मध्य प्रदेश के विदिशा में एक डॉक्टर दूल्हे की बारात लग्जरी कारों या डीजे के शोर में नहीं, बल्कि 10 बैलगाड़ियों पर निकली. ढोल की थाप और ‘कौन दिशा में लेके चला रे’ गीत के बीच दुल्हन की विदाई भी फूलों से सजी बैलगाड़ी में हुई. इस अनोखी शादी ने लोगों को पुरानी ग्रामीण परंपराओं की याद दिला दी. सोशल मीडिया पर भी इस शादी की खूब चर्चा हो रही है.
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के सिरोंज में एक ऐसी शादी देखने को मिली, जिसने आधुनिक दिखावे और महंगी शादियों के ट्रेंड के बीच परंपरा की सादगी को जीवंत कर दिया. यहां एक डॉक्टर दूल्हे ने अपनी बारात 10 बैलगाड़ियों पर निकाली… न डीजे का शोर, न आतिशबाजी, न लग्जरी कारों का काफिला. बस ढोल की थाप, देसी अंदाज और फिल्म नदिया के पार का मशहूर गीत- ‘कौन दिशा में लेके चला रे बटुरिया…’ माहौल को और खास बना रहा था.
विदिशा के सिरोंज तहसील के नयापुरा क्षेत्र में रहने वाले डॉक्टर प्रशांत ने अपनी शादी को यादगार बनाने के लिए पुरानी ग्रामीण परंपराओं को चुना. उनकी दुल्हन मयूरी ग्रेजुएट हैं. इस जोड़े ने शादी में किसी तरह का दिखावा नहीं किया. शादी का मकसद सिर्फ एक रिश्ता जोड़ना नहीं, बल्कि समाज को एक संदेश देना भी था कि परंपराएं बोझ नहीं, पहचान होती हैं.

बारात के लिए कुल 10 बैलगाड़ियों की व्यवस्था की गई. इनमें से तीन बैलगाड़ियां स्थानीय पशुपालक रघु यादव की थीं, जबकि सात अन्य बैलगाड़ियां किराए पर मंगाई गईं. सभी बैलगाड़ियों को फूलों और पारंपरिक सजावट से सजाया गया था. बाराती इन्हीं बैलगाड़ियों पर सवार होकर निकले. दूल्हा प्रशांत घोड़ी पर सवार थे.
जैसे ही यह अनोखी बारात सिरोंज के मुख्य मार्गों से गुजरी, लोग हैरान रह गए. सड़क किनारे खड़े लोगों ने मोबाइल निकालकर वीडियो बनाना शुरू कर दिया. कई लोगों ने कहा कि उन्होंने ऐसी बारात सिर्फ फिल्मों या बुजुर्गों की कहानियों में सुनी थी, असल में पहली बार देख रहे हैं. माहौल में उत्सुकता भी थी और खुशी भी.
शादी में न डीजे बुलाया गया, न तेज आवाज वाले बैंड-बाजे. ढोल-नगाड़ों की पारंपरिक थाप और लोकगीतों के बीच बारात आगे बढ़ती रही. पूरे आयोजन में शोर-शराबे और फिजूल खर्च से दूरी रखी गई. परिवार का कहना है कि यह फैसला सोच-समझकर लिया गया था, ताकि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ा जा सके. शादी के बाद दुल्हन मयूरी फूलों से सजी बैलगाड़ी में बैठकर विदा हुईं.
दूल्हे डॉक्टर प्रशांत ने बताया कि आजकल शादियां प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनती जा रही हैं. लोग कर्ज लेकर भी दिखावा करते हैं. उन्होंने कहा कि उनकी कोशिश थी कि शादी सरल, सांस्कृतिक और यादगार बने. उनके अनुसार पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं, इसलिए परिवार ने तय किया कि शादी उसी अंदाज में की जाएगी, जैसा पहले गांवों में हुआ करती थी.
दूल्हे के परिवार के लोगों ने भी इस पहल को खास बताया. उनकी बहन ने कहा कि उन्होंने खुद कभी बैलगाड़ी की सवारी नहीं की थी, सिर्फ सुना था. इसलिए परिवार ने सोचा कि क्यों न शादी के मौके पर ही इस अनुभव को जिया जाए. परिजनों के मुताबिक, यह शादी सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुभव बन गई.
विशेष बात यह भी रही कि पूरे आयोजन में पर्यावरण का भी ध्यान रखा गया. न पटाखे फोड़े गए, न ध्वनि प्रदूषण फैलाया गया. बैलगाड़ी और पारंपरिक साधनों के इस्तेमाल से शादी अपेक्षाकृत इको-फ्रेंडली भी रही.इस अनोखी शादी के विजुअल अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं. लोग इसे देसी रॉयल वेडिंग और परंपरा की वापसी जैसे नाम दे रहे हैं. कई यूजर्स ने लिखा कि ऐसी शादियां समाज को सही दिशा दिखाती हैं, जहां रिश्तों की अहमियत खर्च से ज्यादा होती है.

