कोचिंग से लेकर आईआईटी जैसे संस्थानों तक में स्टूडेंट्स की आत्महत्या काफी चिंता का विषय है. आईआईटी दिल्ली की ओर से एक गठित समिति ने संस्थान में छात्रों की आत्महत्या की कुछ बड़ी वतहें बताई हैं. समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जेईई की की कोचिंग के बाद की थकान (पोस्ट कोचिंग बर्नआउट), टॉक्सिक कॉम्पिटीशन को बढ़ावा देने वाले ग्रेडिंग सिस्टम, निरंतर एकेडमिक डिमांड और जाति व लिंग आधारित भेदभाव की संस्कृति छात्रों की आत्महत्या के लिए प्रमुख जिम्मेदार कारण हैं.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, आईआईटी दिल्ली ने इस समिति का गठन पिछले शैक्षणिक सत्र में हुई आत्महत्याओं के बाद संस्थागत प्रक्रियाओं और वातावरण का अध्ययन करने के लिए किया था.
रिपोर्ट के अनुसार, स्टूडेंट्स की परेशानी कम करने के लिए 12 सदस्यीय समिति ने कई सुधारों की सिफारिश की है. जिसमें स्पष्ट भेदभाव विरोधी नीति, सफलता के एकमात्र मानक के रूप में सीजीपी पर पुर्नविचार, सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार वाले कैंपस लीडर का चुनाव, फैकल्टी और स्टूडेंट्स के संबंधों को मजबूत करना, पूर्वाग्रह और भेदभाव को कम करने के लिए अनिवार्य सिविक लर्निंग के साथ स्टूडेंट्स की चिंताओं के प्रति अधिक प्रशासनिक जवाबदेही शामिल है. इस समिति का नेतृत्व NIMHANS में बिहैविरियल साइंस के पूर्व डीन और साइकेट्री के सीनियर प्रोफेसर संतोष कुमार चतुर्वेदी कर रहे थे.
आईआईटी दिल्ली में साल 2023 और 2024 में कुल पांच छात्रों ने आत्महत्या की थी. जिसमें सबसे अधिक घटनाएं चतुर्वेदी पैनल की ओर से अपनी रिपोर्ट सौंपने के एक महीने बाद अक्टूबर 2024 में हुई थी. रिपोर्ट के अनुसार, समिति के एक सदस्य ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि हमारी रिपोर्ट पिछले साल अगस्त में जमा की गई थी. लेकिन हमने फॉलो-अप पर कुछ नहीं सुना.


