Monday, September 14, 2026
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NATIONAL : दिल्ली आएंगे 10 देशों के मेहमान, भारत का कूटनीतिक इम्तिहान; एजेंडा क्या और कितनी चुनौतियां?

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18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में 11 देशों के प्रतिनिधि भारत पहुंचेंगे। हालांकि, ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी छवि से बचाना भारत की असल चुनौती होगी। नजरें 12-13 सितंबर को होने वाले शिखर सम्मेलन पर टिकी हैं।

भारत की मेजबानी में 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले पश्चिम के भू-राजनीतिक गलियारों में यह बहस तेज हो रही है कि क्या इस समूह का उद्देश्य पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था को चुनौती देना है। एक तरफ ब्रिक्स के विस्तार ने इसे वैश्विक दक्षिण की बड़ी आवाज बनाया है, वहीं पश्चिम में ऐसी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि यह संगठन किसी नए शीत युद्ध के अखाड़े में तब्दील न हो जाए। ऐसे में भारत की असल चुनौती ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी धड़े वाली छवि से बचाने की होगी।

पश्चिम विरोध ब्लॉक की छवि से बचना बड़ी चुनौती
यूएई, मिस्र और ईरान जैसे देशों से ब्रिक्स का दायरा बढ़ा है, लेकिन इस विस्तार ने इसके वैचारिक अंतर्विरोध भी सतह पर ला दिए हैं। रूस और चीन ब्रिक्स को डॉलर के वर्चस्व को तोड़ने और पश्चिमी संस्थानों के विकल्प के तौर पर पेश करते हैं। इससे पश्चिमी नीति-निर्माताओं में इसे एक पश्चिम विरोध ब्लॉक के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। पश्चिमी मीडिया से लेकर अंतरराष्ट्रीय थिंक-टैंक तक अपने विश्लेषणों में यही अंदेशा जताते रहे हैं। ईरान जैसे देशों की मौजूदगी इस धारणा को और हवा देती है।

भारत का कूटनीतिक इम्तिहान
ब्रिक्स की बैठक भारत की कूटनीतिक भूमिका का असली इम्तिहान है। भारत हमेशा बहुपक्षीय कूटनीति पर चलता आया है। क्वॉड के जरिये अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में गहरी साझेदारी, तो ब्रिक्स के मंच से विकासशील दुनिया के अधिकारों की पैरवी।
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भारत के लिए ब्रिक्स किसी के खिलाफ खड़ा किया गया मोर्चा होने की बजाये वैश्विक शासन प्रणालियों, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और आईएमएफ में सुधार लाने का जरिया रहा है।

विकास का एजेंडा
राजधानी दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन भारत मंडपम में किया जाएगा जिसकी थीम है-लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण।
भारत की कोशिश है कि इसमें भू-राजनीतिक टकराव के मुद्दे को दरकिनार कर व्यावहारिक व विकास-केंद्रित एजेंडे को तरजीह दी जाए।
डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, हरित ऊर्जा संक्रमण और आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे जैसे विषयों को आगे बढ़ाकर भारत यह संदेश देने की कोशिश करेगा कि ब्रिक्स का एजेंडा प्रतिरोध की बजाय समावेशी विकास का है।
ब्रिक्स देशों में कितने नाम?
ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के अलावा ब्रिक्स देशों में साल 2024 में पांच और देश- मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जुड़े। 2025 में इंडोनेशिया को भी इस समूह से जोड़ा गया। ऐसे में 11 देशों के इस समूह के प्रतिनिधि भारत की राष्ट्रीय राजधानी पहुंचेंगे।

NATIONAL : ब्रिक्स बदलेगा दुनिया की आर्थिक व्यवस्था?: पेजेश्कियान बोले- अमेरिका का दबदबा खत्म करने के लिए बना ये संगठन

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ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने ब्रिक्स को लेकर बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि यह समूह अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंधों और उसके दबदबे को चुनौती देने के लिए बनाया गया है। उन्होंने ब्रिक्स देशों से प्रतिबंधों से अलग व्यापार और सहयोग की व्यवस्था बनाने की अपील की। साथ ही ईरान ने भारत के साथ चाबहार के जरिए आर्थिक और क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाने की इच्छा जताई। ऐसे में क्या ब्रिक्स अमेरिका के आर्थिक प्रभाव को सच में चुनौती दे सकता है? आइए, विस्तार से जानते हैं उन्होंने और क्या कुछ कहा…

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने शनिवार को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान कहा कि ब्रिक्स का उद्देश्य अमेरिका की ओर से लगाए जाने वाले एकतरफा प्रतिबंधों का मुकाबला करना है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी देश पर प्रतिबंध लगा देता है। पेजेश्कियान के मुताबिक ब्रिक्स इसी तरह के दबदबे को तोड़ने के लिए बनाया गया है। उन्होंने कहा कि सदस्य देशों को ऐसा व्यापार और सहयोग विकसित करना चाहिए, जो किसी एक देश के फैसले या प्रतिबंध पर निर्भर न हो।

क्या ब्रिक्स अमेरिका के एकतरफा फैसलों को चुनौती देना चाहता है?
पेजेश्कियान ने कहा कि ब्रिक्स देशों को एक-दूसरे की मदद और समर्थन करना चाहिए, ताकि एकतरफावाद का मुकाबला किया जा सके। उनका कहना है कि सदस्य देशों के बीच व्यापार और आर्थिक संबंधों को इस तरह बढ़ाया जाना चाहिए कि किसी एक देश के प्रतिबंधों से पूरी व्यवस्था प्रभावित न हो। उन्होंने अमेरिका के एकतरफा रवैये को रोकने की जरूरत बताई और कहा कि ब्रिक्स का मकसद ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें देशों को व्यापार और आर्थिक सहयोग के लिए ज्यादा स्वतंत्रता मिले।

पश्चिम एशिया के संघर्ष पर ईरान ने अमेरिका पर क्या आरोप लगाया?
नई दिल्ली में ब्रिक्स नेताओं की बैठक के दौरान पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का मुद्दा भी सामने आया। शनिवार को अपनाए गए नई दिल्ली घोषणा पत्र में पश्चिम एशिया में बढ़ती हिंसा पर गंभीर चिंता जताई गई और अधिकतम संयम बरतने तथा विवादों के समाधान के लिए बहुपक्षीय रास्ता अपनाने की बात कही गई।

इसी बीच पेजेश्कियान ने ईरान पर युद्ध शुरू करने के आरोप को खारिज किया। उन्होंने कहा कि युद्ध ईरान ने शुरू नहीं किया, बल्कि अमेरिका ने हमला शुरू किया। उन्होंने दावा किया कि ईरान के राजनीतिक और सैन्य नेताओं, वैज्ञानिकों, छात्रों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया। पेजेश्कियान ने ईरान की बाद की सैन्य कार्रवाई को आत्मरक्षा बताया।

भारत और ईरान के बीच चाबहार को लेकर क्या बातचीत हुई?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पेजेश्कियान की ब्रिक्स सम्मेलन से इतर मुलाकात में पश्चिम एशिया की स्थिति के साथ व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क पर भी चर्चा हुई। मोदी ने कहा कि पश्चिम एशिया के विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति से होना चाहिए। उन्होंने समुद्री रास्तों और व्यापार की स्वतंत्रता तथा नाविकों की सुरक्षा के महत्व पर भी जोर दिया। वहीं पेजेश्कियान ने चाबहार बंदरगाह को भारत और ईरान के बीच सहयोग का अहम केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि ईरान भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण जगह पर है और उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम को जोड़ने वाले रास्ते के रूप में काम कर सकता है।

NATIONAL : मतभेद विवाद न बनें… मोदी-जिनपिंग की बैठक में 10 बड़ी बातें, LAC से व्यापार तक रिश्तों पर मंथन

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पीएम मोदी और शी जिनपिंग की अहम बैठक में भारत-चीन रिश्तों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से आगे बढ़ाने पर सहमति बनी।LAC पर शांति, सीमा विवाद के समाधान, व्यापार असंतुलन, बाजार पहुंच और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने समेत कई अहम मुद्दों पर दोनों नेताओं ने चर्चा की।

नई दिल्ली: BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच शनिवार को अहम द्विपक्षीय बैठक हुई। दोनों नेताओं ने अगस्त 2025 में तियानजिन में हुई पिछली मुलाकात के बाद भारत-चीन संबंधों में हुई लगातार प्रगति का स्वागत किया। बातचीत में दोनों देशों के रिश्तों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से देखने, मतभेदों को विवाद में नहीं बदलने, सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति-स्थिरता बनाए रखने और व्यापारिक संबंधों से जुड़ी चिंताओं को दूर करने जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई।

  1. रिश्तों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से देखने पर जोर
    दोनों नेताओं ने दोहराया कि भारत और चीन को अपने द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से देखना चाहिए। साथ ही इस बात पर जोर दिया गया कि दोनों देशों के बीच मौजूद मतभेद विवाद का रूप नहीं लेने चाहिए।

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  1. ‘तीन आपसी बातों’ पर पीएम मोदी का जोर
    विदेश मंत्रालय के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दोनों पक्षों को आपसी सम्मान, आपसी संवेदनशीलता और आपसी हित के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। भारत-चीन संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए इन तीनों बातों के महत्व पर प्रधानमंत्री ने विशेष जोर दिया।
  2. सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता जरूरी
    पीएम मोदी ने स्पष्ट किया कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के निरंतर विकास का जरूरी आधार बनी हुई है। उन्होंने सीमा से जुड़े मुद्दों पर मौजूदा समझौतों और समझ का पालन करने की जरूरत पर भी जोर दिया।
  3. सीमा विवाद के समाधान को लेकर प्रतिबद्धता
    दोनों नेताओं ने सीमा विवाद के निष्पक्ष, उचित और आपसी सहमति वाले समाधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। इसके साथ ही कहा गया कि समाधान दोनों देशों के समग्र द्विपक्षीय संबंधों के राजनीतिक नजरिए और दोनों देशों के लोगों के दीर्घकालिक हितों पर आधारित होना चाहिए।
  4. लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर जोर
    बैठक में दोनों देशों के लोगों के बीच संबंधों में हुई प्रगति पर भी ध्यान दिया गया। दोनों नेताओं ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान, व्यावसायिक संबंधों और लोगों की आवाजाही को और बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया।
  5. व्यापार असंतुलन की चिंताओं को दूर करने की बात
    आर्थिक और व्यापारिक संबंधों पर चर्चा के दौरान दोनों पक्षों की चिंताओं को दूर करने की जरूरत पर बल दिया गया। इनमें संरचनात्मक व्यापार असंतुलन और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
  6. बाजार तक सार्थक और अनुमानित पहुंच पर जोर
    दोनों नेताओं ने सार्थक और अनुमानित बाजार पहुंच को आसान बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया। आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए एक-दूसरे की चिंताओं को दूर करने पर सहमति जताई गई।
  7. क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की सहमति
    मोदी और जिनपिंग इस बात पर सहमत हुए कि दोनों देशों को क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर आपसी सहमति वाले क्षेत्रों का विस्तार जारी रखना चाहिए। साथ ही सामने आने वाली चुनौतियों से निपटने में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।
  8. जिनपिंग ने BRICS में सहयोग की जरूरत बताई
    शी जिनपिंग ने कहा कि मुश्किल अंतरराष्ट्रीय माहौल और आपस में जुड़े बदलावों एवं चुनौतियों के बीच चीन और भारत, दुनिया के दो सबसे अधिक आबादी वाले देश और ग्लोबल साउथ के अहम सदस्य होने के नाते बड़ी जिम्मेदारियां निभाते हैं। उन्होंने दोनों पक्षों से BRICS के व्यापक फ्रेमवर्क के भीतर उच्च गुणवत्ता वाले सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए मिलकर काम करने की अपील की।
  9. BRICS अध्यक्षता में चीन के समर्थन की पीएम मोदी ने सराहना की
    प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की BRICS अध्यक्षता के लिए चीन के समर्थन और BRICS शिखर सम्मेलन 2026 की सफलता में उसके योगदान की सराहना की। दोनों नेताओं की यह बैठक ऐसे समय हुई है जब दोनों देश द्विपक्षीय संबंधों में हुई प्रगति को आगे बढ़ाने के साथ क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर आपसी सहयोग के क्षेत्रों को विस्तार देने पर जोर दे रहे हैं।

NATIONAL : मोदी-जिनपिंग की मुलाकात, साझा घोषणापत्र और गाला डिनर, BRICS समिट के पहले दिन की 10 बड़ी बातें

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नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स समिट का पहला दिन कई मायनो में बहुत खास रहा। सात साल बाद पीएम मोदी की शी जिनपिंग से मुलाकात हुई। ब्रिक्स का साझा घोषणापत्र जारी हुआ और फिर गाला डिनर भी हुआ। जानें पहले दिन की 10 बड़ी बातें…

दो दिवसीय 18वें ब्रिक्स समिट की मेजबानी इस बार भारत की राजधानी नई दिल्ली में हुई। ब्रिक्स समिट के पहले दिन समिट में शामिल देशों ने AI, क्रॉस बॉर्डर पेमेंट, एकतरफा प्रतिबंधों, UNSC सुधार समेत कई खास मुद्दों पर चर्चा की। पहले दिन की सबसे खास बात ये रही कि ब्रिक्स देशों ने अपना साझा घोषणापत्र जारी किया और इससे भी खास बात ये रही कि सात साल बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए। ब्रिक्स में भाग लेने के लिए पीएम मोदी ने शी जिनपिंग सहित सभी नेताओं का आभार व्यक्त किया।

गलवान झड़प के बाद ब्रिक्स समिट में शामिल होने चीन के राष्ट्रपति पहली बार भारत आए। ब्रिक्स से इतर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक भी हुई। द्विपक्षीय वार्ता के दौरान, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कई बड़ी बातें कहीं।


चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, बैठक के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि भारत और चीन एक-दूसरे की खूबियों से सीख सकते हैं और साझा विकास हासिल कर सकते हैं, दोनों देशों को साथ मिलकर काम करना चाहिए।
BRICS के साझा घोषणापत्र में सदस्य देशों ने जंग और टकराव रोकने, बातचीत और कूटनीति के जरिए अंतर्राष्ट्रीय विवादों का समाधान करने और वैश्विक मुद्दों पर सभी देशों के नजरिए का सम्मान करने पर जोर दिया।

साझा घोषणा में एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों पर भी चिंता जताई गई, इन्हें WTO नियमों के खिलाफ बताया गया और इस घोषणा में BRICS के सदस्य देशों ने आतंकवाद, आतंकवाद की फंडिंग और आतंकियों को सुरक्षित पनाह मिलने जैसी चुनौतियों से निपटने के संकल्प को भी लिए।
घोषणा में सदस्य देशों ने आतंकवाद के सभी रूपों और तरीकों की कड़ी निंदा की और जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले की भी निंदा की।
घोषणापत्र में आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने, आतंकियों की जवाबदेही तय करने और सं आतंकवादियों और आतंकी संगठनों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने की अपील को दोहराया गया।

पीएम मोदी ने BRICS समिट में कहा कि एआई, साइबर स्पेस, आउटर स्पेस, बायो टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल टेक्नोलॉजीज भविष्य के अवसरों के साथ वैश्विक नियम भी तय कर रहे हैं। ऐसे में ग्लोबल साउथ की समान भागीदारी जरूरी है।
BRICS घोषणापत्र में एकतरफ़ा आर्थिक और सेकेंडरी प्रतिबंधों की निंदा की गई और इस बात पर ज़ोर दिया गया कि इनसे विकास, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा और मानवाधिकारों को नुकसान पहुंच सकता है।

BRICS के सदस्य देशों ने एकतरफ़ा टैरिफ़, नॉन-टैरिफ़ बाधाओं और अन्य संरक्षणवादी उपायों पर भी चिंता जताई।
BRICS समिट के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने मिडिल ईस्ट में जारी जंग को लेकर कहा कि मिडिल ईस्ट की जंग से इस क्षेत्र के लोगों को गंभीर नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि यह जंग अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साझा हितों के मुताबिक नहीं है।

NATIONAL : ब्रिक्स करेंसी पर बड़ा बयान: क्या साझा मुद्रा की जगह स्थानीय करेंसी में ही होता रहेगा व्यापार? सामने आया जवाब

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नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समापन के बाद विदेश मंत्रालय ने साझा ब्रिक्स करेंसी को लेकर उठ रही तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया है। विदेश मंत्रालय में सचिव (आर्थिक संबंध) सुधाकर दलेला ने शनिवार को स्पष्ट किया कि वर्तमान में ब्रिक्स देशों के लिए एक साझा मुद्रा लाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। उन्होंने बताया कि सदस्य देशों का मुख्य ध्यान द्विपक्षीय व्यापार को अपनी-अपनी स्थानीय मुद्राओं में निपटाने पर केंद्रित रहेगा, जिससे लेन-देन की लागत को कम किया जा सके।

साझा ब्रिक्स मुद्रा को लेकर विदेश मंत्रालय ने क्या रुख साफ किया?
18वें ब्रिक्स सम्मेलन के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए विदेश मंत्रालय के सचिव सुधाकर दलेला ने कहा कि ब्रिक्स के भीतर साझा मुद्रा बनाने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार के निपटान पर काफी समय से चर्चा चल रही है और यह कोई नया विषय नहीं है।

विदेश मंत्रालय के अनुसार, स्थानीय मुद्रा में व्यापार निपटान का मुख्य उद्देश्य मौजूदा वैश्विक भुगतान और सेटलमेंट प्रणाली को बदलना या हटाना नहीं है। इसके बजाय, इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार ढांचे के पूरक के रूप में देखा जा रहा है ताकि दो देशों के बीच होने वाले कारोबार की लागत को घटाया जा सके और समग्र वैश्विक व्यापार में सुधार किया जा सके।

‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ में व्यापार निपटान को लेकर क्या सहमति बनी?
18वें ब्रिक्स सम्मेलन में अपनाए गए ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ में ब्रिक्स स्थानीय मुद्राओं के माध्यम से व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए जारी चर्चाओं को स्वीकार किया गया है। घोषणापत्र में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि सभी सदस्य देशों की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का सम्मान किया जाएगा, क्योंकि इस मामले में ‘सबके लिए एक ही नियम’ लागू नहीं हो सकता।

स्थानीय मुद्रा में व्यापार के व्यावहारिक क्रियान्वयन के लिए गठित ‘ब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स’ (बीपीटीएफ) को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए हैं:
क्रॉस-बॉर्डर सिस्टम का अध्ययन: टास्क फोर्स भुगतान और मैसेजिंग चैनलों के क्रॉस-बॉर्डर इंटरऑपरेबिलिटी का अध्ययन कर रही है।
सुरक्षित और पारदर्शी विकल्प: बीपीटीएफ को ऐसे व्यावहारिक समाधानों पर काम जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया है जो तेज, कम लागत वाले, अधिक सुलभ, कुशल, पारदर्शी और सुरक्षित हों।

भारत की अध्यक्षता में हो रही 18वें सम्मेलन की प्रमुख बातें क्या?
भारत की 8 महीने की अध्यक्षता के दौरान 350 से अधिक बैठकें आयोजित की गईं। ये बैठकें विभिन्न मंत्रालयों, कार्य समूहों, विषयगत क्लस्टरों और व्यापारिक सत्रों के स्तर पर संपन्न हुईं।

सम्मेलन के दौरान ब्रिक्स नेताओं ने वर्तमान वैश्विक संघर्षों और आर्थिक अनिश्चितताओं के प्रभाव पर भी विस्तार से चर्चा की। इसमें निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर आम सहमति रही:

कूटनीति और संवाद पर जोर: सभी नेताओं ने मतभेदों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए कूटनीति और वार्ता को अनिवार्य बताया।
लेन-देन लागत में कमी: क्रॉस-बॉर्डर व्यापार को सुगम और सस्ता बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया।
ब्रिक्स के इस रुख का वैश्विक व्यापार पर क्या असर होगा?
विदेश मंत्रालय के इस बयान से साफ है कि ब्रिक्स देश किसी नई साझा मुद्रा की जगह अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं को व्यापार में प्राथमिकता देंगे। स्थानीय मुद्राओं में सौदों का निपटान होने से सदस्य देशों के कारोबारियों के लिए मुद्रा विनिमय दर का जोखिम और ट्रांजैक्शन कॉस्ट कम होगी। आगे चलकर ब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स की प्रगति यह तय करेगी कि सदस्य देशों के बीच भुगतान प्रणाली कितनी तेज और सुरक्षित बनती है।

NATIONAL : BRICS घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा, भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत

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घोषणा पत्र के 40वें नंबर पर पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र है. इसमें लिखा है कि आतंकवाद का कोई भी कृत्य निंदनीय है, चाहे उसके पीछे कोई भी मकसद हो. काउंटर टेररिज्म पर ब्रिक्स ने बड़ा ऐलान किया है.

BRICS समिट के समापन सत्र में 12 सितंबर 2026 को दिल्ली डिक्लेरेशन 2026 को सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी गई. ब्रिक्स घोषणापत्र में भारत की कूटनीतिक जीत हुई है, जिसमें पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई. डिक्लेरेशन में आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस पर जोर दिया गया, जिसमें कहा गया कि आतंकवाद की कोई वजह स्वीकार्य नहीं है.

BRICS घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा

घोषणा पत्र के 40वें नंबर पर पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र है. इसमें लिखा है, ‘हम आतंकवाद के किसी भी कृत्य की निंदा करते हैं. इसे आपराधिक और किसी भी परिस्थिति में अनुचित मानते हैं, चाहे उसके पीछे कोई भी मकसद हो, कहीं भी हो या किसी के द्वारा किया गया हो. हम 22 अप्रैल 2025 को जम्मू कश्मीर में हुए आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे.’ इसमें लिखा है कि हम आतंकवाद के सभी रूपों का मुकाबला करने के लिए प्रतिबद्ध है.

चीन, रूस समेत ब्रिक्स के सभी देशों ने पहलाम आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा की. घोषणा पत्र में कहा गया, ‘आप किसी का धर्म देखकर हत्या नहीं कर सकते.’ ये सीधे तौर पर पाकिस्तान पर आरोप लगाया गया है क्योंकि वहां के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने हिंदुओं पर अटैक को लेकर आपत्तिजनक बात कही थी. इस हमले से ठीक पहले मुनीर ने ये बयान दिया था.

काउंटर टेररिज्म पर ब्रिक्स का बड़ा ऐलान

डिक्लेरेशन में कहा गया है कि हम ब्रिक्स काउंटर टेररिज्म वर्किंग ग्रुप (CTWG) और उसके पांच उप-समूहों की गतिविधियों का स्वागत करते हैं. साथ ही आतंकवाद विरोधी गतिविधियों को और मजबूत करने की अपेक्षा करते हैं.’ यानी कि CTWG के जरिए अब आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए ब्रिक्स देश आगे बढ़ेंगें.

ब्रिक्स को अभी तक इकोनॉमिकल ग्रुप यानी कि आर्थिक गठबंधन माना जाता था. ब्रिक्स अब उससे आगे निकलकर काउंटर टेररिज्म के लिए सिक्योरिटी के लिहाज से भी ये महत्वपूर्ण हो गया है. इस बात पर भी जोर दिया गया है कि कैसे काउंटर टेररिज्म के मुद्दे को यूएन में ला जाया जाए. खासकर पहलगाम आतंकी को. इसमें कहा गया है कि जस्टिस तभी मिल पाएगा जब आतंक को फंडिंग करने वालों को खत्म किया जाए. उसी को लेकर ब्रिक्स के डिक्लेरेशन में इसे शामिल किया गया है.

BUSINESS : सस्ती हो चुकी है चीनी, फिर भी दुकानों पर ज्यादा दाम क्यों?

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Sugar Price: चीनी के दाम को लेकर आम आदमी के मन में कई बड़े सवाल उठ रहे हैं. खासतौर से ये कि अगर मील में चीनी सस्ती है तो जनता को ये महंगे भाव पर क्यों मिल रही है. आइये इसके बारे में डिटेल में जानते हैं.

चीनी की कीमतों को लेकर आम लोगों को अभी भी राहत नहीं मिल रही है. दरअसल, चीनी मिल से निकलने के बाद इसकी कीमत में बड़ी गिरावट आ चुकी है, लेकिन दुकानों तक पहुंचते-पहुंचते रेट महंगा हो जाता है. इसी को लेकर अब चीनी मिलों ने अब खुद सवाल उठाए हैं.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी की एक्स-मिल कीमत करीब 30 फीसदी तक गिर चुकी है. यानी जिस चीनी को मिल से करीब 67 रुपये प्रति किलो तक बेचा जा रहा था, उसकी कीमत अब करीब 47 रुपये प्रति किलो तक आ गई है. इसके बावजूद खुदरा बाजार में चीनी अभी भी 60 रुपये से ज्यादा प्रति किलो बिक रही है.

क्या होता है एक्स-मिल कीमत?
एक्स-मिल कीमत वो कीमत है जिस पर चीनी मिल से निकलते समय चीनी बेची जाती है. इसके बाद इसमें थोक कारोबारी, ट्रांसपोर्ट और रिटेलर का मार्जिन जुड़ता है और फिर ये ग्राहक तक पहुंचती है. इसलिए मिल पर कीमत कम होने के तुरंत बाद दुकान पर भी उतनी ही कीमत कम हो जाए, ऐसा जरूरी नहीं है. लेकिन इस बार मिलों का कहना है कि दोनों कीमतों के बीच का अंतर जरूरत से ज्यादा बना हुआ है.

मिलों ने क्यों उठाया सवाल?
चीनी उद्योग का कहना है कि जब मिल स्तर पर चीनी की कीमत तेजी से कम हो गई है तो खुदरा बाजार में भी इसका असर दिखना चाहिए था. उद्योग के मुताबिक बाजार में चीनी की कोई कमी नहीं है और सप्लाई भी है. ऐसे में ग्राहकों को अभी भी 60-65 रुपये देना पड़ रही है तो ये गलत है.

हालांकि, खुदरा कीमतों में गिरावट आने में थोड़ा समय लग सकता है. इसकी एक वजह ये है कि दुकानदारों और कारोबारियों के पास पहले से खरीदा हुआ पुराना स्टॉक हो सकता है, जिसे उन्होंने ज्यादा कीमत पर खरीदा था.

सरकार ने क्या किया?
चीनी की कीमतों में अचानक आई तेजी को रोकने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं. इनमें 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति देना और जमाखोरी पर नजर रखना शामिल है. सरकार ने थोक खरीदारों के लिए स्टॉक रखने की लिमिट फिक्स की है.

दुकानों पर कब सस्ती होगी चीनी?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसका फायदा आम ग्राहक को कब मिलने वाला है. इसके जवाब में ऐसा कह सकते हैं कि एक्स-मिल कीमतों में गिरावट का असर धीरे-धीरे थोक और फिर खुदरा बाजार में दिखाई देगा ही.

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, खुदरा कीमतों में अगले कुछ दिनों में और गिरावट आने की उम्मीद है. हालांकि, ये गिरावट कितनी होगी, ये इस बात पर डिपेंड करता है कि कारोबारी नया स्टॉक किस कीमत पर खरीदते हैं और बाजार में सप्लाई कितनी तेजी से बढ़ती है.

MAHARASHTRA : मुंबई के लालबाग के राजा को कहा जाता है मन्नतों का राजा, 89 साल से हो रही है इनकी पूजा

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आजकल देशभर में गणेश चतुर्थी मनाया जा रहा है, और इस उत्सव को मुंबई में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। यहां पर कई पंडाल लगाए जाते हैं, जिनमें से एक है लालबाग के राजा, जिनकी पूजा यहां भक्तों द्वारा काफी अच्छे से की जाती है।

आजकल देशभर में गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाया जा रहा है। शास्त्रों में भगवान गणेश को सबसे पहले पूजनीय बताया गया है, इसलिए हर अवसर पर आप खुद देखते होंगे कि उनकी पूजा सबसे पहले की जाती है। इस पावन त्योहार को तो महाराष्ट्र में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है, यही नहीं यहां कई गणेश पंडाल लगाए जाते हैं, जहां लोग काफी संख्या में पूजा करने के लिए आते हैं। उन्हीं में से एक हैं लालबागचा राजा मुंबई की सबसे प्रतिष्ठित गणपति मूर्ति है और मुंबईवासी हर साल लालबाग में गणपति बप्पा के दर्शन करने के लिए आते हैं। लालबागचा की कहानी कई दशक पुरानी है, चलिए आज हम आपको लालबागचा राजा के कुछ दिलचस्प तथ्यों के बारे में बताते हैं।

इस अवसर के दौरान गणेश की मूर्ति को मुंबई के लालबाग में रखा जाता है। लालबागचा राजा गणेशोत्सव मंडल की स्थापना बहुत साल पहले वर्ष 1934 में मुंबई के लालबाग बाजार में की गई थी। इस मंडल की स्थापना के लिए कुछ मछुआरे और व्यापारी एक साथ तैयारी में जुटते हैं।

कांबली जूनियर लालबागचा राजा गणेश की मूर्ति के पीछे के कलाकार और मूर्तिकार हैं। इस प्रक्रिया में उनके बेटे भी उनकी मदद करते हैं। आपको बता दें, कांबली आर्ट वर्कशॉप हर साल 18-20 फीट की मूर्ति बनाने की बेहतरीन जगह है। सपनों के शहर में गणपति को पूरी भव्यता के साथ मनाया जाता है। कांबली परिवार 89 साल से मूर्ति बना रहा है।

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89 साल का जश्न – 89 Years Of Celebration
89 साल का जश्न – 89 Years Of Celebration
साल 2022 में भव्य गणेश चतुर्थी उत्सव के 89 वर्ष पूरे हो चुके हैं। मुंबई वासी 1934 से लालबागचा राजा के साथ महाराष्ट्र के इस उत्सव में सबसे सबसे प्रसिद्ध त्योहार का आनंद ले रहे हैं। इस दौरान लाखों भक्त सड़कों पर घूमते हैं और ढोल नगाड़ों की थाप पर नाचते हैं।

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10 दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव का समापन शहर के चारों ओर लोगों की हजारों भीड़ के साथ शुरू होता है। अनंत चतुर्दशी 10 दिवसीय गणेश चतुर्थी उत्सव का अंतिम दिन है, जहां भक्त मूर्ति को विसर्जित करने के लिए एक साथ इकट्ठा होते हैं। इस साल अनंत चतुर्दशी 9 सितंबर को मनाई जाएगी।

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मुंबई कैसे पहुंचे –
मुंबई कैसे पहुंचे –
हवाईजहाज से – मुंबई पूरे भारत के शहरों और दुनिया भर के देशों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। इसमें एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के साथ-साथ घरेलू उड़ानें भी हैं।

ट्रेन से – पूर्व में विक्टोरिया टर्मिनस के रूप में जाना जाने वाला, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन मुंबई का मुख्य रेल है। यह सभी प्रमुख शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है ।

सड़क से – मुंबई और बेंगलुरु, सूरत, नासिक, पुणे, हैदराबाद, अहमदाबाद, वडोदरा, मैंगलोर, कोच्चि और गोवा जैसे शहरों के बीच बस सेवाएं नियमित रूप से चलती हैं। टिकटों की बुकिंग की सुविधा के लिए कुछ बस ऑपरेटरों की अपनी वेबसाइटें हैं।

ENTERTAINMENT : ‘कांतारा’ से ‘हनुमान अंश’ तक, कम बजट की फिल्मों ने करोड़ों कमाए; क्या दिखी भक्ति की शक्ति?

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इन दिनों सिनेमाघरों में दशर्क भक्ति पर आधारित फिल्में खूब पसंद कर रहा है। इसमें बड़ा चमत्कार ‘हनुमान अंश’ ने कर दिया है। मात्र 2 करोड़ में बनी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर 205.15 करोड़ का ग्रॉस कलेक्शन कर चुकी है। मतलब यह अपनी लागत से 100 गुना से भी ज्यादा कमा चुकी है। जानिए ऐसी ही कुछ पौराणिक फिल्मों के बारे में, जिन्होंने दर्शकों को खूब लुभाया।

‘हनुमान अंश’ आस्था पर बनी ऐसी पहली फिल्म नहीं है जो कम बजट में बनी और बॉक्स ऑफिस पर छा गई। इससे पहले कई फिल्में यह कमाल दिखा चुकी हैं। इन फिल्मों ने साबित किया है कि भारतीय आध्यात्मिकता और लोककथाओं से जुड़ी कहानियां अब सिर्फ दर्शकों की भावनाएं नहीं छू रहीं, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी करोड़ों की बारिश कर रही हैं।

कांतारा (2022)
ऋषभ शेट्टी की यह फिल्म लोक आस्था, कर्नाटक की संस्कृति और इंसान-प्रकृति के रिश्ते को केंद्र में रखती है। फिल्म ने स्थानीय परंपराओं और आध्यात्मिकता को बड़े सिनेमाई अनुभव में बदलकर दिखाया कि क्षेत्रीय जड़ें भी पैन-इंडिया अपील बना सकती हैं।
सिर्फ 16 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने सैकनिल्क के अनुसार, वर्ल्डवाइड 407 करोड़ रुपये का बिजनेस किया था।

हनु-मान (2024)
प्रशांत वर्मा की यह सुपरहीरो फिल्म भारतीय पौराणिक संदर्भों को मॉडर्न सुपरहीरो कहानी के साथ जोड़ती है। हनुमान जी की शक्ति और भक्ति को आधार बनाकर फिल्म ने दिखाया कि देसी माइथोलॉजी को नए अंदाज में पेश करने पर दर्शकों का जबरदस्त जुड़ाव मिल सकता है। फिल्म के कलेक्शन की बात करें, तो मात्र 40 करोड़ के बजट में बनी इस मूवी ने सैकनिल्क के मुताबिक, 295.29 करोड़ रुपये का बिजनेस किया था।

महावतार नरसिम्हा (2024)
भगवान विष्णु के नरसिम्हा अवतार की पौराणिक कथा पर आधारित इस फिल्म ने भारतीय धार्मिक कथाओं को एनिमेशन के जरिए बड़े पर्दे तक पहुंचाया था। इसका आकर्षण खास तौर पर इस बात में है कि यह प्राचीन कथा को आधुनिक विजुअल ट्रीटमेंट के साथ पेश करती है। 40 करोड़ के बजट में बनी इस मूवी ने भी सैकनिल्क के अनुसार, दुनियाभर में 326.82 करोड़ रुपये का कारोबार किया था।

हनुमान अंश (2026)
7 अगस्त को सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म ‘हनुमान अंश’ बॉक्स ऑफिस पर छाई हुई है। सिर्फ 2 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने 37 दिनों में घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 173.63 करोड़ का बिजनेस कर लिया है। वहीं देशभर में इसक ग्रॉस कलेक्शन 205.15 करोड़ रुपये हो चुका है। अब 11 सितंबर को यह वर्ल्डवाइड भी रिलीज हो चुकी है। फिल्म में नीम करौली बाबा के जीवन की कहानी और चमत्कार को दिखाया गया है।

ग्राफिक्स के जरिए समझिए इन फिल्मों का बजट और कलेक्शन

कार्तिकेय 2 (2022)
निखिल सिद्धार्थ स्टारर यह फिल्म पौराणिक रहस्य, इतिहास और एडवेंचर को एक साथ पिरोती है। भगवान कृष्ण से जुड़े रहस्यों की खोज के जरिए फिल्म ने माइथोलॉजी को एक मिस्ट्री-एडवेंचर की शक्ल दी और क्षेत्रीय सिनेमा से निकलकर व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंच बनाई। मात्र 15 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने सैकनिल्क के अनुसार, दुनियाभर में 117.87 करोड़ का कारोबार किया था।

BUSINESS : FASTag यूजर्स के लिए बड़ी सुविधा: स्टिकर बदले बिना बदल सकेंगे बैंक, जानें OneTag का तरीका

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अब फास्टैग यूजर वाहन पर लगा स्टिकर बदले बिना अपना बैंक बदल सकेंगे। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने शुक्रवार को ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026 में वनटैग सुविधा शुरू की। इसके तहत यूजर अपना मौजूदा फास्टैग दूसरे बैंक में ट्रांसफर कर सकेंगे। टैग, टैग आईडी और वाहन रजिस्ट्रेशन नंबर वही रहेगा। वनटैग को इंडियन हाईवेज मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने मिलकर विकसित किया है।

अभी बैंक बदलने के लिए पुराने फास्टैग को बंद कर नया खाता खोलना और नया स्टिकर लेना पड़ता है। वनटैग से यह प्रक्रिया खत्म हो जाएगी। यह सुविधा एनएचएआई के राजमार्गयात्रा ऐप के जरिए मिलेगी। बैंक बदलने के लिए यूजर की पात्रता और पहचान की जांच होगी। इसके बाद यूजर अपनी पसंद का नया बैंक चुनकर प्रक्रिया पूरी कर सकेगा। पुराने बैंक की जिम्मेदारी पुराने वॉलेट के रिफंड और लंबित लेनदेन का निपटारा करने की होगी। पोर्टेबिलिटी पूरी होने के बाद नया बैंक फास्टैग की सेवाएं संभालेगा।

वनटैग से टोल प्लाजा की मौजूदा व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं होगा। फास्टैग से टोल भुगतान पहले की तरह एनईटीसी नेटवर्क के जरिए ही होगा। टोल प्लाजा पर वाहन चालकों को कोई नई प्रक्रिया नहीं अपनानी होगी। एनपीसीआई नए बैंक की जानकारी एनईटीसी नेटवर्क में अपडेट करेगा। सरकार को उम्मीद है कि इस सुविधा से बार-बार नए फिजिकल फास्टैग बनाने, भेजने और दोबारा जारी करने की जरूरत कम होगी। इससे संसाधनों की भी बचत होगी।

भारत में फास्टैग की पहुंच 98 फीसदी से ज्यादा है। अब तक करीब 13 करोड़ एनईटीसी फास्टैग जारी किए जा चुके हैं, जिनमें करीब 6 करोड़ सक्रिय हैं। फास्टैग रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन तकनीक से काम करता है। टोल प्लाजा से गुजरते समय जुड़े खाते से टोल राशि अपने आप कट जाती है।

फास्टैग से सरकार को हर साल 25 हजार करोड़ तक फायदा

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा, फास्टैग आधारित इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन व्यवस्था पूरी तरह लागू होने से सरकार को हर साल 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक का फायदा होगा। उन्होंने कहा कि मार्च 2027 तक राष्ट्रीय राजमार्गों के सभी टोल बूथ बैरियर-फ्री कर दिए जाएंगे।

गडकरी ने ग्लोबल फिनटेक फेस्ट में कहा कि फास्टैग के इस्तेमाल से टोल बूथों की आय में करीब 10 फीसदी यानी 7,000 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है। इससे टोल से होने वाली आय अब 82,000 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई है। उन्होंने कहा कि जिन टोल बूथों पर बैरियर-फ्री व्यवस्था का परीक्षण चल रहा है, उससे भी 10 फीसदी यानी 7,000 से 8,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होने की उम्मीद है।

टोल बूथ चलाने की परिचालन लागत भी घटकर 2-3 फीसदी रह गई है, जो पहले करीब 12 फीसदी थी। गडकरी ने कहा कि इस साल दिसंबर के अंत तक 70 फीसदी से ज्यादा टोल बूथ बैरियर-फ्री हो जाएंगे। मार्च 2027 तक सभी टोल बूथों को इस व्यवस्था में लाने का लक्ष्य है। फास्टैग से वाहन चालकों को समय और ईंधन की भी बचत हो रही है। गडकरी ने कहा कि अध्ययनों के मुताबिक सिर्फ ईंधन खर्च में हर साल 5,250 करोड़ रुपये से ज्यादा की बचत हुई है। गडकरी ने तकनीक क्षेत्र से ट्रकों में ओवरलोडिंग का पता लगाने के लिए तकनीकी समाधान विकसित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि देश के माल ढुलाई क्षेत्र में पारदर्शिता की कमी है और सरकार इस दिशा में काम करेगी।

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