रतलाम से भोपाल आई युवती ने बताया कि उसने कई बार भागने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रही. आखिरकार उसने ‘पढ़ाई और कोचिंग’ का बहाना बनाया. परिवार को लगा कि शहर जाकर वह और ‘ मोटी कमाई’ करेगी, इसलिए उन्होंने उसे घर की चौखट लांघने की इजाजत दे दी. इसी मौके का फायदा उठाकर वह भोपाल भाग आई.
“14 बरस की रही होऊंगी तब, जब एक दिन एक अनजान शख्स मेरे घर के उस कमरे में दाखिल हुआ जिसे मैं अपना सुरक्षित ठिकाना समझती थी. जब तक कुछ सोच पाती या किसी को पुकार पाती, दरवाजा बंद हो चुका था… उस दिन के बाद जो हुआ, वह बताने लायक नहीं है. आज भी सोचती हूं तो बदन ही नहीं, रूह तक सिहर उठती है.”
यह दास्तां उस 21 बरस की युवती की है, जो मध्य प्रदेश के मालवा इलाके के रतलाम स्थित अपने गांव के उस ‘नरक’ को पीछे छोड़कर राजधानी भोपाल पहुंची है, जिसे उसका समाज ‘रिवाज’ कहता है.पीड़िता ने जो खुलासा किया वह किसी भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक है. उसने बताया कि 14 साल की उम्र से लेकर 21 साल तक लगभग हर दिन अनजान दरिंदे उसके घर आते रहे. वह कोई चोरी-छिपे होने वाला अपराध नहीं था, बल्कि उसके अपने माता-पिता और मामा उन दरिंदों से चंद कागजी नोटों का ‘परमिट’ लेकर उन्हें घर के अंदर दाखिल करवाते थे.

जब उसने अपनी बड़ी बहनों या मां से इस जुल्म की शिकायत की, तो उसे यह कहकर खामोश कर दिया गया- ‘यही हमारे समाज की रवायत है.’ बाछड़ा समाज की इस कुप्रथा ने उसके घर को ही एक ऐसी ‘मंडी’ बना दिया था, जहां उसकी अस्मत का सौदा हर रोज 200-500 रुपए में होता था.
युवती ने भोपाल के महिला थाने में अपनी आपबीती सुनाते हुए समाज के उस ढांचे पर चोट की, जहां पुरुष कोई काम-धंधा नहीं करते. उसने बताया, “मेरे भाई और पिता घर के बाहर बैठे रहते थे. वे कोई काम नहीं करते, क्योंकि उनकी पूरी गृहस्थी हम बेटियों की ‘कमाई’ पर टिकी थी. उनके लिए हम इंसान नहीं, बल्कि नोट छापने की मशीन थे.”
21 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उस युवती ने तय कर लिया कि “हर रोज किश्तों में मरने से बेहतर है कि एक बार मर लिया जाए.” उसने घर से निकलने की एक खतरनाक योजना बनाई. उसने अपने लालची परिजनों को यकीन दिलाया कि वह शहर जाकर ‘कोचिंग’ करेगी.घर के बड़े इतने ‘भोले’ नहीं थे कि अपनी कमाई के जरिए को यूं ही छोड़ दें, लेकिन उनके लालच ने ही युवती के लिए रास्ता खोल दिया. उन्होंने सोचा कि शहर जाकर वह ‘धंधा’ और बड़े पैमाने पर करेगी और मोटी रकम घर भेजेगी. इसी उम्मीद में उन्होंने उसे घर की देहरी लांघने की इजाजत दे दी.
रतलाम से बस पकड़कर सीधे भोपाल पहुंची युवती ने स्थानीय पुलिस पर भी गंभीर सवाल उठाए. उसने कहा कि वह रतलाम में अपनी सुनवाई की उम्मीद छोड़ चुकी थी क्योंकि वहां की पुलिस अक्सर ऐसे मामलों में मौन रहती है या रसूखदारों और समाज के ठेकेदारों का साथ देती है. भोपाल के महिला थाने में अब उसकी शिकायत पर माता-पिता और दो मामाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है.
युवती की आंखों में अपनी आजादी की चमक तो है, लेकिन अपनी उन तीन बहनों के लिए दर्द भी है जो आज भी उसी नरक में कैद हैं. उसने रुंधे गले से कहा, “मेरी तीन बहनें हिम्मत नहीं जुटा पाईं, वे आज भी वहां नोची जा रही हैं… पर मैं अब उस देहरी पर कभी कदम नहीं रखूंगी, चाहे कुछ भी हो जाए.”पीड़िता ने दावा किया कि उसकी तरह हजारों लड़कियों की जिंदगी पर जो ‘परंपरा’ के नाम पर देह व्यापार के अंधेरे में धकेली जा रही हैं. भोपाल पुलिस ने युवती को सुरक्षित गृह में भेज दिया है और मामले की जांच तेज कर दी है.

