Halloween 2025: गरुड़ पुराण से हैलोवीन तक, धार्मिक नजरिए से समझिए आत्माओं की यात्रा

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पश्चिमी देशों में 31 अक्टूबर को हैलोवीन मनाया जाता है. यह आत्मा, रहस्यमय शक्ति और मृत्यु के भय से जुड़ा पर्व है. लेकिन हैलोवीन की मूल भावना सनातन धर्म के गरुड़ पुराण से काफी मिलती है. पश्चिमी देशों में 31 अक्टूबर को हैलोवीन मनाया जाता है. यह आत्मा, रहस्यमय शक्ति और मृत्यु के भय से जुड़ा पर्व है. लेकिन हैलोवीन की मूल भावना सनातन धर्म के गरुड़ पुराण से काफी मिलती है.

पश्चिमी देशों में हैलोवीन को एक उत्सव की तरह सेलिब्रेट किया जाता है. लोग डरावने चेहरे बनाकर इस दिन को सेलिब्रेट करते हैं. लेकिन हैलोवीन की अजीबोगरीब परंपरा वाले इस फेस्टिवल की मूल भावना गरुड़ पुराण से काफी मेल खाती है.हैलोवीन की जड़ें प्राचीन सेल्टिक संस्कृति से जुड़ी है. इसके हैलोवीन की रात यानी 31 अक्टूबर को पूर्वजों की आत्माएं धरती पर आती हैं.

हैलोवीन पर लोग दीप जलाकर, भोजन रखकर और अजीबोगरीब मुखौटे पहनकर आत्माओं का सम्मान करते हैं, ताकि पूर्वजों का आशीर्वाद मिल सके और बुरी शक्तियां दूर रहें. इस तरह से मूल रूप से हैलोवीन भी आत्माओं की शांति और स्मरण से जुड़ा पर्व है.वहीं हिंदू धर्मग्रंथ उपनिषद, गीता और गरुड़ पुराण सभी आत्मा की शुद्धता और उसकी अनंत यात्रा का वर्णन करते हैं. गरुड़ पुराण में भी आत्मा की यात्रा, पुनर्जन्म और मोक्ष को लेकर गहरी आध्यात्मिक व्याख्या मिलती है.

यदि ध्यान दें तो हैलोविन और गरुड का मूल संदेश यही है कि आत्मा अमर है, उसका सम्मान करें. पश्चिमी संस्कृति हैलोवीन के माध्यम से और वहीं हिंदू धर्म में पितृपक्ष व अमावस श्राद्ध के माध्यम से पूर्वजों का स्मरण करती है.इस तरह से चाहे पश्चिमी देशों में हैलोवीन हो या फिर हिंदू धर्म के पितृपक्ष की मान्यताए, दोनो यही बताती है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक नई यात्रा की शुरुआत है.

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