साथ बैठक करेंगे.

पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ही करेंगे बैठक
तीन दिवसीय बंगाल प्रवास के दौरान गृह मंत्री नेशनल लाइब्रेरी में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होंगे. इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री विश्व बांग्ला कन्वेंशन सेंटर में राज्य भाजपा के सांसदों, विधायकों और वरिष्ठ नेताओं के साथ महत्वपूर्ण बैठक करेंगे. बैठक का मुख्य उद्देश्य राज्य में पहली बार सत्ता में आयी भाजपा सरकार के जनप्रतिनिधियों को शासन और संगठन की अलग-अलग भूमिकाओं को स्पष्ट करना है.

NATIONAL : जंतर-मंतर प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पुलिस कार्रवाई की जांच के लिए 5 सदस्यीय कमेटी गठित

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जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई के आरोपों की जांच के लिए रिटायर्ड जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय हाई पावर कमेटी (HPEC) का गठन किया है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कमेटी के गठन का आदेश दिया। कमेटी में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रवि शंकर झा, दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व जस्टिस शलिंदर कौर, CBI के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के पूर्व DGP एल.आर. बिश्नोई भी शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी को CJP विरोध प्रदर्शनों से जुड़े विभिन्न पहलुओं की तथ्यात्मक जांच करने का जिम्मा दिया है। अदालत ने विशेष रूप से पुलिस की कथित ज्यादतियों, प्रदर्शनकारियों की हिंसा और महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न और छेड़छाड़ के आरोपों की जांच को प्राथमिकता देने की सिफारिश की है। कमेटी यह भी देख सकती है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल तो नहीं किया। इसके साथ ही भीड़ नियंत्रण के दौरान पुलिस और सुरक्षाकर्मियों की वर्दी, नेमप्लेट और कार्रवाई के तरीके से जुड़े मुद्दों की भी जांच की जा सकती है।

याचिकाकर्ताओं ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ धातु के प्रोजेक्टाइल या पेलेट्स के इस्तेमाल पर रोक लगाने, पुलिस कार्रवाई को संतुलित और उचित बनाए रखने तथा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कथित निगरानी की जांच की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि जांच केवल प्रदर्शनकारियों की शिकायतों तक सीमित नहीं रहेगी। बल्कि पुलिस की शिकायतों पर भी समान रूप से विचार किया जाए। इन शिकायतों में पुलिस और अन्य सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ प्रदर्शनकारियों द्वारा कथित बल और हिंसा का इस्तेमाल, जंतर-मंतर पर संपत्ति को नुकसान और ड्यूटी के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों तथा उनके परिवारों को हुए मानसिक और भावनात्मक नुकसान के मुद्दे शामिल हैं।

NATIONAL : शाह बोले- ब्रह्मपुत्र, कावेरी और गोदावरी को जोड़ने से भारत में अगले 100 वर्षों तक पानी की नहीं होगी कमी

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को मामल्लापुरम के पास कोवलम के होटल में 31वीं दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें दक्षिणी राज्यों के नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों ने अंतर्राज्यीय विवादों, सुरक्षा और विकास प्राथमिकताओं पर चर्चा की।

दक्षिणी राज्य देश की तरक्की के मुख्य आधार हैं। इन राज्यों की तरक्की पानी पर निर्भर करती है। चाहे खेती हो, उद्योग हों, स्वस्थ नागरिक हों या पर्यावरण—इन चारों क्षेत्रों में पानी इस इलाके की जान है। अपने राज्य के हितों की रक्षा करना गलत नहीं है, लेकिन अगर हितों की रक्षा की प्रक्रिया में राज्यों को वर्षों तक पानी न मिले और वह बस समुद्र में बह जाए, तो इससे कोई असल फायदा नहीं होता। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि ब्रह्मपुत्र से लेकर कावेरी और गोदावरी तक बड़ी नदियों को आपस में जोड़ने से यह पक्का हो सकता है कि भारत में अगले 100 वर्षों तक पानी की कमी न हो।

इन मामलों को सुलझाने पर बनी सहमति
शाह ने गुरुवार को तमिलनाडु के महाबलीपुरम में दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की 31वीं बैठक की अध्यक्षता करते हुए यह बात कही है। उन्होंने कहा, इस पहल से कई जलमार्ग भी बन सकते हैं। इससे न सिर्फ ईंधन की बचत होगी और पर्यावरण बेहतर होगा, बल्कि एक सस्ता ट्रांसपोर्ट सिस्टम भी मिलेगा। केंद्रीय गृह मंत्री ने जल शक्ति मंत्रालय, गृह मंत्रालय, अंतर-राज्य परिषद और संबंधित राज्यों की संयुक्त बैठकों के ज़रिए दक्षिणी राज्यों से जुड़े पानी के लंबित मुद्दों को जल्द सुलझाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। दक्षिणी राज्य, आपसी बातचीत और रचनात्मक समाधानों के ज़रिए पानी से जुड़े इन लंबित विवादों को जल्द सुलझाने के गृह मंत्री के सुझाव से सहमत हुए। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच संपत्ति और देनदारियों के बंटवारे से जुड़े मुद्दों पर, दोनों राज्य गृह मंत्रालय के साथ बातचीत करके इन मामलों को सुलझाने पर सहमत हुए।

दक्षिण भारत ने हर क्षेत्र में योगदान दिया
शाह ने कहा कि दक्षिण भारत का यह क्षेत्र देश के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि चाहे साहित्य, अनुसंधान और विकास, अंतरिक्ष, आईटी, एआई, औद्योगिक विकास या कृषि हो, दक्षिण भारत ने हर क्षेत्र में योगदान दिया है। दक्षिण भारत ने देश के आईटी, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स और बुनियादी ढांचे के विकास में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है और इसीलिए दक्षिण में भारी मात्रा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी आया है। दक्षिण भारत की पूरी विकास यात्रा तीन स्तंभों पर आधारित रही है। उच्च साक्षरता दर, प्रशिक्षित कार्यबल और गहरे समुद्र के उपयोग में तकनीकी विशेषज्ञता। इन तीन स्तंभों ने दक्षिण भारत को देश के विकास में सबसे बड़ा योगदानकर्ता बनाया है। दक्षिण भारत के लोगों और सरकारों ने नवाचार और राजस्व सृजन के क्षेत्रों में कई बेहतरीन परंपराएं भी स्थापित की हैं। उन्होंने कहा कि पूरे भारत को इन दो क्षेत्रों में दक्षिण भारत से सीखना चाहिए।

60 साल से लंबित कई मुद्दों को सुलझाया गया
अमित शाह ने कहा कि 2014 से ज़ोनल काउंसिल को एक सार्थक मंच बनाने की कोशिशें की गई हैं। ज़ोनल काउंसिल असल में एक संवैधानिक व्यवस्था है, जो लंबे समय तक धीरे-धीरे सिर्फ़ एक औपचारिकता बनकर रह गई थी। 2004-2014 और 2014-2026 के समय की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि पहले काउंसिल की साल में औसतन ढाई बैठकें होती थीं, जबकि अब हर साल छह बैठकें होती हैं। 2014 से अब तक ज़ोनल काउंसिल की कुल 70 बैठकें हुई हैं, जिनमें 1,869 में से 1,445 मुद्दों (लगभग 80%) का समाधान किया गया। ज़ोनल काउंसिल की इन बैठकों के ज़रिए 60 साल से लंबित कई मुद्दों को सुलझाया गया है। उत्तर भारत में नदी के पानी के बंटवारे से जुड़े आठ में से पांच मुद्दे ब्रिटिश काल से पहले से चले आ रहे थे। पांच महीने पहले एक अंतिम समझौता हुआ और कश्मीर से लेकर उत्तर प्रदेश तक फैले सभी मुद्दों (100%) को सुलझाकर विवाद-मुक्त उत्तर भारत का लक्ष्य हासिल कर लिया गया है।

कम करनी होगी स्कूल छोड़ने की दर
गृह मंत्री ने कहा कि कुपोषण, स्टंटिंग (बच्चों का शारीरिक विकास रुकना) और स्कूल छोड़ने की दर (ड्रॉपआउट रेश्यो) हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। स्कूल छोड़ने की दर को कम करने के मामले में हमें 100 प्रतिशत से कम किसी भी चीज़ से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। अभी पूरे देश में स्कूल छोड़ने की दर 9.5 है, और अगर सभी राज्य थोड़ा-थोड़ा भी सुधार करें, तो हम इसे 3 प्रतिशत से नीचे ला सकते हैं। उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रीय ड्रॉपआउट दर 3 प्रतिशत से नीचे चली जाती है, तो बच्चे शिक्षित नागरिक बनेंगे और देश में संविधान की भावना को सही मायने में ज़मीनी स्तर तक लागू करने के लिए एक अनुकूल माहौल बनेगा। हम स्टंटिंग, यानी बच्चों का शारीरिक विकास रुकने की और भी खतरनाक समस्या की ओर बढ़ रहे हैं। यह धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही है जो हमारी आने वाली पीढ़ियों की क्षमताओं को नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए, हमें कुपोषण और स्टंटिंग को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए।

NATIONAL : पीएम मोदी ने केंद्रीय सचिवों संग की हाई लेवल मीटिंग, 4 घंटे की बैठक में क्या बात हुई?

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केंद्रीय कैबिनेट में फेरबदल की चर्चाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने केंद्रीय सचिवों संग हाई लेवल मीटिंग की। चार घंटे तक चली इस बैठक में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।

केंद्रीय कैबिनेट में फेरबदल की चर्चाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज मंगलवार को केंद्रीय सचिवों संग अहम बैठक की। इस मीटिंग में सभी केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों के सचिव शामिल हुए। कैबिनेट सचिव के अलावा, इस बैठक में प्रधानमंत्री के दो प्रधान सचिव, पी.के. मिश्रा और शक्तिकांत दास एवं सभी प्रमुख विभागों के सचिव भी शामिल हुए। बैठक में सुधार एजेंडे पर व्यापक चर्चा पर ध्यान केंद्रित किया गया, क्योंकि सरकार अगली पीढ़ी के प्रशासनिक और आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ा रही है।

पीएम मोदी और केंद्रीय सचिवों के बीच हुई इस चार घंटे की बैठक में कई प्रमुख विषयों पर चर्चा हुई। मुख्य रूप से ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’, डिजिटल गवर्नेंस, नियमों में ढील और ‘लास्ट-माइल डिलीवरी’ (सेवाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने) जैसे विषयों पर फोकस किया गया।

बैठक में क्या बात हुई?
बैठक के दौरान सचिवों ने अपने-अपने मंत्रालयों और विभागों द्वारा इन दोनों क्षेत्रों में उठाए जा रहे कदमों की जानकारी दी। उन्होंने प्रधानमंत्री के विजन को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए किए जा रहे प्रयासों, विभिन्न क्षेत्रों की चुनौतियों और भविष्य की रणनीतियों पर भी जानकारी दी। साथ ही शासन और सेवा वितरण को अधिक प्रभावी बनाने के उपायों पर चर्चा की गई।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सरकार के सभी विभागों को ‘होल-ऑफ-गवर्नमेंट’ दृष्टिकोण अपनाते हुए आपसी तालमेल के साथ काम करना चाहिए और विभागीय सीमाओं (साइलो) को खत्म करना चाहिए। उन्होंने एकीकृत योजना और बेहतर समन्वय के लिए पीएम गतिशक्ति प्लेटफॉर्म के व्यापक उपयोग पर जोर दिया। ताकि विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय बढ़े और निर्णय प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो।

प्रधानमंत्री ने सचिवों से यह भी कहा कि सरकारी योजनाओं का मूल्यांकन केवल उनके क्रियान्वयन से नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि आम लोगों के जीवन पर पड़ने वाले ठोस और सकारात्मक प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।

मौजूदा वित्त वर्ष में सचिव स्तर की पहली बैठक
मौजूदा वित्त वर्ष में प्रधानमंत्री के साथ सचिव-स्तर की यह पहली बड़ी बैठकों में से एक है। इसे 2026 की दूसरी छमाही के लिए सरकार की मुख्य नीतिगत प्राथमिकताओं के साथ नौकरशाही को एक सीध में लाने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

यह समीक्षा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र सरकार ने हाल ही में रेलवे सहित कई मंत्रालयों में ’52 सप्ताह में 52 सुधार’ जैसी महत्वाकांक्षी पहल शुरू की है, जिसमें इन्हें लागू करने की समय-सीमा स्पष्ट रूप से तय की गई है।

प्रधानमंत्री मोदी ने हमेशा तय समय-सीमा के भीतर परिणाम हासिल करने के महत्व पर जोर दिया है, जिससे समय-समय पर समीक्षा सरकार के कामकाज का एक अहम हिस्सा बन गई है।

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