NATIONAL : दिल्ली HC की BJP सरकार को फटकार, कंज्यूमर कोर्ट की दुर्दशा पर 21 दिन में जवाब मांगा

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दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया था कि जिला उपभोक्ता अदालतों में पीने के लिए शुद्ध पीने का पानी और शौचालय तक उपलब्ध नहीं हैं. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा बंद है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी की उपभोक्ता अदालतों की खराब हालात पर बीजेपी सरकार को फटकार लगाई है. हाईकोर्ट ने गुरुवार (15 मई) को एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद दिल्ली सरकार से इस बारे में डिटेल रिपोर्ट जवाब दाखिल करने को कहा है.

दरअसल, एक याचिकाकर्ता ने उपभोक्ता अदालतों के खराब हालात का मसला दिल्ली के हाईकोर्ट के सामने उठाया था. याची ने हाईकोर्ट से जिला उपभोक्ता अदालतों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) की सुविधा, पेयजल और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधासं तत्काल मुहैया कराने के लिए आदेश देने की मांग की थी.

दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की पीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली सरकार को तीन सप्ताह में डिटेल हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए दिए हैं. वहीं, याचिकाकर्ता को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है. अब यह मामला 17 सितंबर को दोबारा सुना जाएगा.

दिल्ली हाईकोर्ट में वकील एस.बी. त्रिपाठी ने जिला अदालतों की खस्ताहाल को ध्यान में रखते हुए एक याचिका दायर की थी. यानी ने आरोप लगाया था कि कोविड-19 के बाद से दिल्ली के 10 जिला उपभोक्ता अदालतों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई की सुविधा पूरी तरह बंद कर दी गई है.

याची ने दिल्ली हाईकोर्ट से कहा था कि इससे न केवल अधिवक्ताओं को परेशानी हो रही है, बल्कि आम उपभोक्ता भी अदालतों तक पहुंचने में मुश्किलें झेल रहे हैं. एक आरटीआई के जवाब में तीन उपभोक्ता आयोगों ने स्पष्ट किया कि उनके पास वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की कोई सुविधा नहीं है. 5G नेटवर्क की आवश्यकता है.

दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में यह भी कहा गया है कि जिला उपभोक्ता अदालतों में अधिवक्ताओं और आम जनता के लिए शुद्ध पीने का पानी और शौचालय तक उपलब्ध नहीं हैं. न्यायालय के पूर्व आदेशों के बावजूद इन बुनियादी सुविधाओं की घोर उपेक्षा की जा रही है, जिससे लोगों को अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ता है. याचिकाकर्ता एस.बी. ​त्रिपाठी ने मांग की है कि सभी जिला उपभोक्ता आयोगों में न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति तत्काल की जाए. ताकि लंबित मामलों की सुनवाई नियमित रूप से हो सके और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो.

 

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