NATIONAL : छत्तीसगढ़ जनसंपर्क बना लूट का अड्डा, ‘लाइमलाइट कॉर्प’ को नौ महीने में 3 करोड़ 93 लाख 81 हजार रुपये का भुगतान!

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छत्तीसगढ़ में विष्णु का जंगलराज चल रहा है। दिल्ली द्वारा रिमोट से चलाई जा रही छत्तीसगढ़ सरकार में लूट का परनाला बह रहा है। आपका कहीं भी लिंक जुगाड़ है तो आप लूट के परनाले में अपना हिस्सा सुरक्षित अपने अकाउंट में पा सकते हैं। खासकर जनसंपर्क विभाग तो भ्रष्टाचार, सिफारिश और सेटिंग-गेटिंग का सबसे बड़ा स्थल बन चुका है।

लाइमलाइट कॉर्प नामक एक एजेंसी को भुगतान का विवरण देख लीजिए। विष्णु राज का करप्शन दिख जाएगा। लाइमलाइट की के यूट्यूब चैनल पर सिर्फ 139 सब्सक्राइबर और 57 वीडियो हैं। ये प्रोडक्शन हाऊस है और सरकारी वीडियो बनाती है। मजेदार तो ये कि यही एजेंसी पिछली सरकार में भी काम कर रही थी। कांग्रेस वाली बघेल सरकार में भी यही बनाता था सरकारी वीडियो। मालिक का नाम गुरप्रीत सलूजा है जिसका काम हर सरकार में फिट है। सरकारें बदलती रहती है पर काम यही करेंगे।

आरटीआई के जरिए सामने आई जानकारी ने छत्तीसगढ़ सरकार के जनसंपर्क विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दस्तावेज़ों के मुताबिक, सेक्टर-19, नॉर्थ ब्लॉक, अटल नगर नवा रायपुर स्थित जनसंपर्क कार्यालय द्वारा निजी एजेंसी “लाइमलाइट कॉर्प” को 1 अप्रैल 2024 से 31 दिसंबर 2024 के बीच कुल 3 करोड़ 93 लाख 81 हजार 300 रुपये का भुगतान किया गया है। यह भुगतान अलग-अलग तिथियों में कई किश्तों के रूप में किया गया, जिनमें कुछ भुगतान 20 से 60 लाख रुपये तक के हैं।

आरटीआई से प्राप्त आधिकारिक भुगतान विवरण के अनुसार, 18 अप्रैल 2024 से लेकर 12 दिसंबर 2024 तक लगातार “लाइमलाइट कॉर्प” को रकम दी जाती रही। केवल 30 अगस्त 2024 को ही 60 लाख 70 हजार 500 रुपये का एकमुश्त भुगतान किया गया, जबकि 12 दिसंबर 2024 को एक ही दिन में 44 लाख 51 हजार 700 रुपये समेत तीन अलग-अलग भुगतान दर्ज हैं। कुल मिलाकर नौ महीनों में लगभग चार करोड़ रुपये का भुगतान यह दर्शाता है कि एजेंसी को जनसंपर्क विभाग से बड़ा और निरंतर काम मिला।

सबसे अहम सवाल यह है कि आखिर “लाइमलाइट कॉर्प” ऐसा कौन-सा असाधारण कार्य कर रही है, जिसके लिए उसे सार्वजनिक धन से करीब चार करोड़ रुपये दिए गए। जब एजेंसी की डिजिटल मौजूदगी पर नजर डाली जाती है तो तस्वीर बेहद कमजोर दिखाई देती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, लाइमलाइट कॉर्प का यूट्यूब चैनल महज 139 सब्सक्राइबर और लगभग 57 वीडियो तक सीमित है। न तो इसका कोई बड़ा डिजिटल प्रभाव दिखता है और न ही ऐसा कोई व्यापक जनसंपर्क अभियान, जो करोड़ों रुपये के भुगतान को सहज रूप से उचित ठहरा सके।

जनसंपर्क विभाग का दायित्व सरकार की नीतियों, योजनाओं और उपलब्धियों को प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाना होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विभाग ने भुगतान से पहले एजेंसी के काम, पहुंच और प्रभाव का कोई ठोस मूल्यांकन किया था। अगर किया गया था तो उसका आधार क्या था, और अगर नहीं किया गया तो सार्वजनिक धन के उपयोग में इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हुई।

यह भी उल्लेखनीय है कि यह भुगतान सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मांगी गई जानकारी से सामने आया है। यानी यदि आरटीआई न लगाई जाती, तो संभव है कि यह पूरा मामला सार्वजनिक चर्चा में ही न आता। ऐसे में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी सरकार और जनसंपर्क विभाग की भूमिका सवालों के घेरे में है।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जनसंपर्क विभाग और राज्य सरकार इस भुगतान पर क्या सफाई देती है। क्या “लाइमलाइट कॉर्प” द्वारा किए गए कार्यों का कोई विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक किया जाएगा, या फिर यह मामला भी अन्य सवालों की तरह फाइलों में दबा दिया जाएगा। फिलहाल आरटीआई से उजागर हुआ यह भुगतान विवरण छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन चुका है और आने वाले दिनों में इस पर जवाबदेही की मांग और तेज होने की संभावना है।

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