BUSINESS : यूएस-ईरान युद्ध के बीच कैसे रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गया भारत का खजाना? इस 1 फैसले से देश में आए अरबों डॉलर

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Indian Economy News: अमेरिका-ईरान युद्ध और महंगे कच्चे तेल के बीच भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। RBI की स्पेशल FCNR (B) पहल से अरबों डॉलर देश में आए हैं।

RBI Forex Strategy: भारत के विदेशी मुद्रा भंडार ने नया रिकॉर्ड बना दिया है। वैश्विक तनाव और महंगे तेल के बावजूद देश का फॉरेक्स रिजर्व 740 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है। यह ऐसे समय हुआ है जब कुछ महीने पहले ही सरकार लोगों से विदेशी मुद्रा बचाने की अपील कर रही थी। फरवरी 2026 के आखिर दिनों में अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने से पहले भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 728.5 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था। इसके बाद रुपये में कमजोरी और महंगे क्रूड ऑयल के कारण फॉरेक्स रिजर्व पर दबाव बढ़ा। आरबीआई को रुपये की गिरावट थामने के लिए भी कदम उठाने पड़े। लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। पिछले सप्ताह विदेशी मुद्रा भंडार करीब 729 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था और इस सप्ताह इसमें और बढ़ोतरी हुई। लगातार नौ सप्ताह से भारत का फॉरेक्स रिजर्व बढ़ रहा है।

RBI की एक पहल ने बदल दिया खेल
इस बढ़ोतरी में आरबीआई की विशेष FCNR(B) विंडो की बड़ी भूमिका रही। केंद्रीय बैंक ने जून में विदेशों में रहने वाले भारतीयों से विदेशी मुद्रा डिपॉजिट को आकर्षक बनाने के लिए खास स्वैप सुविधा शुरू की थी। इसका मकसद देश में डॉलर की उपलब्धता बढ़ाना और रुपये पर दबाव कम करना था। FCNR(B) का मतलब फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (Bank) से है। इस स्कीम में एनआरआई अपना पैसा विदेशी मुद्रा में भारतीय बैंकों में डिपॉजिट कर सकते हैं। इस व्यवस्था में मूल रकम और ब्याज विदेशी मुद्रा में ही रहता है। इससे एनआरआई को रुपये में गिरावट से होने वाला नुकसान झेलना नहीं पड़ता है। आरबीआई ने इस योजना के तहत बैंकों की करेंसी हेजिंग लागत को कम करने में मदद की। इससे बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा डिपॉजिट जुटाना आसान हुआ और वे एनआरआई ग्राहकों को बेहतर रिटर्न की पेशकश कर सके।

अनुमान से बहुत ज्यादा विदेशी करेंसी आई भारत
इस योजना का नतीजा उम्मीद से कहीं बड़ा रहा। आरबीआई को शुरुआत में उम्मीद थी कि इस योजना से करीब 80 अरब डॉलर जुटाए जा सकते हैं। लेकिन कुल जुटाई गई रकम 136.38 अरब डॉलर तक पहुंच गई। खास बात यह रही कि योजना बंद होने से पहले आखिरी 10 दिनों में ही करीब आधी रकम जुटाई गई। यह स्पेशल डॉलर स्वैप स्कीम जून में लॉन्च हुई थी और 31 अगस्त को बंद हुई। जुटाई गई रकम में FCNR(B) जमा की हिस्सेदारी 127.23 अरब डॉलर रही। इसके अलावा विदेशी मुद्रा वाले बॉन्ड से 5.3 अरब डॉलर और एक्सटर्नल कमर्शियल बोरोइंग से 3.9 अरब डॉलर आए।

2013 वाली रणनीति फिर काम आई
आरबीआई ने इस बार जिस रणनीति का इस्तेमाल किया, उसकी जड़ें 2013 के ‘टेपर टैंट्रम’ दौर में मिलती हैं। तब भी विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए ऐसी ही व्यवस्था की गई थी। उस समय करीब 26 अरब डॉलर जुटे थे और इससे रुपये को मजबूती मिली थी। इस बार योजना इतनी सफल रही कि आरबीआई ने एफसीएनआर विंडो को तय समय से करीब एक महीने पहले ही बंद कर दिया।

रुपये को भी मिला सपोर्ट
विदेशी मुद्रा की भारी आवक का असर रुपये पर भी दिखाई दिया। रिकॉर्ड डॉलर इनफ्लो के बीच रुपया दो महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया। गुरुवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 49 पैसे यानी करीब 0.5% मजबूत होकर 94.48 पर बंद हुआ। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर FCNR(B) विंडो नहीं होती, तो रुपये में गिरावट और तेज हो सकती थी।

10 महीने के आयात का खर्च कवर
विदेशी मुद्रा भंडार में इस उछाल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारत के पास बाहरी संकट से निपटने के लिए ज्यादा मजबूत सुरक्षा कवच है। टीओआई की एक रिपोर्ट में PwC India के Ranen Banerjee के हवाले से बताया गया कि भारत का फॉरेक्स रिजर्व 10 महीने से ज्यादा के आयात को कवर करता है। इससे फिलहाल देश की स्थिति आरामदायक मानी जा सकती है।

रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से भी भारत को फायदा मिल रहा है। वैश्विक स्तर पर रिफाइनिंग कैपेसिटी पर दबाव के कारण इन प्रोडक्ट्स के निर्यात मार्जिन में बढ़ोतरी हुई है। इससे महंगे तेल के झटके को कुछ हद तक संभालने में मदद मिल सकती है।

निवेशकों का भरोसा भी बढ़ा
मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ रुपये के लिए ही अच्छी खबर नहीं है। इससे विदेशी निवेशकों को भी भरोसा मिलता है कि जरूरत पड़ने पर आरबीआई बाजार में हस्तक्षेप करने की क्षमता रखता है। एफआईआई आउटफ्लो में कमी, एफडीआई में सुधार और निवेश में बढ़ोतरी जैसे संकेत भी भारत के पक्ष में जा रहे हैं। हालांकि, वैश्विक बाजार में अभी पूरी तरह स्थिरता नहीं आई है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का मानना है कि संकट शुरू होने से पहले भी भारत की विदेशी मुद्रा स्थिति मजबूत थी और अब यह और बेहतर हुई है।

RBI के सामने हेजिंग लागत की चुनौती
यहां तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। इस योजना की एक लागत है। अर्थशास्त्रियों ने अनुमान लगाया है कि आरबीआई को हेजिंग पर करीब 3% की लागत उठानी पड़ सकती है। लगभग 12 लाख करोड़ रुपये पर यह खर्च करीब 36,000 करोड़ रुपये बैठता है। हालांकि, नीति-निर्माताओं को उम्मीद है कि इन डॉलर्स को अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश करने से मिलने वाला रिटर्न इस लागत की भरपाई कर सकता है।

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