NATIONAL : भारत ‘नो फर्स्ट यूज’ का हिमायती जबकि PAK की पॉलिसी में ‘फुल स्पेक्ट्रम डिटरेंस’, क्या है ये जो पड़ोसी देश को बनाता है खतरनाक?

0
68

पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है. भारत के सिंधु जल समझौता रद्द करने से भड़के पाक नेता आक्रामक बयानबाजियों पर उतर आए. यहां तक कि वे परमाणु हमले की धमकी तक देने लगे. इस्लामाबाद दरअसल फुल स्पेक्ट्रम डिटरेंस का समर्थक है, जो कि बंदर के हाथ में उस्तरे से अलग नहीं.

कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) के आतंकियों ने भारतीय पर्यटकों की हत्या कर दी. टीआरएफ के तार पाकिस्तान से जुड़े मानते हुए दिल्ली ने इस्लामाबाद पर कई सख्तियां की. जवाबी हमला बोलते हुए पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने आशंका जताई कि दोनों देशों के पास परमाणु ताकत है, और चीजें बिगड़ीं तो बड़ी मुश्किल आ सकती है.

फिलहाल दुनिया के कई देश जंग से जूझ रहे हैं, और कमोबेश यही हालात भारत-पाकिस्तान के भी दिखने लगे. कयास लग रहे हैं कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत चुप नहीं बैठेगा, और कार्रवाई होने पर पाकिस्तान भी हार मानकर सीधे बैठ नहीं जाएगा. इसमें सबसे खतरनाक बात ये है कि पाकिस्तान के पास भी न्यूक्लियर ताकत है, और उसने नो फर्स्ट यूज (एनएफयू) पॉलिसी पर साइन भी नहीं किए हैं.

भारत की नीति एनएफयू की है. ये एक आधिकारिक एलान है जिसके तहत कोई देश ये वादा करता है कि वो दुश्मन पर न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल पहले नहीं करेगा, बल्कि केवल जवाबी हमला करेगा. वहीं पाकिस्तान इस तरह की कोई पॉलिसी नहीं मानता. यहां तक कि वो अक्सर ही अपने हथियारों की ढींग भी हांकता है.

एनएफयू की बजाए पाकिस्तान ने फुल स्पेक्ट्रम डिटरेंस का अधिकार ले रखा है. अगर उसपर कोई हमला हो, तो वो तय कर सकता है कि जवाबी कार्रवाई उसी लेवल के हमले से होगी, या परमाणु अटैक भी हो सकता है. यानी छुटपुट हमले के जवाब में भी वो दुश्मन पर परमाणु बम गिरा दे, या बायो वॉर छेड़ दे, इसका विकल्प उसके पास है.

किसी भी देश में न्यूक्लियर वेपन्स का कंट्रोल किसके पास है, ये बेहद गोपनीय रखा जाता है. इस्लामाबाद में भी ये हाइली क्लासिफाइड इंफॉर्मेशन के तहत आता है. हालांकि माना जाता है कि वहां परमाणु हथियारों का कंट्रोल नेशनल कमांड अथॉरिटी (एनसीए) के पास है, जिसे लीडर खुद प्रधानमंत्री होते हैं. उन्हें मिलाकर ये 10 सदस्यीय कमेटी होती है.

साल 2000 में एनसीए की नींव रखी गई ताकि पाकिस्तान में बन और बढ़ रहे न्यूक्लियर भंडार पर नजर रखी जा सके. एनसीए में पीएम के अलावा राष्ट्रपति, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, आर्मी-नेवी-एयर कमांडर शामिल हैं. जंग की स्थिति बनने पर ये सारे लोग मिलकर किसी फैसले तक पहुंच सकते हैं, लेकिन उसपर अंतिम मुहर पीएम और प्रेसिडेंट लगाएंगे. परमाणु हथियारों की लॉन्चिंग की जिम्मेदारी सेना पर होगी.

एनसीए के बनने से पहले पाकिस्तान में परमाणु जखीरे का पूरा लेखाजोखा सेना के पास हुआ करता था. काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन्स की रिपोर्ट के अनुसार, चूंकि प्रोग्राम बहुत खुफिया था, लिहाजा उसमें काम करने वाले वैज्ञानिक भी अलग-थलग रहते थे, और उन्हें सरकार को कोई जवाब देने की जरूरत नहीं होती थी.

रिसर्च लैब में काम करने वाले लीड साइंटिस्ट अब्दुल कादिर खान, जिन्हें पाकिस्तानी परमाणु हथियारों का जनक भी कहा गया, वे किसी को भी जवाब देने को बाध्य नहीं थे. नतीजा ये हुआ कि वैज्ञानिक गड़बड़ियां करने लगे. यहां तक कि खान ने खुद स्वीकारा कि उन्होंने काफी सारी तकनीक दूसरे देशों को दी थी, वो भी सरकारी मंजूरी के बगैर. बाद में इस सारी दिक्कतों को दूर करके पाकिस्तानी सरकार ने इसपर कंट्रोल पा लिया, और सेना के पास लॉन्च करने का ही रिमोट रहा.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here