मिडिल ईस्ट में पैदा हुए हालात और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के कारण ऊर्जा संसाधनों में कमी के संकेतों के बीच भारत सरकार लोगों को राहत देने की योजना बना रही है. आइए जानते हैं इस प्लान के बारे में. मिडिल ईस्ट में पैदा हुए हालात और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के कारण ऊर्जा संसाधनों में कमी के संकेतों के बीच भारत सरकार लोगों को राहत देने की योजना बना रही है. सरकारी पेट्रोलियम मार्केटिंग कंपनियां फिलहाल ईंधन की खुदरा कीमतें नहीं बढ़ा रही हैं, जिससे उन पर वित्तीय दबाव बढ़ रहा है. इस घाटे को कम करने के लिए सरकार रिफाइनरीज को पेट्रोल और डीजल की इंपोर्टेड रेट्स से कम कीमत पर देने की योजना बना रही है.
अगर ऐसा फैसला होता है तो एमआरपीएल, सीपीसीएल और एचएमएल जैसी सिंगल रिफाइनरी कंपनियों पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है. आइए जानते हैं, केंद्र सरकार के इस प्लान के बारे में. मिली जानकारी के अनुसार पेट्रोलियम मार्केटिंग कंपनियां रिफाइनरी ट्रांसफर प्राइस (आरटीपी) को सीमित करने या उसमें कुछ छूट तय करने जैसे विकल्पों पर विचार कर रही हैं. आरटीपी वह आंतरिक कीमत होती है जिस पर रिफाइनरियां अपने ही मार्केटिंग डिवीजन को पेट्रोल और डीजल बेचती हैं.

इस कदम का उद्देश्य यह है कि रिफाइनरियों को ईंधन के लिए आयात के बराबर पड़ने वाली लागत से कम भुगतान किया जाए. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो रिफाइनरियां बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ आरटीपी के जरिए आगे नहीं बढ़ा पाएंगी और उन्हें इसका कुछ हिस्सा खुद ही उठाना पड़ सकता है. जिससे इन कंपनियों पर आर्थिक बोझ बढ़ने की संभावना है.
मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार, अगर आरटीपी से जुड़ा प्रस्ताव निजी रिफाइनरी कंपनियों पर भी लागू किया गया, तो इसका असर नायरा एनर्जी और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड जैसी कंपनियों पर भी पड़ सकता है.
दरअसल ये कंपनियां अपने पेट्रोल और डीजल उत्पादन का बड़ा हिस्सा तेल कंपनियों को सप्लाई करती हैं. देश में एक लाख से अधिक पेट्रोल पंप में से लगभग 90 प्रतिशत का संचालन इन्हीं सरकारी तेल विपणन कंपनियों के पास है. इसलिए खरीद की शर्तों में बदलाव होने पर निजी रिफाइनरियों के कारोबार पर भी प्रभाव पड़ सकता है.


