ईरान युद्ध के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल लाने वाले टैंकरों का किराया रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. जानिए महंगे क्रूड और शिपिंग कॉस्ट से भारत को कितना नुकसान हो सकता है और पेट्रोल-डीजल के अलावा LPG, LNG और CNG पर इसका क्या असर पड़ेगा.
अगर आप इस बात से राहत महसूस कर रहे हैं कि पेट्रोल-डीजल, सीएनजी, एलपीजी का संकट अब नहीं होगा. तो रुकिये. एक नई आफत दस्तक देने वाली है. ईरान युद्ध ने तेल की दुनिया में एक ऐसा खेल शुरू कर दिया है, जिसका असर सिर्फ कच्चे तेल की कीमत पर नहीं पड़ रहा. अब तेल को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना भी बहुत महंगा हो गया है. हालात इतने बिगड़ गए हैं कि फारस की खाड़ी से चीन तक तेल ले जाने वाले बड़े सुपरटैंकरों का किराया इस हफ्ते पहली बार 10.35 लाख डॉलर यानी करीब 9 करोड़ रुपये रोज के पार पहुंच गया. युद्ध से पहले यही किराया करीब 2.08 लाख डॉलर रोज था. यानी जहाज का खर्च करीब पांच गुना हो गया.एक तरह से तेल से ज्यादा पड़ रहा जहाज का किराया. पेट्रोल-डीजल की सप्लाई तो आसानी से हो जाएगी, लेकिन LPG-CNG सप्लाई पर संकट है.

आप सोच रहे होंगे कि आखिर जहाज वालों ने किराया इतना क्यों बढ़ा दिया, तो जवाब है कि खतरा बढ़ गया है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से निकलना खतरे से खाली नहीं. कभी भी मिसाइलें आकर गिर सकती हैं. इसीलिए इंश्योरेंस महंगा हो गया है और कई शिपिंग कंपनियां इस रास्ते पर जहाज भेजने से बच रही हैं. नतीजा यह कि जो जहाज जोखिम लेकर जा रहे हैं, वे उसका पैसा भी वसूल रहे हैं. एसएंडपी ग्लोबल के मुताबिक, टैंकरों की कमी ने फ्रेट रेट को ऊपर धकेला है.
भारत के लिए क्यों आफत
भारत के लिए मुश्किल ज्यादा है. क्योंकि भारत दुनिया का बड़ा क्रूड इंपोर्टर है और अरब देशों से आने वाले तेल को भी समुद्र के रास्ते लाना पड़ता है. सितंबर में अरबियन गल्फ से भारत आने वाले VLCC टैंकर का फ्रेट अगस्त के मुकाबले करीब दोगुना हो गया. एक रिपोर्ट के मुताबिक रोज का चार्टर रेट करीब 2.5 लाख डॉलर तक पहुंच गया. इसके साथ इंश्योरेंस और जहाज के ईंधन की लागत भी बढ़ी है.
यानी भारत के लिए मुसीबत सिर्फ यह नहीं कि तेल 100 डॉलर के आसपास पहुंच गया. असली बात यह है कि एक बैरल तेल को भारत तक लाने की लागत में कई चीजें जुड़ रही हैं. जैसे क्रूड की कीमत, जहाज का किराया, युद्ध का इंश्योरेंस और लंबा समुद्री रास्ता. अगस्त में भारत ने करीब 1.9 करोड़ टन क्रूड इंपोर्ट किया, लेकिन इसके लिए बिल 11.7 अरब डॉलर रहा. पिछले साल इसी महीने 1.96 करोड़ टन तेल के लिए बिल 9.9 अरब डॉलर था. यानी मात्रा करीब 3% कम हुई, लेकिन बिल 18% बढ़ गया.
फर्क क्या पड़ेगा
भारत को विदेश से महंगा तेल खरीदना पड़ेगा तो रिफाइनरी की लागत बढ़ेगी. ऊपर से उस तेल को भारत तक लाने का जहाज भी महंगा हो गया तो खर्च और बढ़ गया. रिपोर्ट के मुताबिक भारत का अप्रैल-जुलाई का क्रूड इंपोर्ट बिल 63.37 अरब डॉलर तक पहुंच चुका था, जो एक साल पहले के मुकाबले 56% ज्यादा था. एक अनुमान के मुताबिक कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी भारत के सालाना इंपोर्ट बिल पर करीब 18,000 करोड़ रुपये का असर डाल सकती है.
असली चिंता गैस की
लेकिन यहां कहानी सिर्फ पेट्रोल और डीजल की नहीं है. असली चिंता गैस की तरफ भी है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सिर्फ क्रूड ऑयल ही नहीं गुजरता, बल्कि दुनिया की बड़ी मात्रा में LNG और LPG भी इसी रास्ते से आती-जाती है. सितंबर में होर्मुज से जहाजों की आवाजाही सामान्य औसत से काफी नीचे चली गई और एक दिन सिर्फ चार जहाजों के गुजरने का डेटा सामने आया. इसी दौरान एक बड़े गैस कैरियर के जरिए करीब 4.7 लाख बैरल LPG के निकलने की जानकारी भी सामने आई.
यही वजह है कि भारत के लिए LPG और LNG की सप्लाई ज्यादा मुश्किल हो गया है. भारत के क्रूड इंपोर्ट को रूस समेत दूसरे स्रोतों से कुछ हद तक संभाला जा सकता है, लेकिन गैस की सप्लाई में समुद्री रास्ते का जोखिम अलग तरह का है. Kpler के मुताबिक भारत की क्रूड सप्लाई फिलहाल काफी हद तक संभली हुई है, लेकिन लंबे समय तक होर्मुज में परेशानी रही तो LPG और LNG की सप्लाई तथा शिपिंग लागत पर दबाव बढ़ सकता है.
और यहीं से CNG का कनेक्शन आता है. CNG सीधे LPG या क्रूड से नहीं बनती, लेकिन देश के गैस सिस्टम में LNG और सीएनजी की उपलब्धता और कीमत अहम होती है. अगर अंतरराष्ट्रीय LNG महंगी होती है या सप्लाई में दिक्कत आती है तो गैस की कुल लागत पर दबाव बढ़ सकता है. इसलिए पेट्रोल पंप पर खड़ी कार के मालिक को सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमत नहीं देखनी चाहिए. लंबे संकट की स्थिति में गैस से चलने वाले वाहनों और उद्योगों पर भी असर पड़ सकता है. भारत के ऊर्जा आयात में LPG और LNG दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है.
तो फिर भारत कर क्या रहा है?
पहला तरीका है तेल खरीदने के रास्ते और देशों को बदलना. रूस भारत का बड़ा क्रूड सप्लायर बना हुआ है और भारतीय रिफाइनर अलग-अलग देशों से तेल खरीदकर किसी एक रास्ते पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं. S&P Global के मुताबिक भारतीय रिफाइनरों ने सितंबर तक की क्रूड जरूरत के लिए सप्लाई सुरक्षित कर रखी थी और रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर बना हुआ था. इसके अलावा भारत ने वेनेजुएला जैसे दूसरे स्रोतों से भी खरीद बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं.
दूसरा तरीका है बीमा और स्टॉक की सुरक्षा. सरकार ने मई में 1.5 अरब डॉलर का भारत मैरीटाइम इंश्योरेंस पूल शुरू किया था, जिसमें 1.4 अरब डॉलर की सरकारी गारंटी है, ताकि युद्ध जैसे हालात में समुद्री बीमा की उपलब्धता बनी रहे. साथ ही भारतीय रिफाइनर पहले से क्रूड खरीदकर सप्लाई को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहे हैं. यानी भारत का प्लान साफ है कि जहां संभव हो वहां होर्मुज पर निर्भरता घटाओ, दूसरे देशों से तेल लो और जरूरी ऊर्जा सप्लाई पहले से सुरक्षित रखो. लेकिन अगर युद्ध और समुद्री जोखिम लंबे समय तक चलते हैं तो महंगा फ्रेट, महंगा क्रूड और महंगा गैस इंपोर्ट आखिरकार भारत की अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं पर दबाव डाल सकता है.

