Bhakti News : चमोली में मौजूद हैं भगवान विष्णु के 7 पवित्र धाम, जानिए क्या है ‘सप्त बद्री’ की महिमा

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चमोली में भगवान विष्णु के 7 पवित्र धाम छिपे हुए हैं. यहां के कण-कण में देवताओं का वास माना गया है. मई से जून और सितंबर से अक्टूबर इन सभी मंदिरों के दर्शन हेतु अनुकूल हैं. उत्तराखंड की पावन धरती को यूं ही ‘देवभूमि’ नहीं कहा जाता. यहाँ के कण-कण में देवताओं का वास माना गया है. चार धाम की महिमा तो जगप्रसिद्ध है ही, लेकिन चमोली जिले की अलकनंदा घाटी में भगवान विष्णु के सात अलग-अलग स्वरूपों के मंदिर स्थित हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘सप्त बद्री’ कहा जाता है.

योग बद्री- यहां भगवान विष्णु की मूर्ति ध्यान मुद्रा में विराजमान है. जोशीमठ और बद्रीनाथ के बीच पांडुकेश्वर में यह प्राचीन मंदिर स्थित है. माना जाता है कि पांडवों के पिता राजा पांडु ने यहाँ तपस्या की थी और इसी स्थान पर पांडवों का जन्म हुआ था. यह बद्रीनाथ मुख्य मार्ग पर ही स्थित है, इसलिए यहां पहुंचना बेहद आसान है.

बद्री विशाल, सप्त बद्री का सबसे प्रमुख और भव्य मंदिर है. नर और नारायण पर्वतों के बीच स्थित यह धाम चार धामों में से एक है. चमोली जिले में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित इस भव्य पौराणिक मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां भगवान विष्णु ने कठोर तपस्या की थी और माता लक्ष्मी ने ‘बदरी’ (बेर) का पेड़ बनकर उन्हें धूप और बारिश से बचाया था. यह मंदिर ऋषिकेश से लगभग 300 किमी की दूरी पर स्थित है, जहां बस या टैक्सी से सीधे पहुंचा जा सकता है.

भविष्य बद्री- इसका नाम ही इसके महत्व को दर्शाता है. इसे ‘भविष्य का बद्रीनाथ’ माना जाता है. जोशीमठ के पास तपोवन के सुभाई गाँव में यह मंदिर स्थित है. मान्यता है कि भविष्यवाणियों के अनुसार, कलयुग के अंत में जब नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे और मुख्य बद्रीनाथ का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा, तब भगवान विष्णु की पूजा इसी मंदिर में होगी. जोशीमठ से तपोवन तक सड़क मार्ग और फिर लगभग 6 किमी का पैदल ट्रेक करके यहां पहु़्ंचा जाता है.

वृद्ध बद्री- यह मंदिर भगवान विष्णु के वृद्ध स्वरूप को समर्पित है. यह मंदिर जोशीमठ के पास अणीमठ गाँव में स्थित है. कहा जाता है कि नारद मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें एक वृद्ध के रूप में दर्शन दिए थे. मुख्य बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना से पहले यहाँ विष्णु जी की पूजा होती थी. जोशीमठ से मात्र 7 किमी दूर सड़क मार्ग पर यह मंदिर स्थित है.

नृसिंह बद्री (या अर्ध बद्री)- जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर को भी सप्त बद्री की सूची में गिना जाता है. कुछ लोग जोशीमठ के पास स्थित ‘अर्ध बद्री’ को सातवां बद्री मानते हैं. नृसिंह मंदिर जोशीमठ मुख्य बाजार में स्थित है. जब सर्दियों में बद्रीनाथ के कपाट बंद होते हैं, तब भगवान बद्री विशाल की ‘उत्सव मूर्ति’ यहीं विराजमान रहती है और शीतकालीन पूजा यहीं संपन्न होती है. ऋषिकेश से जोशीमठ (लगभग 250 किमी) बस या टैक्सी द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है.

ध्यान बद्री- इस मंदिर में भगवान विष्णु की चतुर्भुज मूर्ति काले पत्थर से बनी है. यह मंदिर चमोली की उर्गम घाटी में स्थित है. कहा जाता है कि पांडवों के वंशज ‘उर्व ऋषि’ ने यहाँ ध्यान लगाया था. यह स्थान अपनी शांति और प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है. (ऋषिकेश-बद्रीनाथ मार्ग) से उर्गम घाटी के लिए सड़क जाती है, जहाँ से कुछ दूरी पैदल तय करनी पड़ती है. जिसके बाद इस मंदिर तक पहुंचा जा सकता है.

आदि बद्री- माना जाता है कि यह सप्त बद्री का सबसे प्राचीन मंदिर समूह है. यहां 16 छोटे मंदिरों का एक सुंदर परिसर है. यह कर्णप्रयाग-रानीखेत मार्ग पर, कर्णप्रयाग से लगभग 19 किमी की दूरी पर स्थित है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, सतयुग में भगवान विष्णु यहीं निवास करते थे, बाद में वे बद्रीनाथ चले गए. ऋषिकेश से कर्णप्रयाग पहुंचकर वहां से स्थानीय बस या टैक्सी द्वारा सुगमता से पहुंचा जा सकता है.

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