देश मे ना जाने कितने लोग है जिन्हें आज भी कोर्ट के चक्कर लगाने पढ़ रहे हैं और उन्हें इंसाफ आज तक भी नही मिल पाया बस मिलती रही है तारीख़े!लेकिन देखा जाये तो कुछ वर्षों में कुछ लोगो को त्वरित इंसाफ भी मिला लेकिन ऐसे मामले भी हैं जो एक दशक से फाइलों में सिर्फ तारीख का सामना कर रहें है!जबकि न्यायपालिका को भारतीय लोकतंत्र का अंतिम और सबसे विश्वसनीय आधार स्तंभ माना जाता है,

जो संविधान की रक्षा करता है।यह संपूर्ण प्रणाली की विफलता नहीं, बल्कि मुकदमों में विलंब और फैसलों में पारदर्शिता की कमी जैसे सुधारात्मक संकेतों को दर्शाता है, जिन पर समय रहते ध्यान देना आवश्यक है!जब उसी स्तंभ पर प्रश्नचिह्न लगने लगे, तो आम नागरिकों का विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है। शिकायतों का यह अर्थ नहीं है कि पूरी न्यायपालिका ही संदिग्ध है, बल्कि संकेत यह है कि व्यवस्था में कुछ कमियां जरूर हैं- जैसे, मुकदमों के निस्तारण में अनावश्यक विलंब, व्यवहार संबंधी शिकायतें या निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी!न्याय में देरी को भी अन्याय के समान माना जाता है! समाधान के रूप में न्यायिक अधिकारियों के लिए नियमित प्रशिक्षण, कार्य प्रणाली की निगरानी के लिए स्वतंत्र तंत्र और शिकायतों के त्वरित तथा निष्पक्ष निस्तारण की व्यवस्था होनी चाहिए! सबसे महत्त्वपूर्ण है की जवाबदेह की स्पष्ट प्रणाली हो, ताकि ईमानदार अधिकारियों का मनोबल बढ़े। विश्वास ही न्यायपालिक की सबसे बड़ी शक्ति है।


