NATIONAL : ‘अंजलि गाड़ी के नीचे आ गई, अशिका पंखे से झूल गई…अब बचा है तो बस उधार और 36 लाख का इंतजार, कंझावला केस के तीन साल

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अंजलि के बाद दूसरी बेटी अशिका भी चली गई. इसी पंखे, जिसके नीचे हम बैठे हैं, यहीं उसने फांसी लगा ली. रात सोओ, तो फंदे पर झूलता उसका शरीर याद आता है. गोली खाती हूं, तब जाकर सो पाती हूं. लोगों के लिए नया साल खुशियां लाता है, हमारे तो पुराने जख्म उधेड़ जाता है.1 जनवरी 2023! नया साल मनाकर थके हुए लोग जब सो रहे थे, तभी कंझावला की सड़कों पर एक लड़की कार के पहियों के नीचे घसीटी जा रही थी. एक किलोमीटर. दो किलोमीटर. 13 किलोमीटर. घर से नई गुलाबी जैकेट पहनकर निकली ये लड़की मांस का लोथ बनने तक सड़क पर लिथड़ती रही.

तीन साल में दुनिया में कई बादशाहतें बदल गईं. कई नक्शे बदलने को हैं. खुद दिल्ली में कई इमारतें उग आईं, तो कई जंगल गायब हो गए. लेकिन कंझावला केस के पीड़ित वहीं अटके हैं. घर का पता बदलने के बाद भी उनकी पहचान वही रही! उतना ही हिस्सा जिंदा है, जिसमें मरी हुई बेटी की बात या उसकी याद हो, बाकी तमाम जिंदा परिवार लगभग मर चुका. करण विहार के घर से अब मंगोलपुरी के एक कमरे में शिफ्ट हो चुके बचे-खुचे परिवार से मिलने जब हम पहुंचते हैं तो बेहद घनी बस्ती में भी उनका एड्रेस लोग जानते हैं. वे खुद गाड़ी को यहां-वहां मोड़ने का इशारा करते हैं.

शाम का वक्त. सीधी गली की शुरुआत कबाड़ी की दुकान से होती है. आसपास कोई पेड़ या पंक्षी नहीं. बिजली के तारों से भरी छतों वाली संकरी गली में कोई मौसम नहीं उतरता. न ठंड-न गर्मी और न बसंत.कुछ घर फर्लांगते ही अंजलि की मां रेखा का मकान है. एक कमरा. कोने में धूल फांकती गैस जैसे दिनों से कुछ न पका हो. बीचोबीच एक बिस्तर, जिसपर बाकी बचा परिवार सोता है. एक मां और दो बेटे. अंजलि के बाद एक और बेटी अशिका भी खत्म हो चुकी.

दुख अमरबेल की तरह रूम में पसरा हुआ दिखता है. ऐसे कि भीतर जाते ही बाहर निकलने की छटपटाहट हो जाए. तीन साल में तीन सौ से भी ज्यादा बार अलग-अलग माइक्स देख चुकी रेखा सामने ही इंतजार करती दिखीं.41 साल की मां, जिसकी 20 और 17 बरस की दो बेटियां जा चुकीं, उसके पास कहने को कुछ अलग नहीं. वे टू-द-पॉइंट बोलती हैं, जैसे शब्द नहीं, डेटा की बात हो रही हो.

‘अंजलि थी, तो दुनिया अलग थी. उसे सारे शौक थे. काम भी वैसा ही चुना. वेडिंग प्लानर बनने के बाद तिनका-तिनका जोड़कर घर के लिए फ्रिज खरीदा. क्रॉकरी का भी बहुत शौक था. कहती कि मम्मी खीर-हलवा खाओ तो कांच के बर्तन में स्वाद बढ़ जाता है. ये जितने नाजुक बर्तन दिख रहे हैं, सब उसी ने जोड़े.’

‘खुद भी किसी नाजुक बर्तन की तरह सुंदर लगती. अपने लिए ड्रायर खरीदा. उसके बाल हल्के थे. मुझसे जिद करती रहती कि फलां तरह की चोटियां गूंथ दो कि बाल भारी लगें. मौत की रात भी नई तरह के बाल बनवाकर निकली थी. अब तो उसके होने से ज्यादा उसके नहीं होने की याद जमा हो चुकी.’

ठिठुरन वाली सर्दी में भी रेखा की आवाज गर्म, जैसे बुखार का ताप उतर आया हो. अंजलि की मौत के वक्त भी उनका डायलिसिस चल रहा था.डायलिसिस तो अब भी होता है हफ्ते में तीन दिन. लेकिन फ्री का बंद हो चुका. अब मैं नजफगढ़ जाती हूं. पहले बड़ी ले जाती थी. फिर छोटी ले जाने लगी. अब वो भी ‘एक्सपायर’ हो गई तो छोटा बेटा अस्पताल जाता है. वही घर भी संभालता है कि क्या लाना है, या क्या बनाना है, अगर कभी कुछ बना तो!

क्या पता बहन. अंजलि हमारे घर की अकेली कमाऊ सदस्य थी. उसकी मौत के बाद अशिका को लगने लगा कि वो कुछ कमाए तो खर्च बंटेगा. हादसे के बाद सरकार से 10 लाख रुपये मिले थे, उसी से गुजारा हो रहा है. अशिका जोर देने लगी कि मैं उसे नौकरी करने दूं. मैं मना करती रही. 10वीं का पेपर ही दिया था उसने. छोटी थी. अंजलि की तरह धूप-छांव नहीं देखी थी. वो कैसे बाहर की दुनिया में टिकती.

इसी साल जून की दोपहर. छोटे बेटे को मैंने रिश्तेदारी में सोनीपत भेज दिया था. मैं और बड़ा बेटा किसी काम से बाजार गए. लौटे तो किवाड़ बंद था. दोपहर थी. कूलर में सो रही होगी, ये सोचकर हम इंतजार करते रहे. कई बार खटखटाने पर भी दरवाजा नहीं खुला. बेटे ने जंगले से झांककर देखा तो अशिका फंदे पर लटकी हुई थी.

एक बेटी के बाद काम के फेर में दूसरी बेटी भी एक्सपायर हो गई. यहीं इसी पलंग पर हमने उसकी लाश को रखा था. हफ्ते में तीन डायलिसिस करा रही मां की आवाज भारी, जैसे आसपास की सारी नमी, सारी ठंड सोखकर जम रही हो. हादसों और हादसों की यादों से भरे कमरे के एक कोने में अंजलि की फोटो लगी हुई. छोटी बेटी अशिका कहीं नहीं दिखती.

आंखों का इशारा समझते हुए रेखा बताती हैं- दो जवान मौतों के बाद लोगों ने कहा कि घर को कुछ लग गया होगा. पूजा करवा लो. हम बालाजी गए. वहां से लौटे तो पूजा करवाई और दोनों ही फोटो हटा दी. कुछ रोज पहले मीडिया वाले आए थे, तो अंजलि की फोटो वापस निकाली. पास ही छोटा बेटा बैठा हुआ. वो पूछता है- दीदी की फोटो देखेंगी! कौन सी लाऊं! एक्सपायर्ड या जिंदा वाली!

लगभग 11 साल का बच्चा. पिता के बाद दो बड़ी बहनों को खो चुका भाई. वो एक्सपायर्ड शब्द ऐसे बोलता है, जैसे रसोई में रखे किसी मसाले की बात हो रही हो, या ब्रेड के बासी पैकेट की. इस घर में या तो मौत की बात होती है, या मौत का इंतजार.

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